यूपी-बिहार और राजस्थान नहीं, इन राज्यों के लोगों को मिलती है सबसे ज्यादा सरकारी नौकरी
Raisina News Desk- अक्टूबर 06, 2026 06:43 PM IST
देश में सरकारी नौकरी की तैयारी का अलग क्रेज है. 12वीं पास करने के बाद स्टूडेंट्स वन डे एग्जाम सहित प्रदेश की भर्तियों की तैयारी में लग जाते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि देश के किन राज्यों के बच्चों को ज्यादा सरकारी नौकरी मिलती है? इस मामले में यूपी-बिहार, राजस्थान जैसे उत्तर भारत के राज्यों से आगे पूर्वोत्तर के स्टेट हैं. देश में सरकारी या पब्लिक सेक्टर में काम करने वालों की हिस्सेदारी हर राज्य में एक जैसी नहीं है.
2023-24 के पीएलएफएस यानी पीरियडिक लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक, भारत के कुल कामगारों में करीब 6% लोग पब्लिक सेक्टर में काम करते हैं. वहीं, करीब 6% कामगार प्राइवेट कंपनियों में हैं. देश के ज्यादातर कामगार हाउसहोल्ड एंटरप्राइज यानी परिवार के स्तर पर चलने वाले काम-धंधों से जुड़े हैं. यह सर्वे नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस यानी एनएसओ की ओर से किया जाता है.
यहां पब्लिक सेक्टर का मतलब सिर्फ केंद्र या राज्य सरकार की सीधी नौकरियों से नहीं है. इसमें सरकार के अलग-अलग विभागों और सरकारी नियंत्रण वाली कंपनियों समेत पब्लिक सेक्टर में होने वाला रोजगार शामिल है. इसलिए इस आंकड़े को केवल सरकारी विभागों में मौजूद सरकारी पदों की संख्या के तौर पर नहीं देखना चाहिए.
सरकारी या पब्लिक सेक्टर की नौकरियों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी मिजोरम, नागालैंड और सिक्किम में दिखाई देती है. Data For India के मुताबिक, इन राज्यों में काम करने वाले करीब हर चार लोगों में एक व्यक्ति पब्लिक सेक्टर में काम करता है, यानी हिस्सेदारी लगभग 25% है.
इसका मतलब यह नहीं है कि इन राज्यों में कुल सरकारी कर्मचारियों की संख्या उत्तर प्रदेश या बिहार से ज्यादा है. यहां बात कुल वर्कफोर्स में सरकारी सेक्टर में काम करने वाले लोगों के अनुपात की हो रही है. छोटी आबादी वाले राज्यों में सरकारी रोजगार कुल रोजगार का बड़ा हिस्सा बन सकता है. यही वजह है कि प्रतिशत के मामले में उत्तर-पूर्व के राज्य सबसे ऊपर दिखाई देते हैं.
उत्तर-पूर्व में सरकारी रोजगार की ज्यादा हिस्सेदारी का एक कारण वहां प्राइवेट सेक्टर का अपेक्षाकृत छोटा होना भी बताया गया है. जब बड़े पैमाने पर प्राइवेट कंपनियां और दूसरे औपचारिक रोजगार के विकल्प कम होते हैं, तो सरकार और पब्लिक सेक्टर स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण स्रोत बन जाते हैं.
उत्तर-पूर्व के बाद दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में भी पब्लिक सेक्टर रोजगार की हिस्सेदारी देश के औसत से काफी ज्यादा है. केरल और तमिलनाडु में यह हिस्सेदारी करीब 10% से 15% के बीच है. यानी यहां हर 7 से 10 कामगारों में लगभग एक व्यक्ति पब्लिक सेक्टर से जुड़ा हुआ है.
इसके पीछे इन राज्यों की अपेक्षाकृत बेहतर शिक्षा, शहरीकरण और औपचारिक रोजगार का बड़ा आधार जैसे कारक भी महत्वपूर्ण हैं. हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि यहां रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत सरकार ही है. बल्कि कुल वर्कफोर्स में पब्लिक सेक्टर का हिस्सा देश के औसत 6% से काफी ऊपर है.
अब आते हैं उन राज्यों पर जहां सरकारी नौकरी की हिस्सेदारी काफी कम है. बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सिर्फ करीब 3% कामगार पब्लिक सेक्टर में काम करते हैं. यानी इन राज्यों में 100 कामगारों में लगभग 3 ही सरकारी या पब्लिक सेक्टर रोजगार से जुड़े हैं.
यह आंकड़ा खास इसलिए है क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सरकारी नौकरी को लेकर युवाओं के बीच काफी आकर्षण है. बड़ी आबादी और सीमित औपचारिक रोजगार के कारण सरकारी भर्तियों में प्रतिस्पर्धा भी बहुत ज्यादा रहती है. लेकिन कुल रोजगार में सरकारी नौकरियों का हिस्सा देखने पर तस्वीर बताती है कि इन राज्यों की वर्कफोर्स का बहुत छोटा हिस्सा ही पब्लिक सेक्टर में जगह बना पाता है.
Data For India के मुताबिक, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में 90% से ज्यादा वर्कफोर्स हाउसहोल्ड एंटरप्राइजेज से जुड़ी है. यानी खेती, परिवार के स्तर पर चलने वाले कारोबार, छोटे व्यवसाय और दूसरे घरेलू काम इन राज्यों में रोजगार के बड़े स्रोत हैं.
राजस्थान भी उन राज्यों में नहीं है जहां पब्लिक सेक्टर रोजगार की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. यानी केवल बड़ी आबादी और सरकारी नौकरी की लोकप्रियता को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि किसी राज्य की कुल वर्कफोर्स में सरकारी कर्मचारियों का अनुपात भी ज्यादा होगा.
असल तस्वीर राज्य की अर्थव्यवस्था, प्राइवेट सेक्टर के आकार, खेती पर निर्भरता, छोटे कारोबार और अन्य रोजगार के विकल्पों पर भी निर्भर करती है. इसलिए सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या और किसी राज्य की कुल वर्कफोर्स में सरकारी नौकरी की हिस्सेदारी दो अलग-अलग चीजें हैं.