क्या भाजपा से ज्यादा तेजस्वी यादव के लिए चुनौती बन रहे हैं प्रशांत किशोर, MY समीकरण भी टूट रहा?
Raisina News Desk- अगस्त 04, 2026 03:53 PM IST

बांकीपुर:
बांकीपुर उपचुनाव ने बिहार की राजनीति में एक नई चर्चा शुरू कर दी है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रशांत किशोर ने भाजपा को कितनी चुनौती दी. बड़ा सवाल यह भी है कि क्या उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के वोट बैंक में भी सेंध लगानी शुरू कर दी है. अगर यह रुझान आगे भी जारी रहता है, तो आने वाले विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं बल्कि तेजस्वी यादव के सामने हो सकती है. अब तक माना जाता था कि प्रशांत किशोर का सबसे ज्यादा असर भाजपा के शहरी और सवर्ण वोट पर पड़ेगा. इसकी वजह यह थी कि उनकी छवि पढ़े-लिखे, साफ-सुथरी राजनीति करने वाले नेता की है और वे शहरी मध्यम वर्ग में भी अपनी पहचान बना चुके हैं. लेकिन बांकीपुर के चुनाव प्रचार के दौरान एक अलग तस्वीर भी देखने को मिली.
प्रशांत किशोर की सभाओं और पदयात्राओं में बड़ी संख्या में युवा, छात्र, मुस्लिम और यादव समाज के लोग भी दिखाई दिए. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर इसका कुछ हिस्सा भी वोट में बदलता है तो यह राजद के लिए चिंता की बात हो सकती है. राजद का सबसे मजबूत आधार लंबे समय से यादव और मुस्लिम मतदाता रहे हैं. अगर इसी सामाजिक आधार में कोई नया विकल्प जगह बनाने लगता है, तो विपक्ष की राजनीति का पूरा समीकरण बदल सकता है. प्रशांत किशोर लगातार शिक्षा, रोजगार, पलायन, भ्रष्टाचार और सरकारी व्यवस्था जैसे मुद्दे उठा रहे हैं. ये ऐसे मुद्दे हैं, जिनसे युवा सीधे जुड़ते हैं. दूसरी ओर, वे जातीय राजनीति पर भी सवाल उठाते रहे हैं.
इससे उन युवाओं का एक वर्ग उनकी ओर आकर्षित हो रहा है, जो खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग मानता है. प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत उनकी बोलने की शैली है. वे बिना लिखी हुई पर्ची के लंबे समय तक बोलते हैं. आंकड़ों और तथ्यों के साथ अपनी बात रखते हैं. विरोधियों के सवालों का तुरंत जवाब देते हैं और कठिन राजनीतिक विषयों को भी आसान भाषा में समझाने की कोशिश करते हैं. यही वजह है कि उनकी सभाओं में सिर्फ समर्थक ही नहीं, बल्कि उन्हें सुनने के लिए दूसरे दलों के लोग भी पहुंच रहे हैं.
सदन में विपक्ष की सबसे बड़ी आवाज बन पाएंगे प्रशांत किशोर?
प्रशांत किशोर विधानसभा पहुंचेंगे तो चुनौती सिर्फ भाजपा के लिए नहीं होगी. इसका असर विपक्ष की राजनीति पर भी पड़ सकता है. अभी विधानसभा में सरकार के खिलाफ सबसे बड़ी आवाज नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव माने जाते हैं. लेकिन अगर प्रशांत किशोर अपने आक्रामक अंदाज, तेज भाषण, तथ्यों और तर्कों के साथ सदन में सरकार को लगातार घेरते हैं, तो विपक्ष की राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे बदल सकता है. हाल के छात्र आंदोलन के दौरान भी प्रशांत किशोर लगातार सक्रिय रहे. उन्होंने छात्रों के मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी.
तेजस्वी यादव ने भी आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन उनकी विदेश यात्रा को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ी रही. इससे भी विपक्ष के भीतर नेतृत्व को लेकर चर्चा तेज हुई. बिहार की राजनीति में अब मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम विपक्ष का नहीं रह गया है. विपक्ष के भीतर भी नेतृत्व की नई लड़ाई शुरू होती दिखाई दे रही है. आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि प्रशांत किशोर का बढ़ता प्रभाव केवल चुनावी चुनौती है या फिर वह बिहार की विपक्षी राजनीति का नया चेहरा बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं.