मेयर या नगर निगम कमिश्नर, आपका शहर कौन चलाता है?
Raisina News Desk- सितंबर 27, 2026 07:19 AM IST
अगर आप किसी से पूछें कि आपका शहर कौन चलाता है, तो ज्यादातर लोग कहेंगे, मेयर. यह जवाब गलत भी नहीं है. दुनिया के बहुत से देशों में सचमुच मेयर ही शहर चलाता है. लोग उसे चुनते हैं. वह शहर की जिम्मेदारी संभालता है. शहर में कुछ अच्छा हो तो उसका श्रेय उसे मिलता है और कुछ खराब हो तो सवाल भी उसी से पूछा जाता है. लेकिन भारत के ज्यादातर शहरों में कहानी थोड़ी अलग है.
मेयर होते हैं. पद भी होता है. सरकारी कार्यक्रमों में उनके लिए कुर्सी भी होती है और सम्मान भी. वे मेहमानों का स्वागत करते हैं, कार्यक्रमों में रिबन काटते हैं और शहर की ओर से कई जगहों पर उसका प्रतिनिधित्व करते हैं. लेकिन ज्यादातर भारतीय शहरों में मेयर का काम मुख्य रूप से औपचारिक होता है. शहर रोज़ कैसे चलेगा, इसका असली फैसला अक्सर मेयर नहीं करता. यह जिम्मेदारी आम तौर पर एक अधिकारी के पास होती है, जिसे नगर निगम आयुक्त (Municipal Commissioner) कहा जाता है.
नगर निगम आयुक्त को शहर के लोग वोट देकर नहीं चुनते. उन्हें राज्य सरकार नियुक्त करती है. आम तौर पर वे एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी होते हैं, जिन्हें राज्य की प्रशासनिक सेवा से यहां भेजा जाता है. शहर को रोज़ चलाने वाले कई विभाग उनके अधीन होते हैं. पानी की व्यवस्था, कूड़ा उठाना, सड़कें, नालियां, इमारत बनाने की अनुमति और ऐसी कई जरूरी सेवाएं. अगर हर बारिश में आपकी गली पानी में डूब जाती है या आपका कूड़ा समय पर नहीं उठता, तो उसे ठीक करने की जिम्मेदारी आम तौर पर मेयर से ज्यादा नगर निगम आयुक्त के कार्यालय की होती है.
अब इस कहानी का एक हिस्सा और भी अजीब है. मेयर को उन लोगों को जवाब देना होता है, जिन्होंने उन्हें चुना है. लेकिन नगर निगम आयुक्त को शहर के मतदाताओं को जवाब नहीं देना होता. उन्हें उस राज्य सरकार को जवाब देना होता है, जिसने उन्हें नियुक्त किया है. और नगर निगम आयुक्त भी अक्सर बहुत लंबे समय तक एक ही शहर में नहीं रहते.
भारत के अलग-अलग शहरों में उनका औसत कार्यकाल करीब 10 महीने का बताया जाता है. जरा सोचिए, अगर आपको किसी शहर की पानी की समस्या ठीक करनी हो, या अगले पांच साल के लिए नई सड़कें बनानी हों, और आपको यह भी पता हो कि एक साल पूरा होने से पहले ही आपका तबादला हो सकता है, तो आप कितना लंबा काम कर पाएंगे?
साल 1992 में संविधान में एक बदलाव किया गया था, ताकि इसी समस्या को ठीक किया जा सके. इसे 74वां संविधान संशोधन कहा गया. इसका उद्देश्य था कि शहरों की चुनी हुई सरकारों को, जिसमें मेयर भी शामिल हैं, असली ताकत दी जाए. उन्हें 18 खास क्षेत्रों में काम करने की जिम्मेदारी दी जानी थी. इनमें शहर की योजना बनाना, झुग्गी-बस्तियों में सुधार और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे काम शामिल थे.
30 साल से ज्यादा समय बीत गया, लेकिन भारत के किसी भी राज्य ने इन सभी 18 क्षेत्रों की पूरी जिम्मेदारी शहरों को नहीं दी है. ज्यादातर राज्यों ने शहर की योजना, बजट और असली प्रशासनिक ताकत अपने पास ही रखी. मेयर के पास पद तो रहा, लेकिन रोज़मर्रा के काम करने की ताकत सीमित रही. जिस कानून का उद्देश्य मेयर को अपने शहर का छोटे स्तर का मुख्यमंत्री जैसा अधिकार देना था, वह पूरी तरह उस रूप में जमीन पर नहीं उतर पाया.
संविधान ने यह भी राज्यों पर छोड़ा कि मेयर को जनता सीधे चुनेगी या शहर के चुने हुए पार्षदों में से कोई उन्हें चुनेगा. ज्यादातर राज्यों ने दूसरा रास्ता अपनाया. इसमें मेयर का चुनाव सीधे शहर के लोगों से नहीं होता. कई बार इससे ऐसा होता है कि मेयर शहर के लोगों से ज्यादा अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई देते हैं.
इसलिए जब बेंगलुरु का कोई व्यक्ति ट्रैफिक में फंसता है, या मुंबई में बारिश के दौरान किसी व्यक्ति के घुटनों तक पानी भर जाता है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? का सीधा जवाब अक्सर शहर के चुने हुए मेयर तक नहीं जाता. सवाल उस नगर निगम आयुक्त तक जाता है जिसे राज्य सरकार ने नियुक्त किया है. और कई मामलों में उससे भी ऊपर, राज्य के मुख्यमंत्री तक पहुंचता है.
यह कोई छोटी प्रशासनिक बात नहीं है. यह उस फर्क को दिखाता है जो हम अपने शहरों के बारे में सोचते हैं और जिस तरह शहर वास्तव में चलते हैं, उनके बीच मौजूद है. और यह फर्क इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब तक आपको यह पता नहीं होगा कि जिम्मेदारी असल में किसकी है, तब तक आप सही व्यक्ति से सही सवाल भी नहीं पूछ पाएंगे.
तो एक छोटा सा प्रयोग करके देखिए. क्या आप अपने शहर के मौजूदा मेयर का नाम बता सकते हैं? अब क्या आप अपने शहर के नगर निगम आयुक्त का नाम बता सकते हैं? अगर दूसरा नाम याद करना मुश्किल है, या आपने उसका नाम कभी सुना ही नहीं, तो आप अकेले नहीं हैं. भारत के ज्यादातर शहरों में रहने वाले ज्यादातर लोग इन दोनों सवालों का जवाब नहीं दे पाएंगे. लेकिन बहुत संभव है कि उन दोनों में से दूसरा व्यक्ति ही यह तय करने में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाता हो कि इस साल आपकी गली की सड़क बनेगी या नहीं. शायद अगली बार जब आपकी गली का गड्ढा एक चुनाव से भी ज्यादा समय तक बना रहे, तब यह पता करना ठीक रहेगा कि उसे भरने का फैसला आखिर कौन करता है.