नेताओं की ब्लैक मनी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती; जांच से लेकर मुकदमा तक… कैसे होगा? जारी की नई गाइडलाइन
Raisina News Desk- अगस्त 18, 2026 04:46 AM IST

नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चुनावों में काले धन के इस्तेमाल को रोकने के लिए गाइडलाइंस जारी की. कोर्ट ने कहा कि वोटरों को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला बेहिसाब कैश स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की नींव पर चोट करता है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि चुनावों में काले धन का इस्तेमाल लोकतंत्र की बुनियाद के लिए गंभीर खतरा है.
अदालत कर्नाटक हाई कोर्ट के 2015 के एक आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थी. मामले में आरोपी प्रतीक पारसरामपुरिया पर आरोप था कि उन्होंने वोटरों को रिश्वत देने के लिए भारी मात्रा में कैश जमा किया था. पारसरामपुरिया 2014 में बेल्लारी से लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार थे. हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया था.
मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में काले धन से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए कार्यवाही का दायरा बढ़ा दिया. साथ ही चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस भी जारी किया. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक गाइडलाइन भी जारी की.
सुप्रीम कोर्ट की क्या है गाइडलाइन?
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18 नवंबर तक मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और संबंधित सरकारों को इन निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट 18 नवंबर 2026 तक दाखिल करने को कहा है.
बेंच ने अपने फैसले में पहले के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए जरूरी हैं. अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि वोट की ताकत लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी बाहरी दबाव या धनबल से ज्यादा महत्वपूर्ण है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपील की सुनवाई के दौरान मामले का दायरा बढ़ाते हुए चुनावों में काले धन के व्यापक और व्यवस्थित इस्तेमाल पर विचार किया. अदालत ने चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
बेंच ने कहा कि यदि मतदाता का निर्णय बाहरी प्रभावों से प्रभावित होता है तो वह वास्तविक रूप से उसका अपना निर्णय नहीं रह जाता. अदालत ने टिप्पणी की कि चुनाव में मतदाताओं की स्वतंत्र पसंद को प्रभावित करना लोकतंत्र के मूल स्वरूप को ही कमजोर करता है.
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की व्यापक शक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आयोग के अधिकार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जरूरी सभी शक्तियों तक विस्तृत हैं. बेंच ने चुनाव में धनबल के प्रभाव से जुड़े पुराने न्यायिक और सरकारी प्रयासों का भी उल्लेख किया. इनमें 1975 में जस्टिस पी.एन. भगवती की टिप्पणियां, 1990 की गोस्वामी समिति की रिपोर्ट, 1993 की वोहरा समिति की रिपोर्ट और 2015 की विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट शामिल हैं.
अदालत ने कहा कि लोकतंत्र, कानून का शासन और चुनावी प्रक्रिया एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं. इनमें से किसी एक को नुकसान पहुंचने पर पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित होती है.
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से पेश आंकड़ों पर भी सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया. आयोग के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान 3,87,430 FIR दर्ज हुईं, लेकिन इनमें से करीब 42.9 प्रतिशत यानी 1,66,044 मामलों में ही दोष सिद्धि हुई. बड़ी संख्या में मामले अभी जांच या सुनवाई के स्तर पर लंबित हैं.
अदालत ने चुनाव संबंधी मामलों को बाद में वापस लिए जाने की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई. चुनाव आयोग ने ऐसी कार्रवाई को लेकर पहले ही कहा था कि इससे यह गलत संदेश जा सकता है कि चुनावी अपराध करने वालों को बाद में मुकदमे वापस लिए जाने की उम्मीद रहेगी.
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