हर युवा सीखे एक अतिरिक्त भारतीय भाषा, अमित शाह ने बताया क्यों है जरूरी
Raisina News Desk- जुलाई 20, 2026 01:21 AM IST

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को ‘शब्द संग्रहालय’ का उद्घाटन करते हुए कहा कि हर युवा को अपनी मातृभाषा के अलावा कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा जरूर सीखनी चाहिए. उन्होंने देश की भाषाई विविधता को संरक्षित करने पर जोर देते हुए कहा कि यह भारत की सभ्यतागत पहचान को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है. उन्होंने संग्रहालय को ‘भारत की सांस्कृतिक विरासत के पुनरुद्धार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल’ बताया.
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय पुस्तकालय द्वारा विकसित यह संग्रहालय ‘शब्दलोक’ भारत की समृद्ध भाषाई विरासत को समर्पित है. इसमें अत्याधुनिक तकनीक और संवादात्मक प्रस्तुतियों के जरिए देश की मौखिक और लिखित भाषाई परंपराओं के विकास की यात्रा को दर्शाया गया है.
भाषा और सभ्यता के अटूट संबंध पर जोर देते हुए शाह ने कहा कि किसी भी देश या क्षेत्र की संस्कृति की अभिव्यक्ति भाषा के बिना संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि भाषा भी मानव भावनाओं और अभिव्यक्तियों से जन्मे शब्दों के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती.
शाह ने कहा, ‘हर युवा को अपनी मातृभाषा के साथ-साथ एक भारतीय भाषा भी सीखनी चाहिए. इससे हम अपनी भाषाओं को लंबे समय तक कायम रख सकते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘हमारी भाषा हमारी विरासत को संजोए रखती है और भाषाओं के माध्यम से किसी देश की संस्कृति को समझा जा सकता है. भाषा संस्कृति का मूल आधार है। शब्दों और भाषा के बिना संस्कृति अधूरी रहती है.’
शाह ने कहा कि यह संग्रहालय आने वाली पीढ़ियों को सदियों के दौरान भाषाओं के विकास को समझने में मदद करेगा और देश के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण योगदान देगा. उन्होंने कहा, ‘जब तक हमारी आने वाली पीढ़ियां इस यात्रा को नहीं समझेंगी, तब तक देश का सांस्कृतिक पुनरुत्थान वास्तव में संभव नहीं हो सकता. मुझे पूरा विश्वास है कि यह शब्द संग्रहालय सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया में एक बुनियादी आवश्यकता को पूरा करेगा और अपने उद्देश्य में सफल होगा.’
गृह मंत्री ने कहा कि भाषा के बिना किसी भी देश की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति संभव नहीं है. उन्होंने युवाओं से पुस्तकालयों से जुड़ने की अपील करते हुए कहा कि देश का भविष्य केवल उसके शैक्षणिक संस्थानों की मजबूती पर निर्भर नहीं करता, बल्कि नागरिकों की पढ़ने की आदतों पर भी निर्भर करता है. गृह मंत्री ने कहा कि भारत की बौद्धिक परंपरा हमेशा खुलेपन और संवाद पर आधारित रही है. उन्होंने कहा, ‘हमने विचारों पर कभी कोई रोक नहीं लगाई। हमने धर्मग्रंथों पर संवाद किया, दर्शन पर चर्चा की और परंपरा के साथ-साथ लगातार नयी सोच को अपनाया.’
संग्रहालय का दौरा करने के बाद शाह ने सुझाव दिया कि डिजिटल युग को दर्शाने के लिए इसके दायरे का और विस्तार किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘मैं संस्कृति सचिव से आग्रह करता हूं कि इस पहल को कंप्यूटर और एआई के क्षेत्र तक भी विस्तारित किया जाए, ताकि आधुनिक दौर में हमारी भाषाओं को पूरी स्वीकृति मिल सके. हमने कभी नवाचार से दूरी नहीं बनाई. हमने हमेशा उपयोगी चीजों को अपनाया और उन्हें अपनी परंपराओं के साथ जोड़कर उनके सकारात्मक प्रभाव को कई गुना बढ़ाया.’
‘शब्दलोक’ को एक अभिनव पहल बताते हुए शाह ने कहा कि यह संग्रहालय दृश्य, श्रव्य और जीवंत अनुभवों के माध्यम से भारत की बहुभाषी चेतना, ज्ञान परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों को संरक्षित करने का प्रयास करता है. बंगाल की बौद्धिक विरासत का जिक्र करते हुए शाह ने कहा कि इस राज्य ने देश को कई महान साहित्यकार, वैज्ञानिक, क्रांतिकारी और विद्वान दिए हैं. उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और श्री अरविंद के योगदान को याद करते हुए कहा कि दशकों तक बंगाल ने बौद्धिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भारत का नेतृत्व किया.
शाह ने हालांकि आरोप लगाया कि वर्षों के दौरान बंगाल की सांस्कृतिक चेतना कमजोर हुई है. उन्होंने कहा, ‘एक लंबा दौर ऐसा रहा जब बंगाल को भारतीय सांस्कृतिक चेतना से अलग करने के प्रयास किए गए. संकीर्ण विचारधाराओं और विदेशी विचारधाराओं ने देश और दुनिया के लिए योगदान देने की बंगाल की क्षमता को कमजोर किया.’ उन्होंने विश्वास जताया कि बंगाल एक बार फिर देश का मार्गदर्शन करने वाली शक्ति के रूप में उभरेगा. उन्होंने कहा, ‘मैं पिछले नौ महीनों से पश्चिम बंगाल की स्थिति पर करीब से नजर रख रहा हूं. यह राज्य अब देश के लिए प्रकाश स्तंभ के रूप में उभर रहा है.’