क्या है यह होम स्कूलिंग? जो बना अमेरिका की चरमराती शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा सबूत!

भारत में जब भी सरकारी स्कूलों की चर्चा होती है, तो वह अक्सर स्कूलों की बदहाली, शिक्षकों की कमी और पढ़ाई के गिरते स्तर को कोसने पर ही खत्म होती है. हर किसी के मन में यह आम धारणा बन चुकी है कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में तो शिक्षा व्यवस्था एकदम चकाचक होगी, मगर जमीनी हकीकत बेहद कड़वी है. अमेरिका में केवल सरकारी ही नहीं, बल्कि प्राइवेट स्कूलों की स्थिति भी चिंताजनक हो चुकी है. इसकी एक बानगी होम-स्कूलिंग के आंकड़े हैं.

क्या है होम-स्कूलिंग और क्यों बढ़ रहा इसका चलन?

होम-स्कूलिंग का मतलब बच्चों को किसी सरकारी या प्राइवेट स्कूल में भेजने के बजाय घर पर ही माता-पिता या ट्यूटर द्वारा पढ़ाना है. अमेरिका में हजारों अभिभावक पारंपरिक स्कूलों का बहिष्कार कर चुके हैं. बीते 15 सालों में अमेरिका के न्यूयॉर्क में होम-स्कूलिंग अपनाने वाले परिवारों की संख्या में 200 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है.

न्यूयॉर्क पोस्ट की खबर के अनुसार, पूरे न्यूयॉर्क राज्य में होम-स्कूलिंग करने वाले बच्चों की संख्या वर्ष 2009-10 के मुकाबले तीन गुना बढ़कर 53,905 तक पहुंच गई है. अकेले न्यूयॉर्क शहर में 14 हजार से ज्यादा बच्चे घर पर रहकर पढ़ाई कर रहे हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. साल 2023 में जहां चार्टर स्कूलों में नामांकन केवल 3.1 फीसदी बढ़ा, वहीं होम-स्कूलिंग में 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

दुनिया में सबसे ज्यादा खर्च, फिर भी पढ़ाई में फिसड्डी

‘एम्पायर सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी’ के अध्यक्ष जिल्विनास सिलेनास कहते हैं कि न्यूयॉर्क दुनिया में सबसे ज्यादा प्रति बच्चा 37 हजार डॉलर शिक्षा पर खर्च करता है. इसके बावजूद वहां के सरकारी स्कूल पढ़ाई के मामले में पिछड़ रहे हैं. यही वजह है कि अभिभावकों के बीच होम-स्कूलिंग का विकल्प तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. आंकड़ों के मुताबिक, न्यूयॉर्क शहर के 1500 से ज्यादा सरकारी स्कूलों में से 906 स्कूलों के अधिकांश बच्चे गणित और रीडिंग टेस्ट ही पास नहीं कर पाए.

कैसे काम करती है होम-स्कूलिंग?


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