कितनी मजबूत होगी सपा के साथ कांग्रेस के गठबंधन की गांठ? इमरान मसूद के प्रमोशन ने उठाए सवाल
Raisina News Desk- अक्टूबर 06, 2026 02:51 AM IST
नई दिल्ली:
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले कांग्रेस ने अपनी टीम बदल दी है. टीम भले ही बन गई हो लेकिन समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर अब भी बात नहीं बन सकी है.
कांग्रेस ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अखिलेश यादव को साधने की कोशिश की है. वह इसलिए क्योंकि आराधना मिश्रा को अखिलेश यादव का करीबी माना जाता है. लेकिन इसके साथ ही समाजवादी पार्टी के ‘बड़े भाई’ वाले रवैये की आलोचना करने वाले इमरान मसूद को भी कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करने से कांग्रेस के इरादों पर सवाल भी उठते हैं.
सवाल यह भी उठता है कि जब सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों पार्टियां बातचीत की टेबल पर बैठेंगी तो यह विरोधाभास कैसे सुलझेगा? खासकर तब, जब सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों ही पार्टी के नेताओं के बीच जबरदस्त और तीखी बयानबाजी चल रही है. कांग्रेस कह रही है कि सीटों का बंटवारा सम्मान और बराबरी के आधार पर होना चाहिए. जबकि अखिलेश यादव का कहना है कि बात सीट की नहीं, जीत की होनी चाहिए.
हालांकि, आराधना मिश्रा ‘मोना’ का कहना है कि कांग्रेस ने हमेशा गठबंधन धर्म निभाया है और आगे भी निभाएंगे. उनका यह भी कहना है कि भाजपा को हराने के लिए जो कुछ करना होगा, वह करेंगे.
कांग्रेस ने हाल ही में अपनी नई टीम बनाई है. इस टीम में इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. इमरान मसूद सहारनपुर से लोकसभा सांसद हैं.
इमरान मसूद कांग्रेस के एक ऐसे नेता रहे हैं जो अखिलेश यादव और सपा पर हमलावर रहते हैं. हाल ही में अखिलेश के ‘सीट नहीं जीत पर बात होनी चाहिए’ के जवाब में इमरान मसूद ने भी कहा कि ‘सीट होगी तभी तो जीत होगी.’
सपा यूपी में ‘बड़े भाई’ की भूमिका में दिखती है और इमरान मसूद इसके खिलाफ हैं. उन्होंने जून में X पर एक पोस्ट एक वीडियो में कहा था कि कांग्रेस अब उस फॉर्मूले को नहीं मानेगी, जिसे सपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में लागू किया था और पार्टी यूपी में 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.
इमरान मसूद सपा के खिलाफ कई बार तीखी बयानबाजी करते रहे हैं. उन्होंने जुलाई में कहा था, ‘अगर आप गठबंधन का शोर मचा रहे हैं तो इसे जमीनी स्तर पर लाएं. अगर आप इसे जमीनी स्तर पर लाते हैं और यह सिर्फ टीवी और बयानों तक ही सीमित रहता है तो ऐसे गठबंधन का क्या मतलब है?’
पिछले महीने ही सितंबर में इमरान मसूद ने गठबंधन को लेकर कहा था, ‘अगर गठबंधन करना है तो उसे पक्का कर लेना चाहिए. वरना हमें अपनी तैयारी खुद शुरू कर देनी चाहिए. सिर्फ यहां ही नहीं, बल्कि पूरे देश में राजनीतिक माहौल ऐसा है कि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई सिर्फ कांग्रेस के साथ ही लड़ी जा सकती है.’
उन्होंने कहा था कि राहुल गांधी का नेतृत्व उन्हें हराने में सक्षम है. गठबंधन को तुरंत अंतिम रूप देना चाहिए. अगर इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया तो जमीनी स्तर पर इसका नुकसान होगा.
एक तरफ इमरान मसूद गठबंधन को लेकर हमलावर रहते हैं तो दूसरी तरफ सपा भी उतनी ही सख्त अंदाज में जवाब देती है.
इमरान मसूद के बयानों के बारे में पूछे जाने पर अखिलेश ने एक बार कहा था- ‘किसी के भी दिए गए बयान से मेरा कोई लेना-देना नहीं है. हमारा इंडिया ब्लॉक मजबूत है. जो लोग इंडिया ब्लॉक छोड़ना चाहते हैं, वे जा सकते हैं.’
सपा के दूसरे नेता भी खुलकर जवाब देते हैं. सपा सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने कहा था कि कांग्रेस के पास कोई जनादेश नहीं है. अगर वे हमारे साथ मिलकर लड़ते हैं तो उन्हें फायदा होगा. अगर वे साथ मिलकर लड़ते हैं तो उन्हें फायदा होगा.
लेकिन सपा नेताओं के बयानों को दरकिनार कर इमरान मसूद को अहमियत देना कांग्रेस की सपा पर दबाव बनाए रखने की उसकी रणनीति का हिस्सा हो सकती है.
इमरान मसूद कांग्रेस के लिए वह नेता हैं, जो मुस्लिम वोटों को साथ ला सकते हैं. इमरान मसूद पार्टी का बड़ा मुस्लिम चेहरा है. माना जा रहा है कि इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर मुस्लिमों को साधने की कोशिश की है.
कुछ दशक पहले तक उत्तर प्रदेश और कई कई राज्यों में ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस का कोर वोटबैंक माना जाता था, हालांकि मंडल की राजनीति और भाजपा के उभार के बाद कांग्रेस का यह समीकरण बिखर गया.
इमरान मसूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं. वह 2024 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए. इससे पहले वह विधायक और सहारनपुर नगर पालिका के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.
हालांकि, कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक को अब असदुद्दीन ओवैसी से भी चुनौती मिल रही है. ओवैसी की पार्टी यूपी में चुनाव लड़ने की तैयारी में है. ओवैसी ने पिछले महीने चेतावनी दी थी कि अगर सपा-कांग्रेस गठबंधन नहीं करते हैं तो वह दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन करने को तैयार हैं.
इस पर इमरान मसूद ने कहा था, ‘बीजेपी को हराना ही अहम मकसद है और अकेले मुसलमान उसे नहीं हरा सकते. अगर बीजेपी जीतती है और सरकार बनाती है, तो इसका खामियाजा मुसलमानों को ही भुगतना पड़ता है. हैदराबाद का राजनीतिक माहौल उत्तर प्रदेश से अलग है. ओवैसी जी भले ही 4-5 सीटें जीत जाएं, लेकिन अंत में वे बीजेपी की सरकार बनने में ही मदद करते हैं. अगर बीजेपी की सरकार बनती है, तो नुकसान किसका होगा?’
मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक पर अपनी पकड़ बनाए रखी है. पार्टी के पास एक और इमरान भी हैं और वह हैं राज्यसभा सांसद और माइनॉरिटी विंग के अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी, जिन्हें समाजवादी पार्टी से नाराज मुस्लिम नेताओं को कांग्रेस में लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
इमरान मसूद आज कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हैं, लेकिन 2022 के चुनावों से पहले वह कांग्रेस छोड़कर सपा में चले गए थे. हालांकि, उसी साल उन्होंने सपा छोड़कर बसपा जॉइन कर ली. 2023 में मसूद फिर कांग्रेस में लौट आए थे. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर वह सहारनपुर से सांसद बने.