Power of Attorney : क्या बैनामा और वसीयत से ज्यादा अहम है पॉवर ऑफ अटॉर्नी, कब-किस मामले में करती है काम?

Power of Attorney : क्या बैनामा और वसीयत से ज्यादा अहम है पॉवर ऑफ अटॉर्नी, कब-किस मामले में करती है काम?

Power of Attorney : पॉवर ऑफ अटॉर्नी के बारे में तो आपने कई बार सुना होगा. लेकिन, इसकी पॉवर असल में कितनी होती है, यह कम ही लोग जानते होंगे. अगर आप रजिस्ट्री, वसीयत और पॉवर ऑफ अटॉर्नी में से कौन सा ताकतवर होता है, यह नहीं जानते तो संपत्ति का सौदा करने से पहले इस बारे में अपनी कंफ्यूजन क्लीयर करना बेहतर होगा.

नई दिल्ली. एनसीआर के रहने वाले उमाकांत झा की पटना में काफी जमीन है. कुछ एक फ्लैट और मकान भी बने हैं. उमाकांत ने नोएडा में भी अपना घर बनवा लिया है और वहीं परिवार के साथ सेटल हो गए हैं. उनका बिजनेस भी दिल्ली-एनसीआर में फैला है, लिहाजा पटना आना-जाना काफी कम हो पाता है. उनकी दिक्कत ये है कि बिना पटना में रहे अपनी प्रॉपर्टी कैसे बेचें. अब उनके सामने पॉवर ऑफ अटॉर्नी ही यह जरिया है, जो बिना किसी दिक्कत के उनका सौदा पूरा कर सकता है. आपने भी कई बार पॉवर ऑफ अटॉर्नी के बारे में सुना होगा, लेकिन इसके बारे में कितना जानते हैं आप. क्या पॉवर ऑफ अटॉर्नी बाकी सभी दस्तावेजों से ऊपर होता है और इसका इस्तेमाल कब किया जाता है.

पॉवर ऑफ अटॉर्नी यानी मुख्तारनामा पर सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में एक फैसला दिया था, जिसमें कहा था कि यह दस्तावेज किसी को भी स्वत: मालिकाना हक नहीं देता है. इससे जाहिर होता है कि यह सिर्फ एक कानूनी दस्तावेजा है, जो किसी व्यक्ति को अपनी तरफ से अन्य किसी को प्रतिनिधि बनाने और संपत्ति या अन्य वित्तीय काम करने का अधिकार देता है. मसलन, उमाकांत झा जी नोएडा में रहते हैं लेकिन वह पटना में किसी परिचित के नाम पॉवर ऑफ अटॉर्नी बनवाकर उन्हें अपनी संपत्ति का सौदा करने का अधिकार दे सकते हैं. यह डॉक्यूमेंट अन्य किसी को भी संपत्ति की देखरेख, किराया वसूलने अथवा रजिस्ट्री से जुडे़ काम करने का भी अधिकार देता है.

रजिस्ट्री और पॉवर अटॉर्नी में ज्यादा मजबूत कौन
सु्प्रीम कोर्ट ने सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज वर्सेज स्टेट ऑफ हरियाणा के मामले में स्पष्ट किया है कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी से संपत्ति का मालिकाना हक अपने आप किसी को ट्रांसफर नहीं होता. यह सिर्फ अधिकार सौंपने का दस्तावेज है, किसी को संपत्ति बेचने या ट्रासंफर करने का विकल्प नहीं है. इसका मतलब है कि रजिस्ट्री के मुकाबले पॉवर ऑफ अटॉर्नी का कोई जोर नहीं है. रजिस्ट्री को ही हर मायने संपत्ति ट्रांसफर करने का जरिया माना गया है.

गिफ्ट डीड, वसीयत से बड़ी है पॉवर ऑफ अटॉर्नी
यहां भी सुप्रीम कोर्ट का वही फैसला लागू होता है कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी सिर्फ अधिकारों का हस्तांतरण है, न कि किसी संपत्ति पर मालिकाना हक तय करने और उसके ट्रांसफर करने का अधिकार. इस लिहाज से पॉवर ऑफ अटॉर्नी की शक्तियां गिफ्ट डीड और वसीयत के सामने भी फीकी पड़ जाती है. गिफ्ट डीडी एक तरह की सेल डीड ही होती है, जो खून के रिश्तों के बीच संपत्ति के ट्रांसफर में काम आती है. इसी तरह, वसीयत किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद ही लागू होती है. वसीयत भी एक तरह का संपत्ति टांसफर डॉक्यूमेंट होता है लेकिन यह जीते जी लागू नहीं होता है.

Prev Post
Next Post