सेकुलर का असली मतलब क्या है, हमारे लिए इसके मायने क्या हैं?

सेकुलर का असली मतलब क्या है, हमारे लिए इसके मायने क्या हैं?

सेकुलर शब्द का असली मतलब क्या है? हमने इस शब्द को राजनीतिक बहसों में इतनी बार इस्तेमाल किया है कि शायद उसका सबसे सरल मानवीय अर्थ ही भूल गए हैं. इसका मतलब केवल इतना नहीं है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा. इसका अर्थ इससे कहीं बड़ा है. इसका अर्थ है कि किसी इंसान की कीमत उसके धर्म से तय नहीं होगी. राज्य की नजर में वह सबसे पहले एक नागरिक है. उसकी आस्था उसके मन और उसकी आत्मा का विषय है. उसकी नागरिकता उसी संविधान से जुड़ी है, जिससे इस देश के हर दूसरे नागरिक की नागरिकता जुड़ी है.

संविधान की प्रस्तावना में सेकुलर शब्द 1976 में जोड़ा गया था, लेकिन भारत 1976 में अचानक सेकुलर नहीं बना. समानता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता जैसे विचार संविधान में पहले से मौजूद थे. शब्द बाद में आया. भावना पहले से मौजूद थी. इसलिए शायद हमें यह पूछना छोड़ देना चाहिए कि भारत सेकुलर कब बना और यह पूछना शुरू करना चाहिए कि सेकुलर होने की जिम्मेदारी हमसे क्या मांगती है.

‘राजनीति से बाहर निकलें और प्रकृति को देखें’

शायद इसे समझने का सबसे आसान तरीका है कि कुछ देर राजनीति से बाहर निकलें और प्रकृति को देखें. हर सुबह हम सांस लेते हैं. हवा हमारे फेफड़ों में जाने से पहले हमसे यह नहीं पूछती कि हम कौन हैं. वह नहीं पूछती कि हम हिंदू हैं या मुसलमान, ईसाई हैं या सिख. वह यह नहीं पूछती कि हम अमीर हैं या गरीब, किसी जाति से हैं या किसी दूसरी जाति से. पानी हमारी प्यास बुझाने से पहले हमारा धर्म नहीं पूछता. सूरज यह तय नहीं करता कि किस घर को ज्यादा रोशनी मिलेगी. बारिश खेत पर गिरने से पहले यह नहीं पूछती कि खेत किसका है. धरती बीज को उगने देने से पहले जाति का प्रमाणपत्र नहीं मांगती. प्रकृति का कोई वोट बैंक नहीं है. उसकी कोई पार्टी नहीं है.

वह किसी मंदिर की तरफ ज्यादा हवा और किसी मस्जिद की तरफ कम हवा नहीं भेजती. वह यह तय नहीं करती कि एक व्यक्ति को दूसरे से ज्यादा रोशनी इसलिए मिले क्योंकि वह किसी खास भाषा में प्रार्थना करता है. इस बहुत सरल अर्थ में शायद प्रकृति हमारी सबसे पहली समानता की शिक्षक थी. सीमाएं हमने बनाई हैं. हमने कहा, यह जमीन मेरी है और वह तुम्हारी. हमने इंसानों को धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और जन्म के आधार पर नाम दिए. फिर उन नामों के चारों ओर दीवारें बना दीं और धीरे-धीरे मानने लगे कि वही दीवारें सच हैं.

इंसानी सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना

एक पक्षी को यह समस्या नहीं होती. वह मंदिर के ऊपर से उड़ता है, फिर मस्जिद के ऊपर से और फिर चर्च के ऊपर से. वह किसी छत पर बैठने से पहले यह तय नहीं करता कि यह किसका इलाका है. वह किसी पेड़ की डाल पर बैठ जाता है. उसके लिए आसमान एक है. हमने जमीन को बांट दिया. आसमान को नहीं बांट पाए. शायद यही इंसानी सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है. हमने अपने भगवानों के लिए अलग-अलग घर बना लिए, लेकिन सांस लेने के लिए हवा एक ही रखी. हमने प्रार्थना की भाषाएं अलग कर दीं, लेकिन मां के रोने की आवाज एक जैसी रही. हमने जन्म, विवाह और मृत्यु के अलग-अलग संस्कार बना लिए, लेकिन उनके भीतर छिपी मानवीय भावनाएं बहुत हद तक एक जैसी रहीं.

भगवान में विश्वास न करने का आपका निर्णय

यहीं संविधान हमारे जीवन में एक बहुत सरल लेकिन बहुत बड़ी बात लेकर आता है. वह हमसे हमारी आस्था छोड़ने को नहीं कहता. वह हमसे प्रार्थना बंद करने को नहीं कहता. वह किसी आस्तिक से नास्तिक बनने को नहीं कहता. वह केवल इतना कहता है कि आपका भगवान के साथ रिश्ता, या भगवान में विश्वास न करने का आपका निर्णय, आपकी अंतरात्मा का विषय है. राज्य आपकी अंतरात्मा का मालिक नहीं है. आप मंदिर जा सकते हैं. आप मस्जिद जा सकते हैं.

आप चर्च या गुरुद्वारे जा सकते हैं. आप कहीं न जाने का फैसला भी कर सकते हैं. आपकी आध्यात्मिक पसंद आपकी स्वतंत्रता है. लेकिन जब आप राज्य के सामने खड़े हों, तो उस पसंद के कारण आपकी नागरिकता छोटी नहीं हो सकती. शायद यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. सेकुलर होने का अर्थ यह नहीं कि समाज में धर्म की कोई जगह नहीं होगी. इसका अर्थ यह है कि आपका धर्म आपकी नागरिकता का मूल्य तय नहीं कर सकता.

सेकुलरिज्म केवल एक सुंदर शब्द

यहीं सेकुलरिज्म और समानता एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं. दोनों को अलग करना मुश्किल है. अगर समानता नहीं है, तो सेकुलरिज्म केवल एक सुंदर शब्द बनकर रह जाएगा. अगर अंतरात्मा की स्वतंत्रता नहीं है, तो धार्मिक स्वतंत्रता केवल कागज पर लिखी हुई बात होगी. और अगर भाईचारा नहीं है, तो कानून की नजर में बराबर होने के बावजूद लोग दिल से एक-दूसरे से दूर रह सकते हैं.

संविधान इसलिए हमसे कई चीजों को एक साथ संभालने को कहता है. नफरत के बिना न्याय. डर के बिना स्वतंत्रता. अपमान के बिना समानता. और ऐसी भाईचारे की भावना जिसमें एक जैसा होना जरूरी न हो. यह आसान नहीं है. लेकिन शायद सभ्यता का मतलब ही यही है कि हम अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे को चोट पहुंचाए बिना साथ रहना सीखें.

इसके पीछे एक और गहरी मानवीय समस्या है. हम कई बार सोचते हैं कि हम अपने धर्म की रक्षा कर रहे हैं, जबकि वास्तव में हम अपनी पहचान की रक्षा कर रहे होते हैं. धर्म शायद शुरुआत में इंसान और उस परम सत्य के बीच एक शांत रिश्ता हो सकता है. लेकिन पहचान धीरे-धीरे उसे एक निशान बना सकती है. जब पहचान बहुत बड़ी हो जाती है, तो दूसरे की पहचान हमें खतरा लगने लगती है. तब सवाल बदल जाता है. ‘मैं क्या मानता हूं? की जगह सवाल हो जाता है, ‘मेरी तरफ कौन है?

यहीं आस्था भीतर की यात्रा होने के बजाय बाहर की दीवार बन सकती है. कोई व्यक्ति अपनी परंपरा से बहुत प्रेम कर सकता है और फिर भी दूसरी परंपरा को छोटा करने की जरूरत महसूस न करे. वह अपनी पहचान पर गर्व कर सकता है और फिर भी दूसरे व्यक्ति को अपनी पहचान पर शर्मिंदा न करे. शायद यही परिपक्व आस्था की असली परीक्षा है.

अपनी पहचान की रक्षा शुरू

दुनिया की अलग-अलग पुरानी परंपराओं में एक बात अलग-अलग शब्दों में कही गई है. किसी दूसरे इंसान से नफरत करके ईश्वर बड़ा नहीं हो जाता. अगर हमारी प्रार्थना हमें अपने पड़ोसी से डरने लगे, तो शायद हमें उस प्रार्थना और अपने दिल के बीच की दूरी को देखना चाहिए. अगर हमारी आस्था हमें ज्यादा दयालु, ज्यादा सच्चा और दूसरे के दुख को समझने वाला बनाती है, तो वह हमें भीतर ले जा रही है. लेकिन अगर वही आस्था हमें यह मानने लगे कि दूसरे धर्म में जन्म लेने वाला इंसान कम अधिकारों का हकदार है, तो शायद हमने आस्था की रक्षा करना छोड़कर केवल अपनी पहचान की रक्षा शुरू कर दी है.

एक छोटा बच्चा ऐसी बात समझ लेता है, जिसे बड़े लोग कई बार भूल जाते हैं. दो बच्चे धूप में दौड़कर आए हों और दोनों को पानी चाहिए हो, तो कोई बच्चा पहले यह नहीं पूछेगा कि दूसरे बच्चे का धर्म क्या है. दोनों केवल प्यासे हैं. बड़े होते-होते हम एक-दूसरे को देखने से पहले एक-दूसरे का नाम, धर्म, जाति और पहचान देखना सीख जाते हैं. हम पैदा होते समय ये दीवारें लेकर नहीं आते. समाज धीरे-धीरे हमें ये नाम देता है. धर्म देता है. जाति देता है. भाषा देता है. पहचान देता है. फिर हम उन पहचानों को अपना समझकर उनकी रक्षा करने लगते हैं. शायद समझदार होना कहीं-कहीं उस बच्चे के पास वापस लौटना भी है, जो दूसरे इंसान को पहले इंसान की तरह देखता था.

सेकुलरिज्म केवल राजनीति का शब्द नहीं

इसीलिए सेकुलरिज्म को केवल राजनीति का शब्द समझना उसके अर्थ को छोटा कर देना है. यह जीने का एक तरीका भी है. यह आपसे आपका भगवान नहीं छीनता. यह केवल कहता है कि अपने भगवान को दूसरे इंसान के खिलाफ हथियार मत बनाइए. यह आपसे आपकी पहचान नहीं मिटाता. यह केवल कहता है कि अपनी पहचान के कारण दूसरे की गरिमा को छोटा मत कीजिए. यह नहीं कहता कि हम सब एक जैसे हो जाएं. यह पूछता है कि क्या हम अलग-अलग रहते हुए भी बराबर रह सकते हैं.

प्रकृति हर सुबह हमें पहला पाठ पढ़ाती है. वह बिना कुछ कहे कहती है, सांस लो. संविधान दूसरा पाठ देता है. वह कहता है, अपनी पहचान के साथ जियो, लेकिन बराबर गरिमा के साथ जियो. प्रकृति यह नहीं पूछती कि आप कौन हैं. संविधान कहता है कि आपकी पहचान के कारण आपके अधिकार छोटे नहीं होंगे. इसलिए शायद सेकुलर होने का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ‘कौन सेकुलर है?

असली सवाल इससे बहुत करीब है, और इसका जवाब हमें किसी मंच पर नहीं, अपने भीतर देना होगा.
जब मैं किसी दूसरे इंसान को देखता हूं, तो क्या मुझे सबसे पहले इंसान दिखाई देता है, या उसका नाम, उसका धर्म, उसकी जाति और वह पहचान जो मुझे बचपन से दिखाई जाती रही है?

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