गांव की खाने-पीने की छोटी सी दुकान, कमाई 1.95 लाख रुपए महीना, बिजनेस का ऐसा तरीका सुन लोगों को नहीं हो रहा यकीन

Viral Story: क्या एक छोटी सी सड़क किनारे की दुकान हर महीने लाखों का कारोबार कर सकती है? शायद आपका जवाब होगा- मुश्किल है. लेकिन सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ऐसी कहानी वायरल हो रही है, जो आपकी इस सोच को पूरी तरह बदल देगी. यह कहानी है गांव के पास हाईवे किनारे चलने वाली एक छोटी सी खाने की दुकान की, जिसके मालिक का दावा है कि वे हर दिन 65 से ज्यादा ग्राहकों को खाना और टिफिन सर्विस देते हैं.

यह पूरी चर्चा तब शुरू हुई जब नलिनी उनागर नाम की एक महिला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर इस दुकान की सफलता की कहानी शेयर की. 

सिर्फ 100 रुपये में भरपेट देसी स्वाद

इस दुकान पर मिलने वाली एक फुल थाली की कीमत मात्र 100 रुपये है. अब आप सोचेंगे कि इतने कम दाम में क्या मिलता होगा? तो आपको बता दें कि इस थाली में दो तरह की सब्जियां, गरमा-गरम रोटी, दाल, चावल, पापड़ और सलाद शामिल है. यानी पूरा घर जैसा खाना, वो भी बेहद सस्ते दाम पर. जब नलिनी ने दुकान के मालिक से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि मुख्य सड़क पर दुकान होने की वजह से हर दिन करीब 25 से ज्यादा लोग यहां आकर खाना खाते हैं. लेकिन असली खेल तो टिफिन सर्विस का है. दुकान को हर दिन 40 से ज्यादा पक्के टिफिन ऑर्डर मिलते हैं. 

गांव में टिफिन कौन लेता है?

लेकिन क्या गांव में कोई टिफिन लेता होगा? दुकान के मालिक ने इसका जवाब दिया. उसने बताया कि गांव के खेतों में काम करने वाले मजदूर और वे बुजुर्ग जो घरों में अकेले रहते हैं और खुद खाना नहीं बना सकते, वे इनके सबसे पक्के ग्राहक हैं.

कमाई का गणित: लाखों का टर्नओवर

अगर दुकान के मालिक के आंकड़ों को सच मानें, तो गणित कुछ इस तरह बैठता है- 

रोजाना की कमाई: 65 थाली × 100 रुपये = 6,500 रुपये रोज.

मासिक सेल: 30 दिनों के हिसाब से = 1.95 लाख रुपये मंथली.( तकरीबन दो लाख)

सालाना टर्नओवर: 23.4 लाख रुपए. 

बिना किसी बाहरी खर्च के बंपर मुनाफा

इस बिजनेस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कोई फालतू का खर्च नहीं है. पति-पत्नी मिलकर खुद ही सारा खाना बनाते हैं, यानी किसी स्टाफ या हेल्पर की सैलरी का कोई खर्च नहीं. इसके अलावा, उनका अपना एक छोटा सा खेत भी है जहां वे सब्जियां उगाते हैं. इससे खाने की सामग्री का खर्च भी काफी बच जाता है.

दावा किया जा रहा है कि इस दुकान का नेट प्रॉफिट मार्जिन कम से कम 60% है, यानी हर महीने करीब 1 लाख रुपये से ज्यादा की शुद्ध बचत. 

क्या वाकई इतना मुनाफा मुमकिन है?

कहानी के वायरल होने के बाद इंटरनेट पर लोग दो खेमों में बंट गए हैं. एक यूजर ने लिखा, “महीने की 1.95 लाख रुपये की सेल की बात तो समझ आती है, लेकिन 1 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर लगता है. 60% का मार्जिन सिर्फ एक अंदाजा है, कोई पक्का कैलकुलेशन नहीं.”

उनका तर्क था कि असली मुनाफा निकालने के लिए एलपीजी सिलेंडर, बिजली, पैकेजिंग, खाने की बर्बादी, होम डिलीवरी का खर्च, दुकान का किराया और सबसे बढ़कर पति-पत्नी की अपनी मेहनत की कीमत (लेबर कॉस्ट) को भी जोड़ना होगा. 

वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि इसमें हैरान होने जैसी कोई बात ही नहीं है. भारत की असली अर्थव्यवस्था तो ऐसे ही छोटे और मझोले उद्योगों के दम पर चलती है.

दूसरी तरफ, नौकरीपेशा लोगों का दर्द भी यहां छलक उठा. एक यूजर ने चुटकी लेते हुए लिखा, “हम नौकरीपेशा लोग तो अपनी सैलरी पर भारी-भरकम टैक्स देते हैं, जबकि ये लोग बिना टैक्स दिए बंपर कमाई भी करते हैं और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का फायदा भी उठाते हैं.”

कई लोगों ने कहा कि फूड बिजनेस में सबसे जरूरी चीज क्वालिटी है. एक यूजर ने सलाह दी, “खाने के काम में मुनाफा तभी है, जब आप साफ-सफाई, शुद्ध मसालों और असली स्वाद पर ध्यान दें. अगर शॉर्टकट अपनाएंगे, तो दुकान लंबी नहीं चल पाएगी.” 

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