'मस्जिद को मंदिर, मंदिर को चर्च नहीं बना सकते', संभल शाही जामा मस्जिद मामले में SC में मस्जिद कमेटी की दलील
Raisina News Desk- सितंबर 08, 2026 09:54 PM IST

संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान धार्मिक स्थलों के चरित्र के संरक्षण और सहिष्णुता के महत्व पर जोर दिया गया. मस्जिद कमेटी की ओर से वरिष्ठ वकील अहमदी ने दलील दी कि यदि कोई पूजा स्थल प्राचीन स्मारक भी है तो उसके प्राचीन स्वरूप के साथ-साथ उसके धार्मिक चरित्र का संरक्षण भी जरूरी है.
अहमदी ने कहा कि कानून का मकसद प्राचीन स्मारकों का संरक्षण है और संरक्षण में उसके चरित्र को बनाए रखना भी शामिल है. उन्होंने मिसाल देते हुए कहा कि अगर कोई स्थान मंदिर है तो उसे चर्च में या अगर कोई मस्जिद है तो उसे मंदिर में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
सुनवाई के दौरान जस्टिस पी एस नरसिम्हा ने सहिष्णुता के महत्व पर जोर दिया. दरअसल अहमदी ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले बिजॉय इमेनुअल फैसले में जस्टिस रेड्डी की सहिष्णुता संबंधी टिप्पणी का हवाला दिया. इसके बाद जस्टिस नरसिम्हा ने भी कहा कि हमें टॉलरेंस रखना चाहिए.
यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत में धार्मिक स्थल, उसके चरित्र और अलग-अलग धार्मिक अधिकारों से जुड़े कानूनी पहलुओं पर दलीलें दी जा रही थीं.
अहमदी ने निचली अदालत की ओर से कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करने के आदेश को भी चुनौती दी. उन्होंने कहा कि 19 नवंबर 2024 को वादी की ओर से सर्वे, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए आवेदन दिया गया और ट्रायल कोर्ट ने बिना दूसरे पक्ष को नोटिस दिए एकतरफा आदेश पारित कर दिया.
उनका कहना था कि CPC के आदेश 26 नियम 9 के तहत स्थानीय जांच के लिए कमिश्नर नियुक्त करने से पहले अदालत को यह संतुष्टि दर्ज करनी होती है कि ऐसी जांच आवश्यक है. लेकिन ट्रायल कोर्ट के आदेश में ऐसी कोई स्पष्ट संतुष्टि नहीं है.
अहमदी ने कहा कि अदालत को यह भी साफ करना चाहिए था कि कमिश्नर किन बिंदुओं पर स्थानीय जांच करेगा और क्या रिकॉर्ड करेगा. उन्होंने कहा कि मामला बेहद संवेदनशील था और कमिश्नर की नियुक्ति के अगले दिन मौके पर पहुंचने के बाद हिंसा हुई, जिसमें छह लोगों की मौत हुई. ऐसे में इतनी जल्दबाजी में कमिश्नर नियुक्त करने की जरूरत पर भी सवाल उठता है.
उन्होंने हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण पर भी आपत्ति जताई जिसमें कहा गया था कि पक्षकार कमिश्नर के जरिए बेहतर साक्ष्य हासिल कर सकता है. अहमदी ने कहा कि यह CPC की मूल भावना के विपरीत है.
अहमदी ने हाईकोर्ट के फैसले में समझौते की व्याख्या पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि सिर्फ इसलिए कि किसी समझौते के तहत मुतवल्ली को अधिकार दिए गए, इससे संपत्ति का स्वामित्व उसके पास नहीं चला जाता. उन्होंने कहा हम कस्टोडियन हैं, स्वामित्व अल्लाह का है.
अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि प्राचीन स्मारक अधिनियम, 1958 और प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 को एक साथ पढ़ना जरूरी है. उन्होंने कहा कि दोनों कानून मिलकर एक कंपोजिट कोड बनाते हैं. इन्हें अलग-अलग पढ़ने पर कानून के संरक्षण में ऐसी खिड़की बन जाएगी जिससे उसके मूल उद्देश्य पर ही असर पड़ेगा.
सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि मामले की सुनवाई आज पूरी हो जाएगी लेकिन अब आगे सुनवाई करेंगे. वहीं हिंदू पक्ष की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि उनको दलीलें रखने के लिए समय चाहिए.