पंजाब का हिंदू वोटबैंक: बीजेपी कहां चूक रही, AAP की क्या रणनीति?

पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. एक तरफ आम आदमी पार्टी के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस को वापसी की उम्मीद है. भारतीय जनता पार्टी भी पंजाब में इस बार कमल खिलाना चाहती है, वो पश्चिम बंगाल की तरह यहां भी अप्रत्याशित नतीजों की उम्मीद में है. अब सभी दल अपनी रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन एक पैटर्न भी दिखाई दे रहा है.

पंजाब की राजनीति में वैसे तो हिंदुत्व की राजनीति कभी ज्यादा सक्रिय रही नहीं है, लेकिन पिछले कुछ समय से इसी समुदाय को साधने के लिए आम आदमी पार्टी कई प्रयास कर रही है. हाल ही में भगवंत मान सरकार ने ऐलान किया है कि वो अलग-अलग शहरों में ‘हमारे राम’ नाटक का मंचन करने जा रही है. राज्य सरकार का तर्क है कि वो इस नाटक के जरिए सिर्फ रामायण की भव्यता को पंजाब के अलग-अलग कोने तक नहीं पहुंचाएगी बल्कि सनातन का संदेश भी लेकर चलेगी.

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इससे पहले आम आदमी पार्टी सरकार ने ही राज्य में हिंदू बहुल सीटों पर सुंदरकांड का पाठ और हनुमान चालीसा का कार्यक्रम करवाया था. अब आम आदमी पार्टी ने तो अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है, वो बीजेपी को पंजाब में हिंदुओ की राजनीति करने से रोकना चाहती है. वैसे भी हाल ही में पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव में जिस तरह से हिंदू बहुल सीटों पर बीजेपी को एकतरफा जीत मिली है, उसे देखते हुए पार्टी वैसी ही पिच अब पंजाब में भाजपा को देने को तैयार नहीं है.

पंजाब में कितने हिंदू है?

2011 की जनगणना के मुताबिक पंजाब में 38.49% हिंदू आबादी है. यहां भी गुरदासपुर, जालंधर होशियापुर, शहीद भगत सिंह नगर कुछ ऐसे जिले हैं जहां हिंदुओं की आबादी ज्यादा है. अगर चुनावी दृष्टि से देखें तो पंजाब की 45 सीटों पर हिंदू निर्णायक रहता है. नीचे दी गई टेबल में देखिए पंजाब की वो विधानसभा सीटें जहां हिंदू वोट निर्णायक रहता है-

सीट हिंदू वोट (%)
पठानकोट 70
बठिंडा शहरी 62
अमृतसर शहरी 60
अमृतसर उत्तरी 60
अमृतसर पूर्वी 60
अमृतसर पश्चिमी 60
अमृतसर केंद्रीय 60
होशियारपुर 60

पंजाब में हिंदू कैसे वोट करता है? 

पंजाब में हिंदू परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ रहा है. लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की आंधी ने कई समीकरण ध्वस्त कर दिए थे. आंकड़े बताते हैं कि पिछले चुनाव में 22 हिंदु बहुल सीटों में से 15 पर आम आदमी पार्टी ने अपना कब्जा किया था, वहीं बीजेपी सिर्फ दो सीटें जीत पाई थी और कांग्रेस पांच जीतने में कामयाब रही थी. 

पंजाब की राजनीति में हिंदू वोटिंग का एक और दिलचस्प पैटर्न देखने को मिलता है. पंजाब में अगर 10 फीसदी से ज्यादा हिंदू वोट शिफ्ट हो जाए तो सत्ता परिवर्तन देखने को मिल जाता है. 2007 के विधानसभा चुनाव में 13.5 फीसदी हिंदू वोट कांग्रेस से छिटका था, सरकार अकाली-बीजेपी की बन गई. 2012 में भी वहीं स्थिति रही और सरकार बरकरार रही. फिर 2017 में अकाली-बीजेपी गठबंधन से 10.5 फीसदी हिंदू वोट अलग हुआ, नतीजा कांग्रेस की सरकार बन गई.

पंजाब में बीजेपी क्यों नहीं हो रही सफल?

पंजाब की राजनीति में बीजेपी अपने दम पर अभी तक सफल नहीं हो पाई है. 2020 से पहले तक अकाली दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन उसका प्रभाव सीमित ही रहा. गठबंधन टूटने के बाद तो हालात और ज्यादा खराब हो गए. जानकार मानते हैं कि पंजाब में बीजेपी हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं कर पाती है. जो राजनीति बंगाल में बीजेपी के लिए आंधी बनने का काम करती है, वहीं रणनीति पंजाब आते-आते औंधे मुहं गिर सकती है.

इसका एक बड़ा कारण यह है कि पंजाब का हिंदू दूसरे राज्यों के हिंदू से कुछ अलग दिखाई देता है. दूसरे शब्दों में कहें तो पंजाब में हिंदू वोटर भी एक तरह से सिख ही है. उसे गुरुद्वारा जाना पसंद है, वो सिख धर्म की कई मान्यताओं को मानता है, वो हिंदी से ज्यादा पंजाबी भाषा बोलता है. ऐसे में इस राज्य में बीजेपी की हिंदुत्व की हार्ड लाइन ज्यादा सफल नहीं हो पाती है. इसके ऊपर पंजाब में हिंदू वोट भी कई श्रेणियों में बंटा हुआ है. अपर कास्ट हिंदू शहरी इलाकों में बसा हुआ है तो वहीं दलित और ओबीसी ग्रामीण में निर्णायक है.

अब बीजेपी भी यह समझ चुकी है कि पंजाब में सिर्फ हिंदुत्व की राजनीति नहीं चल सकती है। अगर आम आदमी पार्टी सामने से हिंदुओं को लुभाने की कोशिश कर भी रही है, बीजेपी इतनी आक्रमक दिखाई नहीं दे रही.  वर्तमान में पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों हैं जो खुद सिख समुदाय से आते हैं. इसके अलावा पार्टी के राज्य में जो भी नए कार्यलय खुल रहे हैं, वहां पंजाबी भाषा को खास अहमयित दी जा रही है, सुखमनी साहिब का पाठ किया जाता है. इसके अलावा दमदमी टकसाल प्रमुख बाबा हरनाम सिंह धुम्मा जैसे धार्मिक नेताओं से मिलना भी कई संकेत दे रहा है. ऐसे में पंजाब की राजनीति में एक शिफ्ट जरूर देखने को मिल रहा है. आम आदमी पार्टी हिंदू वोटबैंक पर फोकस कर रही है तो वहीं बीजेपी सिख समुदाय के बीच खुद को मजबूत बनाने की कोशिश में दिख रही है.

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