रजत अग्रवाल: दिवालिया हुए, घर बिक गया… फिर जीरो से खड़ी कर दी ₹12000 करोड़ की कंपनी
Raisina News Desk- जुलाई 30, 2026 10:29 AM IST

Rajat Agrawal Founder Gravita India Success Story: सोचिए… एक लड़का जिसने अपने दम पर बिजनेस खड़ा किया, लेकिन एक झटके में सब तबाह हो गया. कंपनी दिवालिया हो गई, कर्जदारों ने उस घर को नीलाम कर दिया जिसे उसके मां-बाप ने बड़ी मन्नतों से बनाया था. परिवार सड़क पर आ गया. ऐसी स्थिति में कोई भी इंसान टूट कर बिखर जाएगा. लेकिन आज जिस शख्स की बात हम कर रहे हैं, उसने टूटने के बजाय उस राख से दोबारा उठने की कसम खाई.
ये कहानी है ‘ग्रेविटा इंडिया लिमिटेड के फाउंडर रजत अग्रवाल की. एक ऐसा शख्स जिसने कबाड़ (Recycling) के बिजनेस में ऐसा हाथ आजमाया कि आज वो 12,000 करोड़ की ग्लोबल कंपनी के मालिक हैं.
रजत किसी रईस खानदान से नहीं आते. पिता सरकारी डॉक्टर थे, इसलिए उनका बचपन राजस्थान के अलग-अलग जिलों के सरकारी स्कूलों में बीता. जब इंजीनियरिंग कॉलेज (MNIT) में दाखिला लिया, तो जहां बाकी लड़के सरकारी नौकरी या सिविल सर्विस के सपने देख रहे थे, रजत के दिमाग में ‘बिजनेस’ का कीड़ा कुलबुला रहा था.
उन्होंने अपने माता-पिता से 1 लाख रुपये मांगे. 90 हजार रुपये में जयपुर से 30 किलोमीटर दूर 20 एकड़ बंजर जमीन खरीदी. कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ ये लड़का अपने खेतों में कुएं खुदवा रहा था. वहां हाइब्रिड खेती शुरू की और साथ ही 10 गायों से डेयरी खोली, जो जल्द ही 35 गायों तक पहुंच गई. रजत अपने खेत की सब्जियां ट्रक में भरकर सीधे दिल्ली की आजादपुर मंडी भेजते थे.
इंजीनियरिंग खत्म होते ही उनके इस ‘देसी’ स्टार्टअप तजुर्बे ने उन्हें ‘लार्सन एंड टुब्रो’ (L&T) जैसी दिग्गज कंपनी में शानदार नौकरी दिला दी. वहां उन्होंने सेल्स से लेकर इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग तक बहुत कुछ सीखा. लेकिन दिल तो अपना मालिक बनने का था.
पर्यावरण को बचाने की धुन में रजत ने ‘रीसाइक्लिंग’ (Recycling) के फील्ड में उतरने की ठानी. उन्होंने वेस्ट ऑयल, पुराने टायर, थिनर और पुरानी बैटरियों की रीसाइक्लिंग पर रिसर्च की. अंत में फैसला लिया- पुरानी कार बैटरियों से ‘लेड’ (Lead) यानी सीसा निकालने का, क्योंकि तब भारत में इसकी भारी कमी थी. रजत ने अपनी वो 35 गायों वाली डेयरी बेची, बैंक से लोन लिया और 1994 में अपना पहला छोटा सा रीसाइक्लिंग प्लांट लगा दिया. काम चल निकला और एक्साइड जैसी बड़ी कंपनियां उनकी ग्राहक बन गईं. सब कुछ किसी सुनहरे सपने जैसा था.
साल 1996, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ‘बेसल कन्वेंशन’ (Basel Convention) साइन हुआ और रातों-रात खतरनाक कचरे के आयात पर रोक लग गई. रजत की कंपनी के लिए कच्चा माल आना बंद हो गया. उन्होंने लेड से ‘केमिकल’ बनाने का काम शुरू किया, लेकिन तभी भारत सरकार का एक अध्यादेश आया. सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी 35% से घटाकर 5% कर दी. ये वो कील थी जिसने रजत के बिजनेस के ताबूत को बंद कर दिया.
चीन और मलेशिया से सस्ता माल आने लगा और रजत की फैक्ट्री ठप हो गई. वो बैंक का ब्याज भी नहीं चुका पा रहे थे. कंपनी दिवालिया हो गई. बैंक ने रिकवरी के लिए उनके माता-पिता का घर नीलाम कर दिया, जिसमें वे रहते थे. परिवार रातों-रात बेघर होकर किराए के मकान में आ गया. फैक्ट्री पर ताला लग गया.
दिवालिया होने के बाद रजत हारे नहीं. वो पत्नी के साथ सिंगापुर चले गए. वहां एक ट्रेडिंग कंपनी में 11 महीने काम किया ताकि इंटरनेशनल मार्केट समझ सकें. उन्हें समझ आ गया कि इंडिया में दिक्कत है, बाहर नहीं. उन्होंने एनआरआई (NRI) दोस्तों से उधार मांगा और अपनी पहली विदेशी यूनिट ‘श्रीलंका’ में लगाई. वो यूनिट चल पड़ी. फिर उन्होंने ‘अफ्रीका’ का रुख किया और वहां इथियोपिया, घाना, मोजाम्बिक में एक के बाद एक प्लांट लगाए. अफ्रीका उनके लिए गेम-चेंजर साबित हुआ और वहां से उन्होंने बेशुमार मुनाफा कमाया.
पैसा कमाने के बाद इंसान सबसे पहले क्या करता है? रजत ने 2006 में भारत के उस बैंक का दरवाजा खटखटाया जिसने उन्हें दिवालिया घोषित किया था. उन्होंने पाई-पाई चुकाई और अपनी वो जयपुर वाली फैक्ट्री वापस खरीदी. सालों बाद जब रजत अपनी उस बंद पड़ी फैक्ट्री में पहुंचे, तो दीवारें काली पड़ चुकी थीं, छतों पर पीपल के पेड़ उग आए थे. वो पल इतना भावुक था कि आज भी उसे याद करके रजत की आंखें छलक आती हैं.
2010 में ग्रेविटा इंडिया का आईपीओ (IPO) आया और वो 43 गुना सब्सक्राइब हुआ. आज कंपनी सिर्फ बैटरी नहीं, एल्युमीनियम, प्लास्टिक और रबर भी रीसाइकिल कर रही है. दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में ये अपने कॉम्पिटिटर्स को अपनी ही बनाई मशीनें बेचते हैं. कंपनी का मार्केट कैप आज 12 हजार करोड़ पार कर चुका है.
युवाओं के लिए रजत बचपन का एक चुटकुला सुनाते हैं- “एक हवाई जहाज ने रॉकेट से पूछा कि यार, तू इतनी तेजी से सीधे आसमान में कैसे चला जाता है? रॉकेट ने जवाब दिया- बेटा, जब पीछे आग लगी हो ना, तो आदमी अपने आप सीधे ऊपर भागता है.” रजत कहते हैं कि बिना उस ‘आग’ के बिजनेस नहीं होता.
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