नए दोस्त, मौज और मीम्स.. जंतर-मंतर से लौटते स्टूडेंट्स ने बताया कैसे जिंदगी भर की याद बटोर ले गए

भाई, ये आंदोलन है या कॉलेज फेस्ट… पिछले 37 दिनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर यह सवाल शायद सबसे ज्यादा पूछा गया. यहां नारे थे, लेकिन उनके बीच मीम्स भी थे. भाषण थे, लेकिन उनके बाद डांस भी था. लाठीचार्ज के जख्म थे, लेकिन उसी शाम किसी कोने में दोस्ती की नई शुरुआत भी हो रही थी. हजारों छात्र यहां सिर्फ अपनी मांगों के लिए नहीं लड़ रहे थे, बल्कि एक-दूसरे को सुन रहे थे, साथ रहना सीख रहे थे और यह साबित कर रहे थे कि जेन-जी सिर्फ सोशल मीडिया की पीढ़ी नहीं है. यह वही पीढ़ी है जो संघर्ष को भी उम्मीद, हंसी और इंसानियत के साथ जीना जानती है. इस आंदोलन ने कई छात्रों को जीत से ज्यादा, जिंदगी भर की यादें और रिश्ते देकर विदा किया.

कशिश उन्हीं चेहरों में से एक हैं. नौकरी के साथ पढ़ाई करने वाली कशिश इस आंदोलन में तीसरी बार पहुंची थीं, लेकिन इस बार उनका अनुभव पहले दोनों मौकों से बिल्कुल अलग रहा. 

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वह कहती हैं, “मैं यहां तीसरी बार आई थी और अब जाने का मन नहीं हो रहा. पहली दो बार मैं बैनर लेकर आई थी और आज तो पता ही नहीं था कि मैं विनिंग ट्रॉफी उठाने जा रही हूं. मेरे लिए तो यह परफेक्ट आंदोलन था, जैसा हमने सोचा था, उससे कहीं खूबसूरत. बस बच्चों पर लाठी नहीं चलानी चाहिए थी.”

Photo Credit: कशिश अपने साथ सिर्फ जीत नहीं नए दोस्ती लेकर घर लौटी हैं (फोटो- एनडीटीवी)

उनके मुताबिक, इस आंदोलन ने सिर्फ मांगें नहीं मनवाईं बल्कि युवाओं के भीतर एक नया आत्मविश्वास भी पैदा किया. “हमारे अंदर गजब का जोश आ गया है. यह बच्चों के भविष्य की जीत है. इस आंदोलन ने हमें अपने बच्चों को कहानियां सुनाने का मौका दे दिया है. मैं तो उनको यही सिखाऊंगी कि बेटा, कभी हारना नहीं. हम जेन-जी वाले पुराने जमाने की बातें नहीं मानते. हम नया देख रहे हैं, पढ़ रहे हैं और सीख रहे हैं. क्या पता अगला चुनाव हम ही लड़ें.”

जंतर-मंतर से कशिश सिर्फ जीत की याद लेकर नहीं लौटीं. यहां बने कई दोस्त अब उनके इंस्टाग्राम कॉन्टैक्ट लिस्ट का हिस्सा हैं. उनका कहना है कि आंदोलन खत्म हो गया, लेकिन यहां बने रिश्ते शायद लंबे समय तक साथ रहेंगे.

मां-बाप के लिए बच्चों को प्रैक्टिकल शिक्षा देने का चांस था

जंतर-मंतर पर यह सिर्फ छात्रों का आंदोलन नहीं था, बल्कि कई परिवारों के लिए लोकतंत्र की एक खुली पाठशाला भी बन गया था. यहां मां-बाप अपने छोटे बच्चों और गोद में कुछ महीने के बेबी तक को लेकर पहुंचे. कोई तिरंगा थामे नारे लगा रहा था, तो कोई अपने बच्चे को कंधों पर बैठाकर मंच की तरफ इशारा करते हुए बता रहा था कि लोकतंत्र में अपनी बात कैसे रखी जाती है. बच्चों ने यहां आइसक्रीम खाई, म्यूजिक पर नाचे, पोस्टरों के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और हजारों युवाओं के बीच एक ऐसा माहौल देखा, जहां विरोध सिर्फ गुस्से का नहीं, बल्कि उम्मीद, एकजुटता और जिम्मेदारी का भी नाम था.

शायद यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी कहानी है. यहां मीम्स थे, रील्स थीं, इंस्टाग्राम पर बनती दोस्तियां थीं और जीत का जश्न भी था. लेकिन इन्हीं सबके बीच अनुशासन, धैर्य, सेवा और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात मनवाने का भरोसा भी था. यही वजह है कि जंतर-मंतर का यह आंदोलन सिर्फ एक सफल छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि जेन-जी की सोच और सियासी समझ की भी एक नई तस्वीर बनकर उभरा.

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