खरगे ने पीएम से पूछा- मॉनसून सत्र का क्यों नहीं करते अवसान? परिसीमन पर जारी है घमासान

नई दिल्ली:

परिसीमन बिल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तकरार अभी भी बरकरार है. कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर मॉनसून सत्र के अवसान नहीं किए जाने का मामला उठाया है. खरगे का कहना है कि 13 अगस्त को खत्म हुए सत्र का अब तक समाप्त नहीं किया जाना, कई शंकाएं पैदा करता है, क्योंकि अमूमन इतने दिनों में किसी भी सत्र को समाप्त घोषित कर दिया जाता है, जबकि अभी भी मॉनसून सत्र एक तरह से अनिश्चितकाल के लिए स्थगित ही है. 

मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है, “मैं आपको 16 जुलाई को भी परिसीमन को लेकर पत्र लिख चुका हूं, जिसमें मैंने इस विषय पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी, जिससे सभी राजनीतिक दलों को मालूम चल सके कि सरकार का प्रस्ताव क्या है, साथ ही मैंने यह भी कहा था कि सभी राजनीतिक दलों को सरकार के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए. अब संसदीय कार्य मंत्री ने कहा है कि सरकार संसद का एक विशेष सत्र बुलाना चाहती है. हमें लगता है कि शायद इसलिए मॉनसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया जा रहा है.”

कांग्रेस अध्यक्ष ने आगे कहा, “इसलिए कांग्रेस पार्टी परिसीमन को लेकर तीन मांग कर रही है, पहला कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को अगले 25 सालों तक फ्रीज कर दिया जाए. दूसरा राज्यों की लोकसभा सीटों को भी अगले 25 साल के लिए ना बदला जाए और तीसरा मौजूदा शक्ल में ही महिला आरक्षण 2029 से लागू किया जाए.”

खरगे ने कहा कि मैं एक बार फिर परिसीमन के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करता हूं. देश के लिए यह मुद्दा काफी अहम है और सरकार 16-17 अप्रैल की तरह इस बिल को जोर जबरदस्ती से पास कराने की कोशिश ना करें.

बता दें कि कांग्रेस ने जो रुख परिसीमन बिल पर लिया है, करीब-करीब वही रुख अब बाकी विपक्षी दल भी ले रहे हैं. तमिलनाडु विधानसभा ने परिसीमन पर यही रुख लेते हुए विधानसभा से प्रस्ताव पारित किया है. तमिलनाडु का जिक्र करना यहां इसलिए जरूरी है कि बिना डीएमके के 22 लोकसभा सांसदों के सर्मथन के यह बिल लोकसभा में पारित नहीं हो सकता है.

कांग्रेस तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय के जरिए डीएमके को काबू में रखना चाहती है, इसलिए तमिलनाडु विधानसभा से परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया है. माना जा रहा है कि दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल के मुख्यमंत्रियों का जो एक सम्मेलन हुआ था, उसमें भी इस पर इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अनौपचारिक रूप से चर्चा की है.

तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, जिसमें ममता बनर्जी की पार्टी इन बागी सांसदों के एनसीपीआई में विलय को चुनौती देते हुए इनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इन सांसदों को नोटिस जारी किया है और लोकसभा अध्यक्ष से एक तय सीमा में मामले को निपटाने की बात कही है.

ऐसे हालात में सरकार ‘अभी इंतजार करो और देखो’ की नीति पर चल रही है. वो परिसीमन बिल पर, संख्या को लेकर जब तक 200 फीसदी आश्वस्त नहीं हो जाती, आगे नहीं बढ़ेगी. क्योंकि पिछली बार इसी मुद्दे पर सरकार लोकसभा में हार चुकी है. जबकि विपक्ष की रणनीति है कि इंडिया गठबंधन से डीएमके के अलग होने के बावजूद परिसीमन के मुद्दे पर उसे विपक्ष के खेमे में ही रखा जाए. यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष बार-बार प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर सरकार पर दबाव बनाने के साथ-साथ विपक्ष को भी एकजुट रहने का संदेश दे रहे हैं.

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