'एक व्यक्ति के जीवन के 22 साल बिना विश्वसनीय सबूत के छीन लिए गए ', सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी को किया बरी
Raisina News Desk- अगस्त 05, 2026 11:14 AM IST

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे व्यक्ति को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि उनकी दोषसिद्धि एक ऐसे प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पर आधारित थी, जो “कमजोर और बेहद अविश्वसनीय” थी. दोषी ने इस मामले में करीब 22 साल जेल में बिताए. जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर उससे इकबालिया बयान कराना और फिर उसी आधार पर दोषी ठहराना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है. पीठ ने टिप्पणी की कि इस तरह एक व्यक्ति के जीवन के 22 साल बिना विश्वसनीय सबूत के छीन लिए गए.
यह मामला ओडिशा के कोरापुट जिले में तीन महिलाओं, कमला, सोनबारी और रतनाई की हत्या से जुड़ा था. अभियोजन पक्ष का पूरा मामला लगभग एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पर टिका था. गवाह ने दावा किया था कि उसने रात करीब 1 बजे अर्जुन जानी को रतनाई पर हमला करते देखा था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गवाह के बयान में कई गंभीर विरोधाभास थे. उसने उसी रात अन्य दो महिलाओं के शव नहीं देखने की बात कही, जबकि उसका रास्ता वहीं से गुजरता था. उसने अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों को घटना बताने की बात कही और उसकी कहानी अन्य परिस्थितियों से मेल नहीं खाती थी.
ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद अर्जुन जानी ने हाईकोर्ट में अपील की थी, लेकिन 3,157 दिनों की देरी के कारण हाई कोर्ट ने अपील पर सुनवाई किए बिना ही उसे खारिज कर दिया. उस समय तक जानी 12 साल से अधिक जेल में रह चुका था. इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां भी अपील में 3,703 दिनों की देरी थी. सुप्रीम कोर्ट ने देरी माफ करते हुए कहा कि हाई कोर्ट को यह ध्यान रखना चाहिए था कि यह जेल से दायर की गई अपील थी और आरोपी पहले ही लंबे समय से जेल में था.
सुप्रीम कोर्ट ने जांच में कई खामियां भी बताईं कि पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि संदेह सीधे अर्जुन जानी पर ही क्यों गया. एक गवाह ने स्वीकार किया कि पुलिस ने जानी को पीटकर कथित स्वीकारोक्ति कराई थी, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है. हत्या में इस्तेमाल बताए गए पत्थरों पर खून के निशान नहीं मिले. बरामदगी को लेकर भी गवाहों और जांच अधिकारी के बयानों में विरोधाभास था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है, लेकिन तभी जब वह विश्वसनीय, सुसंगत और अन्य परिस्थितियों से मेल खाने वाली हो. इस मामले में ऐसा नहीं था.
इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपराध को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा. इसलिए अदालत ने अर्जुन जानी को बरी कर दिया और उनकी जमानत भी समाप्त कर दी. साथ ही, अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कोरापुट को निर्देश दिया कि वह जिला प्रशासन की मदद से अर्जुन जानी के पुनर्वास और समाज में पुनर्स्थापन की व्यवस्था करे.