Explainer: BJP के 100 दिन: भगवा इमारतों से योजनाओं तक, ममता के बंगाल को कैसे बदल रही शुवेंदु सरकार?

19 अगस्त 2026 को पश्चिम बंगाल की पहली बीजेपी सरकार के 100 दिन पूरे होने जा रहे हैं. लेकिन इन 100 दिनों की उपलब्धियों को यह गिनकर नहीं समझा जा सकता कि सरकार ने कितने फैसले लिए. बंगाल में असली बदलाव उन चीजों में भी दिखाई दे रहा है जो सरकार की राजनीतिक पहचान बनाती हैं. कभी लाल बंगाल की पहचान थी. फिर ममता बनर्जी के दौर में सरकारी इमारतों, स्कूलों और शहर की कई जगहों पर नीला-सफेद रंग दिखाई देने लगा. अब सत्ता बदलने के बाद केसरिया रंग दिखाई दे रहा है.

नबन्ना के साइनबोर्ड का रंग नीले से केसरिया हो गया. विधानसभा और राइटर्स बिल्डिंग पर केसरिया रोशनी दिखाई दी. अकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स (ललित कला अकादमी) के एक कमरे को केसरिया रंगने पर सांस्कृतिक जगत में विवाद खड़ा हो गया. स्कूलों में वंदे मातरम को अनिवार्य किया गया. ममता सरकार के खेला होबे दिवस की जगह अब आयुष्मान दिवस मनाने का फैसला हुआ.

यानी बंगाल में सत्ता सिर्फ बदली नहीं है. सरकार यह भी दिखाना चाहती है कि सत्ता के साथ बंगाल की सरकारी और राजनीतिक पहचान भी बदल रही है.

नबन्ना के साइनबोर्ड को नीले से केसरिया रंग में बदला गया
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पहले समझिए रंग की यह राजनीति

ममता बनर्जी 2011 में सत्ता में आईं तो बंगाल की सरकारी इमारतों और दूसरे सार्वजनिक ढांचे में नीला-सफेद रंग तेजी से दिखाई देने लगा. यह रंग तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान से भी जुड़ गया.

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद तस्वीर बदलने लगी.

मई में बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद विधानसभा और राइटर्स बिल्डिंग को केसरिया रोशनी से सजाया गया. राइटर्स बिल्डिंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लंबे समय तक बंगाल की सत्ता का केंद्र रहा है. ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद प्रशासनिक कामकाज का केंद्र नबन्ना चला गया था. नई सरकार के दौर में राइटर्स बिल्डिंग को फिर से प्रशासनिक महत्व देने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है.

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. हर बदलाव को सरकारी आदेश से हुआ भगवाकरण कहना सही नहीं होगा.

उदाहरण के लिए जुलाई में नबन्ना के ऊपर लगे प्रतीकों का रंग नीले से केसरिया किया गया. राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे रखरखाव और सौंदर्यीकरण का हिस्सा बताया और कहा कि पूरे नबन्ना भवन को दोबारा रंगने का कोई आधिकारिक आदेश नहीं है. यानी बाहर से देखने में इमारत का नीला-सफेद रंग बरकरार रखा गया है, जबकि ऊपर का साइनबोर्ड केसरिया किया गया है.

राइटर्स बिल्डिंग में क्या बदला?

राइटर्स बिल्डिंग सरकारी दफ्तर होने के साथ ही बंगाल की सत्ता और इतिहास का प्रतीक है. 2011 के बाद जब ममता सरकार ने प्रशासनिक केंद्र नबन्ना ले जाना शुरू किया तो राइटर्स बिल्डिंग धीरे-धीरे सत्ता के रोजमर्रा के केंद्र से बाहर हो गई.

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद इसे फिर से राजनीतिक प्रतीक के रूप में सामने लाया जा रहा है. मई में नई सरकार के स्वागत के लिए राइटर्स बिल्डिंग को केसरिया रोशनी से सजाया गया. नई सरकार के यहां से कामकाज बढ़ाने की योजना भी इसी बड़े प्रतीकात्मक बदलाव का हिस्सा है.

इसका राजनीतिक संदेश साफ है. ममता के दौर के नबन्ना-केंद्रित प्रशासन की जगह बीजेपी पुराने सत्ता प्रतीक राइटर्स बिल्डिंग को फिर सामने ला रही है.

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कोलकाता के ललित कला अकादमी को केसरिया रंग में रंगा गया
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ललित कला अकादमी का छोटा कमरा बड़ा राजनीतिक विवाद कैसे बन गया?

जुलाई में कोलकाता की ललित कला अकादमी में एक कमरे को केसरिया रंग दिए जाने पर विवाद हो गया.

अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ इंडिया के मुताबिक यह कमरा पहले टिकट काउंटर के रूप में इस्तेमाल होता था और बाद में सिक्योरिटी रूम के तौर पर इस्तेमाल होने लगा. रिपोर्टों के मुताबिक 5 और 6 जुलाई के बीच इसे केसरिया रंग दिया गया. कुछ समय के लिए वहां नरेंद्र मोदी के पोस्टर भी लगाए गए थे, जिन्हें बाद में हटा दिया गया. 

अंग्रेजी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक इसके बाद कलाकारों और रंगकर्मियों ने विरोध किया. मामला इतना बढ़ा कि एक ही छोटे से हिस्से का रंग कुछ ही हफ्तों में टेराकोटा से केसरिया, फिर सफेद और दोबारा केसरिया हो गया. यही वजह है कि इसे अब बंगाल की कलर पॉलिटिक्स का प्रतीक माना जा रहा है.

यहां भी सावधानी जरूरी है. इसे सीधे राज्य सरकार का आधिकारिक आदेश बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं हैं. लेकिन यह घटना बताती है कि सत्ता बदलने के बाद सार्वजनिक और सांस्कृतिक संस्थानों के रंग तक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं.

सिर्फ रंग नहीं, ममता की पहचान वाली नीतियों में भी बदलाव

सबसे बड़ा बदलाव कल्याणकारी योजनाओं की राजनीति में दिखाई देता है. ममता बनर्जी के शासन की सबसे चर्चित योजनाओं में लक्ष्मी भंडार थी. बीजेपी सरकार ने इसे अन्नपूर्णा योजना से बदल दिया. नई सुवेंदु सरकार ने इस योजना में अनियमितता का हवाला देते हुए यह फैसला किया. जून में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बताया था कि टीएमसी की लक्ष्मी भंडार योजना में तीन लाख पुरुष लाभार्थी थे. इसके बाद लक्ष्मी भंडार योजना को बंद कर दिया गया.

अब नई अन्नपूर्णा योजना के तहत राज्य सरकार की आधिकारिक नोटिफिकेशन के मुताबिक पात्र महिलाओं को हर महीने 3000 रुपये की सहायता सीधे उनके बैंक खाते के दी जानी है और लक्ष्मी भंडार के लाभकर्ताओं को नई योजना में स्थानांतरित किया जाना है.

3 जून को सरकार ने योजना का पहला चरण शुरू किया और 28 लाख 25 हजार 769 महिलाओं को 3000 रुपये की राषि दिए जाने की घोषणा की.

लेकिन यहां बदलाव सिर्फ रकम का नहीं है. बीजेपी सरकार ने कल्याणकारी योजना का नाम, इसकी ब्रांडिंग और इसके लिए पात्र लोगों के सत्यापन की प्रक्रिया भी बदली है. सरकार ने कहा कि बड़ी संख्या में पुराने लाभार्थियों की दोबारा जांच की जा रही है. यही वो जगह है जहां वेलफेयर और पॉलिटिक्स एक-दूसरे से जुड़ते हैं.

खेला होबे दिवस के दौरान ममता बनर्जी
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खेला होबे दिवस से आयुष्मान दिवस

ममता सरकार ने 2021 में 16 अगस्त को खेला होबे दिवस के रूप में मनाना शुरू किया था. अब सुवेंदु सरकार ने उसी तारीख को आयुष्माण दिवस मनाने का फैसला किया है.

और संयोग देखिए. 16 अगस्त वही दिन है जिस दिन बीजेपी सरकार के 100 दिन पूरे हो रहे हैं. यानी यह केवल नाम बदलने का नहीं, बल्कि पुरानी सरकार के राजनीतिक प्रतीक को नए संकेतों से बदलने की कोशिश भी है.

बीजेपी सरकार इसी दिन पश्चिम बंगाल में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को प्रमुखता से सामने ला रही है.

पीआईबी के मुताबिक ममता सरकार के जाने के बाद इसी साल जून में पश्चिम बंगाल सरकार ने आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना लागू करने की योजना के कार्यान्वयन के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया. केंद्र के मुताबिक इससे करीब 1.43 करोड़ परिवारों को  स्वास्थ्य बीमा से जुड़े लाभ मिल सकते हैं.

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स्कूलों में भी पहचान का बदलाव

ममता सरकार के दौर में 2022 से सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलो में नीले-सफेद यूनिफॉर्म और बिस्व बंगाल लोगा लागू किया गया था.

अब बीजेपी सरकार ने उस व्यवस्था की समीक्षा करना शुरू किया है. जुलाई की रिपोर्टों के मुताबिक स्कूलों से पहले इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग रंगों और नामों के अक्षर प्रतीकों की जरूरतों को लेकर सर्वे कराया गया है. यानी ममताकालीन यूनिफॉर्म को अनिवार्य रखने की व्यवस्था पर पुनर्विचार हो रहा है.

इसके साथ एक और बड़ा बदलाव हुआ.

बीजेपी सरकार ने सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में मॉर्निंग असेंबली में वंदे मातरम को अनिवार्य कर दिया. फिर मदरसों पर भी यही आदेश लागू किया गया. यह बदलाव बीजेपी के उस राजनीतिक प्रयास से जुड़ा है जिसमें वह बंगाल में राष्ट्रीय पहचान और बंगाली पहचान को एक साथ पेश करने की कोशिश कर रही है.

10 अगस्त 2026 को तिरंगा यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी
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बीजेपी के 100 दिन में प्रशासनिक दिशा क्या बदली?

नई सरकार ने शुरुआत से ही तीन शब्दों पर जोर दिया है. सुशासन, सुरक्षा और विकास.

पहली कैबिनेट बैठक में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के अधूरे पड़े काम को पूरा करने के लिए बीएसएफ को जमीन देने का फैसला हुआ. सरकार ने 45 दिनों में जरूरी जमीन हस्तांतरण करने की बात कही.

इसके बाद भ्रष्टाचार, सिंडिकेट और माफिया नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई का दावा किया गया. मुख्यमंत्री ने जनता दरबार भी शुरू किया ताकि लोगों की शिकायतें सीधे सुनी जा सकें.

नई सरकार ने केंद्र के साथ भी नीतियों के तालमेल को तेज किया. पश्चिम बंगाल ने पीएम श्री स्कूल योजनाओं के लिए केंद्र के साथ समझौता किया, जिसे पिछली सरकार ने लागू नहीं किया था.

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100 दिन के बड़े आर्थिक दावे

सरकार के पहले बजट में 2026-27 के लिए 4.39 लाख करोड़ रुपये का कुल आवंटन रखा गया.

इसमें एक लाख सरकारी पदों पर भर्ती, सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में 20 फीसद बढ़ोतरी, नया एयरपोर्ट, पूर्वी मेदिनीपुर में गहरे समुद्र के बंदरगाह, हर विधानसभा क्षेत्र में मिनी इंडोर स्टेडियम और नॉर्थ बंगाल में IIT, IIM जैसे बड़े प्रस्ताव शामिल हैं. 

सरकार इसे रोजगार, बुनियादी सुविधाएं और निवेश की दिशा में बड़ा रीसेट बता रही है. लेकिन यहां भी एक सवाल रहेगा. घोषणा और वास्तविक डिलीवरी में कितना अंतर है?

एक लाख जॉब्स की घोषणा अपने आप में एक उपलब्धि नहीं है. असली परीक्षा तब होगी जब भर्ती प्रक्रिया पूरी होगी और युवाओं को नियुक्ति पत्र मिलेंगे. इसी तरह एयरपोर्ट, पोर्ट और शैक्षणिक संस्थानों की घोषणा का असर जमीन पर दिखने में समय लगेगा.

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महिलाओं के लिए बड़ा दावा, लेकिन विवाद भी

अन्नपूर्णा योजना को सरकार अपनी शुरुआती बड़ी उपलब्धियों में गिन सकती है. लेकिन इसकी योग्यता के सत्यापन को लेकर विवाद भी हुआ.

मुख्यमंत्री ने दावा किया कि लक्ष्मी भंडार के करीब 30 लाख लाभार्थी पात्र नहीं पाए गए या वेरिफिकेशन के बाद उनकी स्थिति बदल गई. इस प्रक्रिया को SIR और नागरिकता से जुड़े मुद्दों से भी जोड़ा गया. 

यानी BJP सरकार एक तरफ जनकल्याण योजनाओं की राशि बढ़ा रही है, दूसरी तरफ लाभार्थियों के डेटाबेस को अधिक सख्ती से सत्यापित करने की कोशिश कर रही है.

यह बदलाव आगे चलकर बंगाल की कल्याणकारी राजनीति को काफी प्रभावित कर सकता है.

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अल्पसंख्यक नीतियों में भी साफ बदलाव

नई सरकार ने धर्म पर आधारित वित्तीय सहायता को खत्म करने का फैसला किया और अल्पसंख्यक मामले एवं मदरसा शिक्षा विभाग के बजटीय आवंटन में भी बड़ी कटौती हुई.

2026-27 बजट में इस विभाग के लिए 2,175.43 करोड़ रुपये रखे गए, जो अंतरिम बजट में रखे गए 5,713.61 करोड़ रुपये से करीब 62 फीसदी कम है.

सरकार इसे समानता और भेदभाव-मुक्त जन-कल्याण के नजरिए से देखती है. विपक्ष इसे अल्पसंख्यक जनकल्याण में कटौती बताता है.

इसी तरह मदरसों का राज्यव्यापी सर्वे कराया गया. सरकार का कहना है कि इसका मकसद अपडेटेड डेटाबेस तैयार करना और प्रशासनिक अनियमितताओं की पहचान करना है, न कि तत्काल संस्थानों को बंद करना.

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तो क्या बंगाल सचमुच भगवा हो गया?

बिल्कुल नहीं, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी. बंगाल का रंग सिर्फ इमारतों से तय नहीं होता. बंगाल की राजनीति की असली परीक्षा रोजगार, उद्योग, शिक्षा, कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य, कल्याणकारी योजनाओं के वितरण और निवेश में होगी. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि बीजेपी सरकार ने सत्ता संभालते ही यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल सरकार चलाने नहीं, बल्कि सत्ता की भाषा और प्रतीकों को बदलने भी आई है.

लेकिन जब ऊपर बताए गए सभी बदलावों को साथ मिलाकर देखें तो यह स्पष्ट तौर पर दिखता है कि सुवेंदु सरकार ममता बनर्जी के 15 साल के शासन की सिर्फ नीतियों को नहीं, उसकी राजनीतिक शब्दावली को भी बदल रही है. पर असली सवाल यह नहीं है कि बंगाल का रंग नीले सफेद से भगवा या केसरिया हो रहा है. सवाल यह है कि क्या अगले पांच सालों के दौरान रोजगार, कानून-व्यवस्था, उद्योग और आम आदमी की जिंदगी में भी बदलाव उतना ही साफ दिखाई देगा? क्योंकि तब यही वो कसौटी होगी, जिस पर सुवेंदु सरकार की सरकार को परखा जाएगा.


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