खेतों में उगाते हैं शुगर फ्री आलू, सिंचाईं का खर्च भी आधा, इस किसान ने लगा लिया हर साल 2.5 करोड़ कमाई का जुगाड़

ये कहानी है मिट्टी से सोना उगाने की. ये कहानी है उस सोच को सलाम करने की, जो कहती है कि परदेस की चकाचौंध से ज्यादा चमक तो अपने वतन की मिट्टी में है. ‘खेतों की मिट्टी’ सीरीज की पहली कड़ी में आज आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसे किसान की कहानी, जिसने खेती को घाटे का सौदा बताने वालों के मुंह पर ताला लगा दिया.

ये कहानी है पंजाब के फरीदकोट के रहने वाले बोहर सिंह गिल की, जिन्हें लोग प्यार से यादवीर सिंह गिल भी कहते हैं. आज से दस साल पहले का वो दौर याद कीजिए. पंजाब के हर नौजवान की आंखों में एक ही सपना था- डॉलर, पाउंड, और विदेशी धरती. जब यादवीर के दोस्त और हमउम्र लड़के कनाडा और अमेरिका की फ्लाइट पकड़ रहे थे, तब इस 36 साल के नौजवान ने अपने गांव को चुना. उसने फैसला किया कि वो परदेस में जाकर किसी का नौकर नहीं बनेगा, बल्कि अपनी ही जमीन का बादशाह बनेगा.

फैसला ऐसा लिया कि आज जमाना मिसालें दे रहा है. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, कहानी शुरू होती है 37 एकड़ की पुश्तैनी जमीन से. शुरुआत में, वही पारंपरिक खेती गेहूं और धान. लेकिन यादवीर की सोच पारंपरिक नहीं थी. उन्होंने मिट्टी की ताकत को पहचाना और सिर्फ 2 एकड़ में आलू की फसल लगाकर एक नया दांव खेला. नतीजा ऐसा निकला कि उनकी आंखें चमक उठीं.

फिर यादवीर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने और जमीन पट्टे पर ली और आज ठीक 250 एकड़ जमीन पर आलू की खेती कर रहे हैं. और वो भी कोई मामूली आलू नहीं, बल्कि शुगर-फ्री आलू की किस्में, जिनकी बाजार में इतनी मांग है कि यादवीर अपने ऑर्डर पूरे नहीं कर पाते.

नई सोच ने बदला खेती का तरीका

सवाल ये है कि ये कमाल हुआ कैसे? यही तो कहानी का असली मजा है. यादवीर ने समझा कि खेती का भविष्य पानी बचाने और नई तकनीक अपनाने में है. उन्होंने खेतों में स्प्रिंकलर सिस्टम, यानी फुहारों से सिंचाई का ऐसा जाल बिछाया कि खेती की तस्वीर ही बदल गई. जहां पहले अंधाधुंध पानी बहाया जाता था, वहां पानी की खपत 50% से भी ज्यादा कम हो गई. इस तकनीक ने हवा से नाइट्रोजन खींचकर जमीन को और उपजाऊ बना दिया, जिससे यूरिया का खर्चा 40% घट गया.

पैदावार में ऐसा उछाल आया कि हर एकड़ में 25 क्विंटल आलू ज्यादा निकलने लगा. जहां पारंपरिक सिंचाई से एक दिन में 15-20 एकड़ जमीन भी मुश्किल से सिंच पाती थी, वहीं अब एक ही दिन में 100 एकड़ में फुहारें उड़ती हैं. अब आते हैं मुद्दे की बात कमाई पर? खर्चे निकालकर, हर एकड़ से एक लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा. यानी 250 एकड़ से सालाना 2.5 करोड़ रुपये की कमाई. यादवीर गर्व से कहते हैं, “मेरे जो दोस्त डॉलर कमाने विदेश गए थे, आज मैं अपनी मिट्टी पर उनसे ज्यादा कमा रहा हूं.”

पराली को जलाते नहीं, जमीन में मिलाते हैं

ये कहानी सिर्फ पैसों की नहीं, सोच की भी है. जिस पराली को जलाने पर हर साल हंगामा मचता है, यादवीर उसे जलाते नहीं, बल्कि वापस मिट्टी में मिलाकर जमीन को और ताकतवर बनाते हैं. आज उनके पास 5 करोड़ रुपये की खेती की मशीनें हैं और वो 250 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं.

तो अगली बार जब कोई कहे कि खेती में कुछ नहीं रखा, तो उसे पंजाब के यादवीर सिंह गिल की कहानी सुना दीजिए. जिसने साबित कर दिया कि अगर इरादे बुलंद हों और सोच में नयापन हो, तो अपनी ही जमीन आपको वो दौलत और शोहरत दे सकती है, जिसके लिए लोग सात समंदर पार जाते हैं.



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