'शराबबंदी से क्या हासिल हुआ?' सुप्रीम कोर्ट ने गिना दिए 5 बड़े नुकसान
Raisina News Desk- सितंबर 19, 2026 11:56 AM IST

नई दिल्ली:
देश में शराबबंदी को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट की एक अहम टिप्पणी सामने आई है. शीर्ष अदालत ने कहा है कि शराब पर पूर्ण प्रतिबंध हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं देता और इसके कई दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं. अदालत ने गुजरात में वर्षों से लागू शराबबंदी के बावजूद जहरीली शराब से हुई बड़ी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिबंध कई बार शराब के अवैध कारोबार को भूमिगत कर देता है. इससे न केवल लोगों की जान को खतरा बढ़ता है, बल्कि राजस्व, कानून-व्यवस्था और जनस्वास्थ्य से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी M/s Balaji Formalin Pvt. Ltd. बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई के दौरान आई. जस्टिस जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B की वैधता पर सुनवाई कर रही थी. ये नियम मेथनॉल की खरीद, भंडारण और बिक्री को नियंत्रित करते थे तथा बिक्री से पहले उसमें विशेष रसायन मिलाने को अनिवार्य बनाते थे. अदालत ने कहा कि किसी नियम का उद्देश्य अच्छा होना पर्याप्त नहीं है. यह भी साबित होना चाहिए कि उस नियम और उसके घोषित उद्देश्य के बीच तार्किक तथा प्रभावी संबंध है.
न्यूज एजेंसी एएनआई के अनुसार सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात की शराबबंदी नीति का उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि गुजरात एक ‘ड्राई स्टेट’ है, जहां लंबे समय से शराबबंदी लागू है. इसके बावजूद राज्य में कई बार जहरीली शराब त्रासदियां सामने आई हैं. कोर्ट ने कहा कि राज्य गठन के बाद से कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब घटनाएं हुईं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. अदालत के अनुसार यह अनुभव बताता है कि केवल शराब पर प्रतिबंध लगाने से अवैध शराब का कारोबार समाप्त नहीं होता, बल्कि कई बार यह और अधिक गुप्त तथा खतरनाक रूप ले लेता है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में शराबबंदी से जुड़े कुछ संभावित जोखिमों का भी जिक्र किया. अदालत के अनुसार पूर्ण शराबबंदी से निम्न समस्याएं पैदा हो सकती हैं:
कोर्ट का कहना था कि नीति बनाते समय इन पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.
यह पूरा मामला मेथनॉल की बिक्री और उसके नियमन से जुड़ा था. अदालत ने 1991 की मुंबई जहरीली शराब त्रासदी का भी उल्लेख किया, जिसमें करीब 93 लोगों की मौत हुई थी. उस घटना की जांच के बाद गठित समिति ने पाया था कि मेथनॉल की अवैध निकासी और गलत इस्तेमाल ऐसी घटनाओं का प्रमुख कारण था. हालांकि अदालत ने कहा कि केवल मेथनॉल में रंग और कड़वाहट पैदा करने वाले रसायन मिलाने से उसके अवैध उपयोग को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि नियम 18A और 18B संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) की कसौटी पर खरे नहीं उतरते. अदालत ने कहा कि कानून या नियम नागरिकों पर कुछ बोझ या असुविधा डाल सकते हैं, लेकिन वे उचित, तार्किक और अनुपातिक होने चाहिए. कोर्ट के अनुसार मेथनॉल में अनिवार्य रूप से रंग और कड़वाहट मिलाने की शर्त घोषित उद्देश्य से पर्याप्त रूप से जुड़ी हुई नहीं थी. इसलिए इसे उचित नहीं माना जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनस्वास्थ्य की सुरक्षा एक वैध उद्देश्य है और मेथनॉल से होने वाली मौतों को रोकना जरूरी है. इसके लिए अदालत ने कुछ कड़े उपाय सुझाए, जिनमें शामिल हैं:
महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में शराबबंदी की संवैधानिक वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया है. अदालत केवल महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स में मेथनॉल से जुड़े प्रावधानों की वैधता पर विचार कर रही थी. इसलिए इस फैसले को शराबबंदी पर अंतिम न्यायिक राय के रूप में नहीं देखा जा सकता.