लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में… योगी सरकार के बुलडोजर एक्शन के खिलाफ HC जज, चीफ जस्टिस पर पहुंचा केस



नई दिल्ली:

यूपी में आपराधिक मामलों के अभियुक्तों की संपत्तियों पर बुलडोजर एक्शन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों के बीच असहमति सामने आई है. यह मामला हमीरपुर से जुड़ा था, जिस पर जजों के सहमति नहीं बन सकी और अंत में इसे चीफ जस्टिस के पास भेज दिया गया है. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिविजन बेंच ने मतभेद के कारण इस मामले को अंतिम निर्णय के लिए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पास भेज दिया है, जो अब इसे किसी तीसरे जज या नई बेंच को सौंपेंगे. यह पूरा मामला हमीरपुर जिले के फैमुद्दीन और अन्य द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है. याचियों के रिश्तेदार आफान खान के खिलाफ बीएनएस, पॉक्सो एक्ट, आईटी एक्ट और यूपी गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत बेहद गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज है. 

आरोप है कि उसने एक 16 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म, आपत्तिजनक वीडियो बनाने और धर्मांतरण का दबाव बनाने की वारदात को ‘इंडियन लॉज’ नामक व्यावसायिक इमारत में अंजाम दिया था.जांच के बाद याची फैमुद्दीन को भी गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. प्रशासन द्वारा याचियों की आवासीय संपत्तियों, इंडियन लॉज और एक आरा मिल को सील करने तथा ध्वस्त करने की तैयारी की जा रही थी. याचियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दलील दी कि आफान खान का इन संपत्तियों में कोई मालिकाना हक नहीं है और प्रशासन उनके खिलाफ बिना नोटिस या सुनवाई के सामूहिक दंडात्मक कार्रवाई कर रहा है, जो कि सुप्रीम कोर्ट के ‘बुलडोजर जजमेंट’ का सीधा उल्लंघन है. 

राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि याचियों ने कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए हैं. सरकारी पक्ष के मुताबिक ‘इंडियन लॉज’ सिंचाई विभाग की जमीन पर बना एक अवैध निर्माण है, जिसे हटाने का आदेश साल 2021 की एक जनहित याचिका में पहले ही दिया जा चुका है. वहीं आरा मिल के खिलाफ वन विभाग द्वारा अलग से कार्रवाई की जा रही है क्योंकि वहां से प्रतिबंधित और संरक्षित प्रजाति की लकड़ी बरामद हुई थी. इस मामले में सुनवाई के बाद जस्टिस अतुल श्रीधरन ने यूपी में बुलडोजर एक्शन को लेकर तल्ख टिप्पणी करते हुए अपने 51 पन्नों के फैसले की शुरुआत में ही मशहूर शायर बशीर बद्र के शेर का जिक्र किया. जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘लोग टूट जाते है एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’। इस शेर के माध्यम से कोर्ट ने एक आम इंसान के जीवन में उसके मकान और छत की कीमत को समझाया. 

‘घर पूरे परिवार का होता है, जिंदगी भर की लगती है कमाई’

कोर्ट ने आगे कहा कि एक औसत नागरिक के लिए मकान का निर्माण उसके जीवनभर की गाढ़ी कमाई, परिश्रम और सपनों का चरम बिंदु होता है. घर केवल एक अचल संपत्ति नहीं है बल्कि यह पूरे परिवार की स्थिरता, सुरक्षा और बच्चों के भविष्य की सामूहिक आकांक्षाओं को संजोए रखता है. किसी व्यक्ति से उसका आश्रय अचानक और पुनर्वास का पर्याप्त समय दिए बिना छीन लेना उसे और उसके पूरे परिवार को निराशा के गहरे गर्त में धकेल देता है जिसमें बूढ़े माता-पिता, महिलाएं और बच्चे भी शामिल होते है. जस्टिस अतुल श्रीधरन ने प्रस्ताव रखा कि केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर किसी आरोपी का घर गिराना बदले की कार्रवाई है. उन्होंने निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज होने की तारीख से अगले दो वर्षों तक आरोपी के घर को ध्वस्त करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, जब तक कि सार्वजनिक भूमि को तत्काल खाली कराने की अत्यंत आवश्यकता न हो. 

‘बुलडोजर एक्शन से एक साल पहले मिलना चाहिए नोटिस’

इसके अलावा उन्होंने यह शर्त भी रखी कि तीन साल या उससे अधिक समय से बने किसी भी अवैध निर्माण पर नगर निगम या स्थानीय निकाय द्वारा कार्रवाई करने से पहले एक साल का ‘नोटिस ऑफ इंटेंट’ दिया जाना चाहिए ताकि व्यक्ति को वैकल्पिक व्यवस्था करने का समय मिल सके. फैसले के सबसे संवेदनशील और कड़े हिस्से (पैराग्राफ 67) में जस्टिस अतुल श्रीधरन ने देश के नैतिक पतन और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर तल्ख टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि आज के दौर में भ्रष्टाचार को इस हद तक सामान्य मान लिया गया है कि जब तक कोई पकड़ा न जाए तब तक लोग उसे गलत भी नहीं समझते. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि 182 देशों में भारत का स्थान 91वां है लेकिन यह स्थिति भी हमें शर्मिंदा नहीं करती। कोर्ट ने देश की सामूहिक ईमानदारी पर सवाल उठाते हुए आगे टिप्पणी की कि हाल ही में राम मंदिर में हुए चंदे की चोरी से जुड़ा विवाद उस ऊँट की पीठ पर आखिरी तिनके की तरह है. 

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का भी अदालत में हुआ जिक्र

उस समाज को कोई भी चीज शर्मिंदा नहीं कर सकती जो राम मंदिर जैसे आस्था के सर्वोच्च केंद्र पर हुई चंदे की चोरी से भी विचलित नहीं होती क्योंकि यह घटना भारतीय ईमानदारी के सबसे निचले स्तर को दर्शाती है. कोर्ट ने कहा कि इसी संस्थागत बेईमानी के कारण म्यूनिसिपल अधिकारी रिश्वत लेकर पहले अवैध निर्माण होने देते हैं और दशकों बाद अचानक जागकर आम जनता के घर उजाड़ने पहुंच जाते है. अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि यदि राज्य वास्तव में भ्रष्टाचार खत्म करना चाहता है, तो उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में संशोधन करके दोषी अधिकारियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान शामिल करने पर विचार करना चाहिए. याचिकाकर्ता फैमुद्दीन और अन्य के घर और इंडियन लॉज के खिलाफ चल रही ध्वस्तीकरण की कार्यवाही को अदालत ने ‘प्रतिशोधात्मक विवेक’ से ग्रसित मानते हुए पूरी तरह से रद्द कर दिया. 

जज बोले- आरोपी के दूर के रिश्तेदार का घर गिराना तो जायज नहीं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता मुख्य आरोपी के केवल दूर के रिश्तेदार हैं और उनके वैध आशियाने को निशाना बनाना सरासर नाइंसाफी है. वहीं जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने अपने सहयोगी जज जस्टिस अतुल श्रीधरन के फैसले के कई महत्वपूर्ण हिस्सों से पूरी तरह असहमति जताई है. जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि कानून में कहीं भी कार्रवाई से एक साल पहले ‘नोटिस ऑफ इंटेंट’ देने का प्रावधान नहीं है. उत्तर प्रदेश नगर नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 में पहले से ही नोटिस देने और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के पालन की पर्याप्त व्यवस्था है. इसलिए कोर्ट द्वारा अपनी तरफ से नई समय-सीमा तय करना अनावश्यक न्यायिक सक्रियता होगी. उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियां असीमित नहीं हैं और कोर्ट को आत्म-संयम बरतना चाहिए.




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