दुनिया पर मंडरा रहा 'अल नीनो' का खतरा, भारत के सैटेलाइट ने अंतरिक्ष से पकड़ी डरावनी हलचल
Raisina News Desk- सितंबर 11, 2026 10:32 PM IST

पृथ्वी से 741 किलोमीटर ऊपर मौजूद एक भारतीय सैटेलाइट मजबूत होते अल नीनो के साफ संकेतों पर नजर रख रहा है. बारिश के पैटर्न में बदलाव दिखने और भारतीय मॉनसून पर इसका असर महसूस होने से काफी पहले ही ISRO का EOS-06 सैटेलाइट (ओशनसैट-3) भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में हो रहे समुद्री और वायुमंडलीय बदलावों का पता लगा रहा है. ये संकेत बताते हैं कि दुनिया का वेदर सिस्टम एक शक्तिशाली अल नीनो की ओर बढ़ रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह और मजबूत हो सकता है. कुछ वैज्ञानिक तो इसे ‘गॉडजिला अल नीनो’ भी कह रहे हैं और उनका मानना है कि इसका सबसे बड़ा असर अभी बाकी है.
ISRO के मुताबिक, EOS-06 से मिले आंकड़े विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुमान से भी मेल खाते हैं. जून 2026 में WMO ने कहा था कि जून से अगस्त 2026 के बीच अल नीनो बनने की संभावना करीब 80 फीसदी है. कई मौसम मॉडल भी एक मजबूत अल नीनो की तरफ इशारा कर रहे थे. जुलाई के आखिर तक WMO ने बताया कि अल नीनो की स्थिति तेजी से मजबूत हो रही है और अगस्त से अक्टूबर 2026 के दौरान इसके और ताकतवर होने की उम्मीद है.
जून-2024 और जून-2026 में कितना अंतर?
Photo Credit: ISRO
जून-2025 और जून-2026 में कितना अंतर?
Photo Credit: ISRO
EOS-06 से मिले डेटा से पता चलता है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में बन रही अल नीनो की स्थिति के कारण समुद्र की जैविक उत्पादकता में साफ गिरावट आई है. वैज्ञानिक जिस सबसे अहम संकेत पर नजर रख रहे हैं, वह है क्लोरोफिल-ए में तेज गिरावट. क्लोरोफिल-ए एक ऐसा पदार्थ है जो फाइटोप्लांकटन नाम के बेहद छोटे समुद्री पौधों में पाया जाता है. ये छोटे जीव समुद्री फूड चेन की नींव माने जाते हैं. हैदराबाद स्थित ISRO के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के अनुसार, जून 2026 में ट्रॉपिकल प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में सतह पर क्लोरोफिल-ए की मात्रा में बड़ी कमी देखी गई.
ग्राफ में देखिए साल दर साल कैसा रहा असर?
Photo Credit: ISRO
इसकी तुलना 2024 और 2025 की उसी अवधि से की गई, जब ENSO की स्थिति काफी हद तक सामान्य थी. साथ ही EOS-06 ने समुद्र की सतह पर चलने वाली हवाओं की दिशा में बदलाव भी दर्ज किया. हवाएं ईस्टरलीज से वेस्टरलीज की ओर बदली हैं, जिसे अल नीनो बनने का एक प्रमुख संकेत माना जाता है. ISRO ने यह डेटा और तस्वीरें जारी की हैं.
इस जानकारी को खास बनाने वाली बात यह है कि क्लोरोफिल समुद्र में होने वाले बदलावों पर लगभग तुरंत प्रतिक्रिया देता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लोरोफिल में कमी, अल नीनो बनने का संकेत समुद्र की सतह के तापमान (SST) के मुकाबले पहले दे सकती है. आमतौर पर SST आधारित सिस्टम में किसी अल नीनो की आधिकारिक पुष्टि से पहले कई हफ्तों तक तापमान बढ़ा हुआ रहना जरूरी होता है.
समुद्र में अल-नीनो कैसे असर डाल रहा?
Photo Credit: ISRO
अल नीलो 2015 और ला नीना 2010 के दौरान कैसी थी समुद्र की स्थिति?
Photo Credit: ISRO
ISRO के NRSC के निदेशक डॉ. प्रकाश चौहान का कहना है कि पूर्वी प्रशांत महासागर में गर्म पानी, समुद्र की गहरी परतों से ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आने से रोकता है. जब यह प्रक्रिया कमजोर पड़ती है तो फाइटोप्लांकटन की बढ़ोतरी भी कम हो जाती है. EOS-06 पर लगा ओशन कलर मॉनिटर इसी बदलाव को दर्ज करता है.
सैटेलाइट में एक स्कैटरोमीटर भी लगा है, जो अल नीनो से जुड़ी हवाओं की दिशा में होने वाले बदलाव को रिकॉर्ड करता है. ये दोनों उपकरण मिलकर अल नीनो की शुरुआत और उसके विकास पर नजर रखने के लिए एक मजबूत शुरुआती चेतावनी प्रणाली का काम करते हैं.डॉ चौहान ने कहा कि समुद्र की सतह के तापमान के अलावा फाइटोप्लांकटन में कमी भी प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति और उसके असर का साफ संकेत देती है. ISRO के वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर अनुमान सही साबित होते हैं और अल नीनो और मजबूत होता है, तो आने वाले महीनों में प्रशांत महासागर का कम क्लोरोफिल वाला क्षेत्र और ज्यादा साफ दिखाई देगा.
अल नीनो, ENSO यानी अल नीनो सदर्न ऑसिलेशन का गर्म चरण है और यह दुनिया की सबसे प्रभावशाली मौसम सिस्टम में से एक है. सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को प्रशांत महासागर में पश्चिम की ओर धकेलती हैं, जिससे दक्षिण अमेरिका के तट के पास ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आ पाता है. लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं. इससे गर्म पानी पूर्व की ओर फैल जाता है, समुद्र में गहराई से पानी ऊपर आने की प्रक्रिया रुक जाती है और समुद्री उत्पादकता कम हो जाती है. इसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है और कई जगहों पर बारिश, सूखा, बाढ़ और तापमान में बदलाव देखने को मिलता है.
भारत के लिए अल नीनो बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका संबंध अक्सर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की कमजोर बारिश से देखा गया है. हालांकि हर बार अल नीनो आने पर सूखा नहीं पड़ता, लेकिन मजबूत अल नीनो के दौरान कम बारिश, मिट्टी में नमी की कमी, खेती पर दबाव और जल संसाधनों को लेकर चिंता बढ़ जाती है. अल नीनो के कारण प्रशांत महासागर की हवाओं में होने वाला बदलाव उस बड़े मौसम तंत्र को भी प्रभावित करता है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में मॉनसून की बारिश लाता है.
EOS-06 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह अंतरिक्ष से जलवायु परिवर्तन के जैविक और भौतिक दोनों संकेतों को देख सकता है. 22 नवंबर 2022 को PSLV के जरिए लॉन्च किए गए इस सैटेलाइट में ओशन कलर मॉनिटर-3 और स्कैटरोमीटर लगे हैं. ये उपकरण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, समुद्री हवाओं और समुद्र व वायुमंडल के बीच होने वाले बदलावों पर नजर रखते हैं. क्लोरोफिल और हवाओं के पैटर्न के आंकड़ों को मिलाकर वैज्ञानिक लगभग रियल टाइम में यह देख सकते हैं कि महासागर अल नीनो पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है.