नौकरी को लात मारकर खड़ी की ऐसी कंपनी, जिसके बिना आज करोड़ों घरों पूजा मानाी जाती है अधूरी
Raisina News Desk- अगस्त 02, 2026 07:56 AM IST

देश को आजादी मिले अभी कुछ ही महीने हुए थे. हर तरफ अनिश्चितता का माहौल था. ऐसे समय में अगर किसी गरीब नौजवान के हाथ में ‘केंद्र सरकार की पक्की नौकरी’ का लेटर आ जाए, तो उसके परिवार की तो खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा, है न? लेकिन उस सिरफिरे इंसान ने उस सरकारी नौकरी के लेटर को चौराहे पर बैठकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया और हवा में उड़ा दिया.
यह कहानी है ‘साइकिल प्योर अगरबत्ती’ के संस्थापक एन. रंगा राव की. एक ऐसा इंसान, जिसने असफलता के मलबे से निकलकर 1700 करोड़ का ऐसा साम्राज्य खड़ा कर दिया, जिसके बिना आज भारत के करोड़ों घरों में पूजा अधूरी मानी जाती है.
बात साल 1946-47 की है. रंगा राव जी ने बिजनेस में किस्मत आजमाई, लेकिन बुरी तरह नाकाम रहे. पहले ट्रेडिंग का काम डूबा, फिर डेरी फार्मिंग का बिजनेस भी ठप्प हो गया. जेब खाली थी और सिर पर जिम्मेदारियों का पहाड़.
घर की बदहाली देखकर उन्होंने भारी मन से केंद्र सरकार की नौकरी के लिए फॉर्म भरा. साल 1948 में किस्मत ने दरवाजा खटखटाया और हाथ में आ गया केंद्र सरकार का ‘अपॉइंटमेंट लेटर’.
लेकिन रंगा राव तो किसी और ही मिट्टी के बने थे. मैसूर की विनोबा रोड पर एक पत्थर के बेंच पर वे बैठे. हाथ में वो सरकारी लेटर था जो उनके परिवार की गरीबी को पल भर में दूर कर सकता था. लेकिन उन्होंने उस लेटर को देखा, अपनी आंखों में तैरते सपनों को याद किया और उस पक्के सरकारी पत्र के टुकड़े-टुकड़े करके हवा में उड़ा दिए. वे खाली हाथ घर लौटे और परिवार से कहा- “मैं नौकरी नहीं, अपना खुद का बिजनेस करूंगा.”
यह फैसला किसी आम इंसान के बस की बात नहीं थी. घर में बूढ़ी मां थी, पत्नी थी और चार-चार छोटे बच्चे थे. खाने के लाले पड़े थे और रंगा राव ने एक ऐसा दांव खेला जिसने उनकी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी.
उन्होंने अपनी मां के बचे-कुचे गहने गिरवी रखे और 4,000 रुपये का कर्ज लिया. इसी 4,000 रुपये की मामूली पूंजी से साल 1948 में उन्होंने ‘मैसूर प्रोडक्ट्स एंड जनरल ट्रेडिंग कंपनी’ की नींव रखी, जिसे आज हम सब ‘साइकिल प्योर अगरबत्ती’ (NR Group) के नाम से जानते हैं.
रंगा राव जी का एक ही मूलमंत्र था- “चीज बनाओ तो ऐसी, जिसका कोई मुकाबला न हो.”
वे दिन-रात मेहनत में जुट गए. उन्होंने अगरबत्ती के क्षेत्र में ऐसे-ऐसे प्रयोग किए जो उस जमाने में कोई सोच भी नहीं सकता था. उन्होंने मैसूर में देश की पहली इन-हाउस ‘फैग्रेंस लैब’ बनाई ताकि वे खुद नई-नई खुशबू खोज सकें.
नतीजा यह हुआ कि जो इंसान 1948 में 4,000 रुपये के कर्ज पर खड़ा था, 1958 आते-आते यानी महज 10 सालों में उसने 10 लाख रुपये का टर्नओवर खड़ा कर दिया. उस जमाने का 10 लाख, आज के सैकड़ों करोड़ के बराबर था.
उस जमाने में अगरबत्तियां टीन के भारी डिब्बों में आती थीं, जो महंगी होती थीं. रंगा राव पहले ऐसे इंसान थे जिन्होंने अगरबत्ती को प्लास्टिक के पैकेट में पैक करना शुरू किया. इससे लागत घटी और अगरबत्ती आम गरीब की जेब के दायरे में आ गई.
जब भारत में क्रिकेट को धर्म की तरह पूजा जाता है और भारत-पाकिस्तान के मैच में हर घर में अगरबत्तियां जलती हैं, तब साइकिल अगरबत्ती ने मार्केटिंग का ऐसा दांव खेला जिसने सबको हैरान कर दिया.
जब भी मैच में थर्ड अंपायर ‘आउट’ या ‘नॉट आउट’ का फैसला देने वाला होता, पूरी दुनिया की नजरें टीवी स्क्रीन के उस छोटे से हिस्से पर टिकी होती थीं. ठीक उसी पल स्क्रीन पर चमकता था- ‘साइकिल प्योर अगरबत्ती’. इस एक विचार ने साइकिल अगरबत्ती को देश के कोने-कोने में घर-घर का नाम बना दिया.
आज यह ग्रुप 1700 करोड़ रुपये से ज्यादा का रेवेन्यू बना रहा है. दुनिया के 75 से अधिक देशों में इनकी सुगंध महक रही है. साल भर में यह कंपनी 12 अरब से ज्यादा अगरबत्तियां बेच देती है. यह दुनिया की पहली कार्बन-न्यूट्रल प्रमाणित अगरबत्ती कंपनी है. इतना ही नहीं, मंदिरों में चढ़े बासी फूलों को नदियों में बहने से रोककर, उनसे सुगंधित अगरबत्तियां बनाई जाती हैं और गांव की हजारों महिलाओं को रोजगार दिया जाता है.
आज भी अगरबत्ती का बाजार बहुत हद तक असंगठित (Unorganized) है, लेकिन आईटीसी जैसे दिग्गजों के आने के बावजूद ‘साइकिल प्योर अगरबत्ती’ नंबर-1 की कुर्सी पर सीना ताने खड़ी है. एन. रंगा राव जी की यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर आपके पास हिम्मत है, ईमानदारी है और अपने काम में नया करने का जज्बा है, तो एक साइकिल पर शुरू हुआ सफर भी सफलता की बुलंदियों तक पहुंच सकता है.