हिमालय के लिए एक साथ आएं भारत-चीन-पाकिस्तान-नेपाल-भूटान, सद्गुरु के इस सुझाव को समझें
Raisina News Desk- सितंबर 02, 2026 06:53 AM IST

नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के बाद आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने हिमालय को लेकर एक बड़ा प्रस्ताव दिया है. उनका कहना है कि हिमालय सिर्फ किसी एक देश का हिस्सा नहीं है. इसकी पर्वत श्रृंखलाएं कई देशों में फैली हैं और यहां आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का असर भी सीमाओं तक सीमित नहीं रहता. इसके साथ ही सद्गुरु ने भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान को मिलाकर पांच देशों के संयुक्त हिमालयन बोर्ड बनाने का सुझाव दिया है. उन्होंने यह बात काठमांडू में आयोजित ‘नेपाल के साथ एकजुटता’ कार्यक्रम में कही.
सद्गुरु का सुझाव है कि हिमालय से जुड़े इन पांच देशों को आपदा के समय मिलकर काम करने के लिए एक साझा व्यवस्था बनानी चाहिए. उनका तर्क सीधा है. हिमालय की कोई राजनीतिक पहचान नहीं है. पहाड़ यह नहीं देखते कि सीमा किस देश की है, वहां कौन सी भाषा बोली जाती है या किसकी राजनीतिक व्यवस्था है.
सद्गुरु ने कहा कि अगर हिमालयी क्षेत्र को एक ही प्रशासनिक इकाई की तरह चलाना संभव नहीं है, तो कम से कम इन देशों के बीच एक साझा परामर्श व्यवस्था जरूर होनी चाहिए. यानी उनका जोर सिर्फ राहत और बचाव पर नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र को लेकर लंबे समय की सामूहिक जिम्मेदारी पर है.
Photo Credit: Isha Foundation
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई. कई जिलों में नुकसान हुआ और हजारों लोग लापता बताए गए.
नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण यानी NDRRMA के मुताबिक, सोमवार तक इस आपदा में मौतों का आंकड़ा 900 के पार पहुंच गया था और 4,000 से ज्यादा लोग लापता थे.
सद्गुरु के संगठन ईशा फाउंडेशन के मुताबिक, उसके 77 तीर्थयात्री भी इस आपदा के बाद संपर्क से बाहर हैं. ये लोग कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए वहां गए थे. इसके अलावा नेपाल की तरफ मौजूद ईशा फाउंडेशन के तीन स्वयंसेवकों का भी पता नहीं चल पाया है.
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सद्गुरु का कहना है कि इस आपदा का पैमाना ऐसा था जिसकी सामान्य तौर पर उम्मीद करना मुश्किल था.
उनके मुताबिक, “अब जब इतनी बड़ी आपदा हो चुकी है तो उसके बाद की स्थिति से निपटने की जिम्मेदारी सिर्फ नेपाल पर नहीं छोड़ी जा सकती.”
उन्होंने कहा कि नेपाल जैसा छोटा देश अकेले इस तरह की आपदा से निपटने की स्थिति में नहीं होना चाहिए.
यही वजह है कि उन्होंने हिमालय से जुड़े सभी देशों के बीच तत्काल सहयोग की जरूरत बताई.
सद्गुरु के प्रस्ताव का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह इसे केवल मौजूदा आपदा तक सीमित नहीं देखते. उनका कहना है कि हिमालय बेहद विशाल और शानदार पर्वतीय क्षेत्र है, लेकिन साथ ही बेहद नाजुक भी है. इसलिए हिमालय से जुड़े देशों को इसके भविष्य को साझा जिम्मेदारी के तौर पर देखना चाहिए.
यानी बात केवल यह नहीं है कि आपदा आने के बाद कौन राहत भेजेगा. सवाल यह भी है कि हिमालयी क्षेत्र से जुड़ी ऐसी परिस्थितियों के लिए देश पहले से किस तरह एक-दूसरे से सलाह और सहयोग कर सकते हैं.
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कार्यक्रम में अभिनेत्री मनीषा कोइराला के साथ बातचीत के दौरान सद्गुरु ने लोगों से इस त्रासदी को किसी दैवी या रहस्यमय कारण से जोड़ने से बचने की अपील भी की.
उन्होंने कहा कि भौतिक घटनाएं भौतिक नियमों के तहत होती हैं और ऐसी घटनाओं को रहस्यमय या दैवी कारणों से जोड़ना इंसानी पीड़ा को कम करके आंकने जैसा हो सकता है.
यानी उनका संदेश था कि ऐसी आपदाओं को समझने और उनसे निपटने के लिए वास्तविक भौतिक परिस्थितियों और मानवीय जिम्मेदारी पर ध्यान देना चाहिए.
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सद्गुरु ने नेपाल के प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में 1 करोड़ रुपये देने का भी एलान किया. इसके अलावा उन्होंने आपदा में जान गंवाने वाले लोगों के लिए कोयंबटूर स्थित ईशा योग केंद्र में विशेष अनुष्ठान किए जाने की बात कही.
इस तरह उनका नेपाल दौरा तत्काल राहत, पीड़ितों के प्रति समर्थन और हिमालयी क्षेत्र के लिए दीर्घकालीन सहयोग की मांग, तीनों पहलुओं से जुड़ा रहा.
सद्गुरु का 5-देशों वाला प्रस्ताव मूल रूप से एक सवाल उठाता है: जब प्रकृति की आपदा सीमा नहीं देखती, तो उससे निपटने की तैयारी सिर्फ राष्ट्रीय सीमाओं तक क्यों सीमित रहे?
हिमालय कई देशों में फैला हुआ है. सद्गुरु इसी साझा भौगोलिक वास्तविकता को साझा आपदा प्रतिक्रिया की जरूरत से जोड़ रहे हैं.
उनका कहना है कि इन देशों के बीच कम से कम परामर्श और सहयोग का ऐसा ढांचा होना चाहिए जो हिमालयी आपदाओं के समय सामूहिक प्रतिक्रिया को मजबूत कर सके और नेपाल की मौजूदा त्रासदी ने इस सवाल को और ज्यादा गंभीर बना दिया है.