Explainer: जिस ‘कावेरी’ को मान लिया गया था फेल, 3 दशक बाद उसी स्वदेशी इंजन ने कैसे की दमदार वापसी? | Kaveri Engine Comeback How DRDO Indigenous Jet Engine Could Replace GE Engines in Future Fighter Jets


भारत रक्षा क्षेत्र में लगातार आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है. हम मिसाइल से लेकर फाइटर जेट तक देश में बना रहे हैं. इन हथियारों से हमारी सेनाएं तो ताकतवर हो ही रही हैं, साथ ही हम दुनिया में हथियारों के निर्यातक भी बन रहे हैं. मिसाइल और रॉकेट तो हमने बना लिए, लेकिन एक ऐसा सपना अभी पूरा होना बाकी है, जो कई दशक पहले देखा गया था. हम बात कर रहे हैं ‘कावेरी इंजन’ की. कावेरी इंजन की कहानी केवल एक प्रोजेक्ट की नहीं, बल्कि अटूट हौसले, भारतीय वैज्ञानिकों के कड़े संघर्ष और स्वदेशी तकनीक की महागाथा है. जिस इंजन को लगभग ‘मृत’ मान लिया गया था, वह आज एक नए अवतार में भारतीय आसमान पर राज करने को तैयार है. आज हम इसी कावेरी इंजन की कहानी बता रहे हैं.

80 के दशक में शुरू हुआ था प्रोजेक्ट

कावेरी इंजन प्रोजेक्ट की कहानी शुरू हुई थी 80 के दशक में. मार्च 1989 में गैस टरबाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) ने यह प्रोजेक्ट शुरू किया था. यह प्रोजेक्ट स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस (LCA) को ताकत देने के लिए शुरू किया गया था. हालांकि, लड़ाकू विमानों की एडवांस जरूरतों जैसे वजन अनुपात में थ्रस्ट और थर्मल लोड के कारण कावेरी शुरुआत में उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर सका.

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तेजस के लिए कावेरी इंजन के 9 प्रोटोटाइप बनाए गए और 3200 घंटे से ज्यादा की टेस्टिंग हुई. इतनी कोशिशों के बाद भी यह इंजन केवल 70.4 kN का वेट थ्रस्ट ही पैदा कर सका, जबकि तेजस को कॉम्बैट ऑपरेशंस के लिए 81 से 85 kN थ्रस्ट की जरूरत थी.

नतीजा यह रहा कि 2008 में कावेरी इंजन को ऑफिशियली तेजस प्रोग्राम से अलग कर दिया गया. एक्सपर्ट्स की मानें तो यह विफलता हमारे वैज्ञानिक और इंजीनियरों की कमी नहीं थी, बल्कि एक मजबूत एयरोस्पेस इकोसिस्टम, उच्च तापमान सहने वाले सिंगल-क्रिस्टल सुपरअलॉय जैसे मैटेरियल्स और इंजन को टेस्ट करने के लिए ‘फ्लाइंग टेस्टबेड’ की कमी की वजह से थी.

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DRDO ने नहीं मानी हार

इतनी भारी असफलता के बाद भी DRDO ने हार नहीं मानी. एजेंसी ने कावेरी इंजन प्रोजेक्ट को बंद करने की बजाय एक स्टेप बाय स्टेप डेवलेपमेंट मॉडल अपनाया.

स्टेप-1 (मानवरहित विमान): पहले चरण में एक ‘ड्राई’ वैरिएंट यानी बिना आफ्टरबर्नर के डेवलेप किया गया, जो 48-52 kN का थ्रस्ट पैदा करता है. इसे DRDO के ‘घातक’ यूसीएवी जैसे स्टील्थ ड्रोन्स को पावर देने के लिए सफलतापूर्वक रिपर्पज किया गया है.

स्टेप-2 (लड़ाकू विमान): दूसरे चरण में, GTRE एक मॉडर्न आफ्टरबर्नर मॉड्यूल विकसित कर रहा है ताकि इंजन की क्षमता को 80 से 85 kN तक बढ़ाया जा सके. इसी साल फरवरी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस अपडेटेड कावेरी कॉन्फिगरेशन के पूरे आफ्टरबर्नर टेस्ट का अवलोकन किया.

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कावेरी इंजन प्रोग्राम में पिछले महीनों में हुई तीन सबसे बड़े ब्रेकथ्रू

  1. आफ्टर बर्नर टेस्ट: 16 फरवरी 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में GTRE में कावेरी इंजन के आफ्टर बर्नर मॉड्यूल का एक सफल टेस्ट किया गया, जिसमें इंजन ने 81 से 83 KN थ्रस्ट हासिल किया.
  2. सिंगल क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड टेक्नोलॉजी: DRDO ने लैब स्केल पर सिंगल क्रिस्टल टरबाइन ब्लेड बनाने की जटिल तकनीक को क्रैक कर लिया है. इस तकनीक को लखनऊ की एक प्राइवेट कंपनी के साथ शेयर किया जा रहा है.
  3. घातक प्रोजेक्ट को मंजूरी: 27 मार्च 2026 को रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 60 रिमोटली पायलेटेड स्ट्राइक एयरक्राफ्ट (घातक) की खरीद को 39000 करोड़ रुपये की लागत के साथ मंजूरी दे दी है. यह कावेरी के ड्राई वेरिएंट के लिए एक बड़ी जीत है क्योंकि इसी इंजन का उपयोग इस प्रोजेक्ट में किया जाएगा.
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भविष्य में अमेरिकी इंजनों की कर देगा छुट्टी?

DRDO कावेरी 2.0 प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है. इसकी एक बड़ी वजह अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के इंजनों की सप्लाई में हो रही देरी और उनकी कीमतों में बेतहाशा वृद्धि है. GE F404-IN20 इंजनों की डिलीवरी रुकने से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा बनाए गए लगभग 30 नए तेजस Mk1A विमान बिना इंजन के ग्राउंडेड खड़े हैं. यानी यह फाइटर जेट तैयार हैं, लेकिन उड़ान नहीं भर सकते.

इसके अलावा 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान AMCA और तेजस Mk2 के लिए चुने गए बेहद पावरफुल GE F414 इंजन की अनुमानित कीमत GE ने 70-80 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 200 करोड़ रुपये से ज्यादा कर दी है.

ऐसे में भारत के लिए कावेरी इंजन को डेवलेप करना जरूरत और मजबूरी दोनों बन गया है. अब अगर कावेरी 2.0 का नया आफ्टरबर्नर 80-85 kN का लक्ष्य हासिल कर लेता है, तो 2030 के दशक में यह तेजस फ्लीट से GE F404 इंजनों को चरणबद्ध तरीके से रिप्लेस कर सकता है. यह कार्यक्रम सफल हुआ को भारत भविष्य में लड़ाकू विमानों, ड्रोन्स और अगली पीढ़ी के एयरक्राफ्ट्स के लिए पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन जाएगा.

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