आरक्षण बहाना है- यूपी विधानसभा चुनाव में विपक्ष को लोकसभा चुनाव वाला फॉर्मूला आजमाना है?
Raisina News Desk- अगस्त 26, 2026 07:36 AM IST

लखनऊ:
उत्तरप्रदेश की राजनीति में आरक्षण की एंट्री हो चुकी है. इसकी शुरुआत तो वैसे उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के आरक्षण हटाओ आंदोलन के हर्ष दुबे से मुलाकात और प्रेस कांफ्रेंस से ही हो गई थी. बृजेश पाठक की इस मुलाकात और हर्ष दुबे की बात केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने की बात कहने के बाद जाहिर है अखिलेश यादव को मौका मिल गया और उन्होंने सरकार पर आरक्षण को खत्म करने का आरोप लगा दिया.आरक्षण को लेकर उत्तर प्रदेश में घमासान कोई नई बात नहीं है.यदि आपको याद होगा तो पिछले लोकसभा चुनाव भी संविधान बचाने के नाम पर विपक्ष लड़ा था और उत्तरप्रदेश में उसे अच्छी खासी सफलता मिली थी.
आज के दिन उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 43 सीटों पर सपा और कांग्रेस का कब्जा है. मतलब विपक्ष के लिए यह आजमाया हुआ नुस्खा है. दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को एक साझा चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने जनगणना में ओबीसी जातियों को ना गिने जाने पर आपत्ति उठाई है. दरअसल जनगणना में पिछड़ी जातियों के लिए कोई अलग से कॉलम नहीं है बल्कि इसके बजाय केवल पिछड़ी जाति या ओबीसी लिखा है. इस पर खरगे जी का कहना है कि ‘जातियों की गिनती सही तरीके से नहीं हो रही है.एक ही जाति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और उपजातियों से जानी जाती है. एक ही जाति के लोग जनगणना में अलग-अलग नामों में दर्ज होंगे. इसलिए जो प्रक्रिया अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए अपनाई जाती है, वही प्रक्रिया ओबीसी के लिए अपनाई जाए.’
उत्तर प्रदेश की को यदि 1931 की जनगणना के हिसाब से जातियों के आधार पर वर्गीकृत करें तो करीब 40 फीसदी आबादी पिछड़ी जातियों की है. करीब 21 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 19 फीसदी मुस्लिम और करीब 15 फीसदी तक अगड़ी जाति है. पिछड़ी जातियों में यादव करीब 10 फीसदी हैं तो अनुसूचित जातियों में जाटव करीब 12 फीसदी हैं. वहीं अगड़ी जातियों में ब्राह्मण और राजपूत करीब करीब 10-10 फीसदी हैं. जातियों की बात करते वक्त 1931 की जनगणना का हवाला इसलिए लिया जाता है कि उसके बाद देश में जाति के आधार पर जनगणना नहीं हुई केवल अनुसूचित जाति और जनजातियों की जनगणना हुई है.
उत्तर प्रदेश के इस चुनाव से पहले जिस ढंग से आरक्षण विरोध को लेकर चर्चाएं शुरू हुई है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जरूर चाहेगी कि यह मुद्दा बने और जिसकी जितनी संख्या उसकी उतनी भागीदारी तक बात पहुंचे. हालांकि उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव से पहले तक पिछड़ी जातियों ने भाजपा का ही साथ दिया है. यही हाल अनुसूचित जाति का भी है केवल जाटवों को छोड़ कर बाकी अनुसूचित जाति भाजपा के साथ हो गई, जिसकी वजह से आज के दिन भाजपा का ना उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई विधायक है और ना ही लोकसभा में कोई सांसद.
उत्तर प्रदेश में फिलहाल भाजपा नाराज अगड़ी जातियों को संभालने में लगी है. अखिलेश यादव पीडीए के जरिए पिछड़े दलित और मुस्लिम वोट बैंक को साधने में लगे थे. इसका फायदा INDIA गठबंधन को लोकसभा चुनाव में तो हुआ है. मगर क्या यही फ़ार्मूला विधानसभा चुनाव में कामयाब रहेगा यह देखना होगा क्योंकि विधानसभा चुनाव में खासकर उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा रहता है और भाजपा के 80 और 20 की राजनीति की काट क्या पीडीए से दिया जा सकता है. यह तो वक्त बताएगा मगर यदि INDIA गठबंधन आने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव को आरक्षण की पिच पर ला पाते हैं तो क्या पता चौंकाने वाले नतीजे भी आ सकते हैं जैसा कि लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था.