महिलाओं की नौकरी दोगुनी, फिर भी तरक्की दूर! 8 साल में बढ़ा रोजगार, लेकिन पढ़ी-लिखी वूमेन को कम मौके?

महिलाओं की नौकरी दोगुनी, फिर भी तरक्की दूर! 8 साल में बढ़ा रोजगार, लेकिन पढ़ी-लिखी वूमेन को कम मौके?

कितनी महिलाओं को मिल रही नौकरीImage Credit source: Pexels

भारत में पिछले 8 साल में कामकाजी महिलाओं की संख्या दोगुनी होकर 10.4 करोड़ से बढ़कर 20.1 करोड़ हो गई है. महिला वर्कफोर्स पार्टिसिपेशन और रोजगार के आंकड़ों में सुधार जरूर दिखा है, लेकिन इस बढ़ोतरी के पीछे महिलाओं को किस तरह का काम मिला और उनकी कमाई कितनी बढ़ी, यह बड़ा सवाल है. ICRIER की 30 अक्टूबर 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, रोजगार में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी कम पढ़ी-लिखी महिलाओं के बीच हुई है. प्राइमरी से कम पढ़ाई वाली महिलाओं का वर्कर पॉपुलेशन रेशियो 19.9 प्रतिशत अंक बढ़ा, जबकि ग्रेजुएट महिलाओं में यह बढ़ोतरी सिर्फ 7.2 और पोस्ट ग्रेजुएट महिलाओं में 5.5 प्रतिशत अंक रही. यानी पढ़ी-लिखी महिलाओं के मुकाबले कम पढ़ी-लिखी को ज्यादा नौकरियां मिली हैं.

इस डेटा का एक पहलू यह भी है कि रोजगार बढ़ने के बावजूद महिलाओं की आर्थिक स्थिति में उतना सुधार नहीं हुआ. ग्रामीण महिलाओं की औसत महीने की कमाई 6,596 रुपये रही, जबकि पुरुषों की 14,632 रुपये थी. ग्रामीण महिला रोजगार में खेती और पशुपालन की हिस्सेदारी 72.2% तक पहुंच गई. वहीं, परिवार के काम में बिना वेतन मदद करने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ी. इसके अलावा, महिलाएं घर के काम और देखभाल की जिम्मेदारियों में पुरुषों से रोजाना करीब 4 घंटे 46 मिनट ज्यादा समय देती हैं.

रोजगार बढ़ा, लेकिन किस तरह का काम मिला?

  1. महिला वर्कफोर्स दोगुनी: ICRIER की रिपोर्ट के मुताबिक, 2017-18 में कामकाजी महिलाओं की संख्या 10.4 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 20.1 करोड़ हो गई. इस दौरान महिला वर्कर पॉपुलेशन रेशियो यानी WPR 22% से बढ़कर 38% पहुंच गया.
  2. ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी ज्यादा बढ़ी: गांवों में महिलाओं का WPR 23.7% से बढ़कर 44.9% हो गया. शहरों में यह बढ़ोतरी 18.2% से 25.9% तक रही. यानी रोजगार में महिलाओं की बढ़ती संख्या का बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाकों से आया.
  3. कम पढ़ी-लिखी महिलाओं की रोजगार दर में ज्यादा उछाल: 2017-18 से 2025 के बीच प्राइमरी से कम पढ़ी महिलाओं का WPR 19.9 प्रतिशत अंक और बिना फॉर्मल स्कूली शिक्षा वाली साक्षर महिलाओं का 20.1 प्रतिशत अंक बढ़ा. प्राइमरी शिक्षा वाली महिलाओं में यह बढ़ोतरी 18.1 अंक रही. इसके मुकाबले ग्रेजुएट महिलाओं में 7.2 और पोस्ट ग्रेजुएट महिलाओं में सिर्फ 5.5 प्रतिशत अंक का इजाफा हुआ. 2025 में प्राइमरी से कम पढ़ी महिलाओं का WPR 45.3% था, जबकि हायर सेकेंडरी पढ़ी महिलाओं का 19.8% है.
  4. खेती में सबसे ज्यादा महिलाएं: ग्रामीण महिला रोजगार में फसल उत्पादन और पशुपालन की हिस्सेदारी 2017-18 के 73% से घटकर 2025 में 72.2% रही. संख्या के हिसाब से इस सेक्टर में काम करने वाली महिलाएं 5.4 करोड़ से बढ़कर 10 करोड़ से ज्यादा हो गईं.
  5. रेगुलर नौकरी के बजाय खुद का काम और बिना वेतन मदद: गांवों में खुद का काम करने वाली महिलाओं की संख्या 1.39 करोड़ से बढ़कर 5.6 करोड़ हो गई. परिवार के काम में बिना वेतन मदद करने वाली महिलाओं की संख्या 2.88 करोड़ से बढ़कर 4.93 करोड़ पहुंची. वहीं, ग्रामीण महिलाओं के रोजगार में रेगुलर सैलरी वाली नौकरियों की हिस्सेदारी 10.5% से घटकर 9.3% रह गई.

कमाई में पुरुषों से और पिछड़ीं महिलाएं

महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ने के बावजूद कमाई के मामले में पुरुषों और महिलाओं के बीच का अंतर कम नहीं हुआ. ICRIER की रिपोर्ट के मुताबिक, 2017-18 में ग्रामीण पुरुषों की औसत महीने की कमाई 8,877 रुपये थी, जो 2025 में बढ़कर 14,632 रुपये हो गई. इसी दौरान ग्रामीण महिलाओं की कमाई 4,676 रुपये से बढ़कर सिर्फ 6,596 रुपये पहुंची. यानी ग्रामीण महिलाएं अब पुरुषों की कमाई का करीब 45% ही कमा रही हैं. 2017-18 में यह आंकड़ा करीब 53% था.

शहरों में भी यही अंतर दिखता है. 2025 में शहरी पुरुषों की औसत महीने की कमाई 25,565 रुपये रही, जबकि महिलाओं की 15,646 रुपये. रिपोर्ट के मुताबिक, 2017-18 से 2025 के बीच ग्रामीण पुरुषों की कमाई करीब 65% बढ़ी, जबकि महिलाओं की कमाई में 41% का इजाफा हुआ. शहरी इलाकों में पुरुषों की कमाई 57% और महिलाओं की 51% बढ़ी. यानी महिलाओं की संख्या तो रोजगार में बढ़ी, लेकिन उनकी कमाई पुरुषों के मुकाबले उसी रफ्तार से नहीं बढ़ी.

नौकरी के साथ घर की जिम्मेदारी भी महिलाओं पर

रोजगार में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद घर के काम और बच्चों-बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी में बड़ा बदलाव नहीं आया है. ICRIER ने टाइम यूज सर्वे 2024 के आंकड़ों का एनालिसिस करते हुए बताया कि महिलाएं एक दिन में औसतन 320 मिनट घर के कामों में लगाती हैं. इसमें खाना बनाना, सफाई और घर की देखभाल जैसे काम शामिल हैं. पुरुष इन कामों में औसतन 97 मिनट देते हैं.

देखभाल से जुड़े कामों में भी महिलाओं का समय ज्यादा है. बच्चे, बुजुर्ग और परिवार के दूसरे सदस्यों की देखभाल में महिलाएं रोजाना 144 मिनट देती हैं, जबकि पुरुषों का समय 81 मिनट है. दोनों तरह के बिना वेतन वाले कामों को मिलाकर महिलाएं पुरुषों के मुकाबले रोजाना 286 मिनट यानी करीब 4 घंटे 46 मिनट ज्यादा खर्च करती हैं. ये आंकड़े संबंधित काम करने वाले लोगों के औसत समय पर आधारित हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में लेबर फोर्स से बाहर रहने वाली करीब 60% महिलाओं ने घर की जिम्मेदारियों, बच्चों की देखभाल और घर से जुड़े दूसरे कामों को इसकी वजह बताया. पुरुषों में यह आंकड़ा करीब 1% था. 2021-22 में भी 59% महिलाओं ने यही वजह बताई थी. यानी बीते कुछ साल में इस स्थिति में खास बदलाव नहीं आया है.

कुल मिलाकर अगर पूरी तस्वीर देखें तो महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ना अहम है, लेकिन सिर्फ संख्या बढ़ने से आर्थिक बराबरी हासिल नहीं होगी. इसके लिए महिलाओं को बेहतर सैलरी वाली रेगुलर नौकरियां, ज्यादा प्रोडक्टिव सेक्टरों में काम के मौके और घर के कामों में बराबर जिम्मेदारी मिलना भी जरूरी है. रिपोर्ट ने यह भी बताया है कि 2017-18 और 2025 के PLFS आंकड़ों की तुलना करते समय ध्यान रखना होगा, क्योंकि 2025 में सर्वे की सैंपलिंग और रेफरेंस पीरियड में बदलाव हुआ है.

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