जंतर-मंतर पर आंदोलन में आखिर क्यों भड़की हिंसा… छात्रों का गुस्सा या फिर साजिश, कहां तक पहुंची जांच?
Raisina News Desk- अगस्त 01, 2026 07:30 PM IST

नई दिल्ली:
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर हुई हिंसा की गूंज अब भी जांच एजेंसियों के गलियारों में सुनाई दे रही है. इस बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह हिंसा क्यों भड़की? क्या यह छात्रों और प्रदर्शनकारियों के गुस्से का नतीजा थी या फिर इसके पीछे पहले से रची गई कोई सुनियोजित साजिश थी?
यही सवाल अब दिल्ली पुलिस की जांच का केंद्र भी है. हालांकि हिंसा के करीब दो सप्ताह बाद भी पुलिस ने इस मामले में किसी की गिरफ्तारी नहीं की है. 20 जुलाई को हिरासत में लिए गए करीब 70 लोगों को भी पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था. अब जांच का पूरा फोकस डिजिटल सबूतों, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल डेटा और सोशल मीडिया गतिविधियों पर है.
दिल्ली पुलिस के अनुसार 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर जुटे और वहां से संसद की ओर मार्च निकालने की कोशिश की. उस समय संसद का मॉनसून सत्र चल रहा था और पूरे इलाके में बीएनएसएस की धारा 163 लागू थी, जंतर मंतर और संसद के आसपास के इलाके को 15 जोन में बांटा गया था, हर जोन का इंचार्ज एक डीसीपी रैंक का अधिकारी था.
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पुलिस ने संसद की सुरक्षा को देखते हुए कई स्तर की बैरिकेडिंग की थी और प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया. पुलिस का दावा है कि इसी दौरान कुछ लोगों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की और देखते ही देखते पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव शुरू हो गया. इसके बाद पथराव, सरकारी संपत्ति में तोड़फोड़ और हिंसा शुरू हो गई.
पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और बाद में रैपिड एक्शन फोर्स की ओर से पेलेट गन का भी इस्तेमाल किया गया. इस दौरान सैकड़ों प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए.
20 जुलाई की शाम तक दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर और संसद मार्ग को खाली करा लिया था. हालांकि बाद में कॉकरोच जनता पार्टी के लोगों को दोबारा जंतर-मंतर पर बैठने की अनुमति दी गई. लेकिन इसके बावजूद हिंसा नहीं रुकी. कनॉट प्लेस, जनपथ और आसपास के इलाकों में देर रात तक पथराव, आगजनी और वाहनों में तोड़फोड़ की घटनाएं होती रहीं.
पुलिस के मुताबिक, 21 जुलाई से 25 जुलाई तक अलग-अलग जगहों पर पुलिसकर्मियों को निशाना बनाकर हमले किए गए. इन घटनाओं में इंस्पेक्टर नंदकिशोर, एसीपी विवेक भगत, एसीपी रोहित, एसीपी कैलाश बिष्ट सहित कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी घायल हुए.
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार करीब 250 पुलिसकर्मी घायल हुए. इसके अलावा 100 से ज्यादा बैरिकेड क्षतिग्रस्त हुए, 300 से अधिक बॉडी प्रोटेक्टर खराब हुए, 350 से ज्यादा हेलमेट टूटे, 50 से अधिक दंगा-रोधी शील्ड क्षतिग्रस्त हुईं, 20 से ज्यादा लाउड हेलर खराब हुए और 25 से अधिक सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचा.
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दिल्ली पुलिस ने इस पूरे घटनाक्रम में 20 से ज्यादा मामले दर्ज किए हैं. इनमें 14 एफआईआर हिंसा, दंगा और विरोध प्रदर्शन से जुड़ी हैं. एक मामला प्रतिबंधित क्षेत्र में ड्रोन उड़ाने को लेकर दर्ज किया गया है, जबकि अन्य मामले पत्रकारों, सरकारी कर्मचारियों और आम लोगों पर हमले से जुड़े हैं. इन मामलों में दंगा, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, हत्या के प्रयास, पुलिस पर हमला, संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने की कोशिश, आपराधिक साजिश और अन्य गंभीर धाराएं लगाई गई हैं.
दिल्ली पुलिस अब इस मामले की जांच केवल कानून-व्यवस्था के उल्लंघन के तौर पर नहीं बल्कि संभावित बड़ी साजिश के एंगल से भी कर रही है. पुलिस का कहना है कि यह पता लगाया जा रहा है कि हिंसा अचानक हुई या फिर पहले से इसकी योजना बनाई गई थी.
जांच के दौरान दिल्ली पुलिस ने फेस रिकॉग्निशन सिस्टम (FRS) की मदद से प्रदर्शन में शामिल 2,873 अपराधियों की पहचान करने का दावा किया है. पुलिस के मुताबिक इनमें से 989 लोगों का गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड मिला है.
दिल्ली पुलिस के अनुसार, इनमें 101 लोग हत्या के मामलों, 62 हत्या के प्रयास, 284 डकैती और लूट, 61 दुष्कर्म, 6 पॉक्सो, 25 महिलाओं से छेड़छाड़, 229 आर्म्स एक्ट, 135 स्नैचिंग, 19 अपहरण और 67 एनडीपीएस कानून के मामलों में आरोपी रह चुके हैं.
पुलिस का यह भी दावा है कि इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके खिलाफ दो, पांच या दस से अधिक आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं.
दिल्ली पुलिस की जांच अब उन लोगों पर केंद्रित है जिन्होंने चेहरे पर मास्क पहनकर हिंसा की. करीब 400 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है और अलग-अलग वीडियो को जोड़कर घटनाओं का पूरा सीक्वेंस तैयार किया जा रहा है.
दिल्ली पुलिस की साइबर यूनिट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कई यूट्यूब चैनलों की भी जांच कर रही है. पुलिस का दावा है कि कुछ हैंडल के जरिए अफवाहें फैलाई गईं, लोगों को उकसाया गया और प्रदर्शन के दौरान भीड़ को निर्देश दिए गए.
डिजिटल फॉरेंसिक टीम मोबाइल फोन, चैट, वीडियो, लोकेशन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की जांच कर रही है, इनमें कुछ यूट्यूबर्स की भूमिका की भी जांच की जा रही है.
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सूत्रों के मुताबिक, जांच एजेंसियां कुछ राजनीतिक संगठनों और अन्य समूहों की संभावित भूमिका की भी जांच कर रही हैं. पुलिस का दावा है कि कुछ लोगों की भूमिकाएं पहले से तय थीं.
दिल्ली पुलिस की नजर अब उन लोगों पर है जो घटना के बाद से गायब हैं या सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं. सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, फेस रिकॉग्निशन, डिजिटल डेटा और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के आधार पर उनकी पहचान की जा रही है. माना जा रहा है कि जांच पूरी होने के बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और पूरक चार्जशीट दाखिल की जा सकती हैं.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है क्या जंतर-मंतर की हिंसा अचानक भड़के गुस्से का नतीजा थी या फिर इसके पीछे पहले से तैयार की गई कोई सुनियोजित साजिश थी? इसका जवाब अब दिल्ली पुलिस की जांच और अदालत में पेश होने वाले सबूत ही देंगे.