'लाल टोपी' वाले अखिलेश ने क्यों पहना दी 'नीली' टी-शर्ट ? PDA के पीछे छिपा है ये बड़ा सियासी संदेश
Raisina News Desk- सितंबर 16, 2026 04:01 PM IST

दशकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में लाल टोपी समाजवादी पार्टी की पहचान रही है और नीला रंग बहुजन समाज पार्टी की राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक. लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव इन दोनों रंगों को एक साथ लाने की कवायद में जुट गए हैं. समाजवादी छात्र सभा के लिए ब्लू टी-शर्ट और जींस को नई यूनिफॉर्म बनाकर उन्होंने सिर्फ ड्रेस कोड नहीं बदला, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. अखिलेश खुले तौर पर नीले रंग को बाबा साहेब अंबेडकर, संविधान, बहुजन आंदोलन और सामाजिक न्याय से जोड़ रहे हैं. ऐसे समय में जब BSP का जनाधार कमजोर पड़ा है और दलित वोटों की नई लड़ाई शुरू हो चुकी है, सपा का यह दांव उसके PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. सवाल यही है कि क्या लाल टोपी के साथ जुड़ा यह नया नीला रंग सपा को दलित वोटरों के और करीब ले जा पाएगा?
सपा के इस कदम को सिर्फ यूनिफॉर्म बदलने के फैसले के तौर पर नहीं देखा जा रहा. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इसके जरिए पार्टी अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम वोट बैंक से आगे बढ़कर दलित मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक लंबे समय तक मायावती और बहुजन समाज पार्टी की सबसे बड़ी ताकत रहा है.
सपा अब उसी जगह में अपनी सियासी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश करती दिख रही है. यही वजह है कि अखिलेश यादव का यह नया प्रयोग राजनीतिक हलकों में खास चर्चा का विषय बना हुआ है.
लोकसभा चुनाव 2024 ने इस रणनीति को और ताकत दी. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतीं, जबकि BSP का खाता भी नहीं खुला. इसके बाद अखिलेश यादव ने अपने PDA यानी ‘पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक’ फॉर्मूले को और आक्रामक तरीके से धार देना शुरू कर दिया. हालांकि अब इसमें ‘P’ का मतलब पंडित भी बताया जाने लगा है. सपा का मानना है कि यही सामाजिक गठजोड़ भविष्य में BJP के मुकाबले खड़ा हो सकता है. हालांकि सपा के सामने चुनौती सिर्फ दलित वोट हासिल करने की नहीं है. उसे दलित समुदाय को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि उनकी अलग सामाजिक और राजनीतिक पहचान को कमजोर किए बिना भी सपा उनका प्रतिनिधित्व कर सकती है. यहीं पर नीले रंग का सियासी इस्तेमाल अहम हो जाता है.
समाजवादी पार्टी के स्टूडेंट्स विंग के नीले टी शर्ट के लांच के समय अखिलेश यादव
2022 विधानसभा चुनाव के बाद से PDA फॉर्मूला अखिलेश यादव की राजनीति का केंद्र बन गया है. इसकी सोच यह है कि पिछड़ी जातियां, दलित और अल्पसंख्यक एक साझा सामाजिक मोर्चा बनाएं. सपा को भी यह एहसास है कि सिर्फ यादव और मुस्लिम वोटों के दम पर सत्ता में वापसी आसान नहीं है.
सपा ने दलित समुदाय के बीच पहुंच बढ़ाने की कोशिश 2022 चुनाव से पहले भी की थी. इसी रणनीति के तहत ‘बाबा साहेब वाहिनी’ बनाई गई थी. इसका ध्यान खास तौर पर गैर-जाटव दलित समुदाय पर था. जाटव समुदाय को BSP का कोर वोट बैंक माना जाता है. उस समय अखिलेश यादव ने समाजवादी और अंबेडकरवादी राजनीति को साथ लाने की बात भी कही थी. ब्लू टी-शर्ट वाली नई यूनिफॉर्म को उसी रणनीति का अगला कदम माना जा रहा है.
इस पूरे बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सपा अपनी पुरानी पहचान से दूरी नहीं बना रही. नई यूनिफॉर्म में लाल टोपी आज भी बरकरार है. यानी पार्टी पुराना रंग छोड़ नहीं रही, बल्कि उसमें एक नया रंग जोड़ रही है.
सपा की स्थापना 1992 में मुलायम सिंह यादव ने की थी. लेकिन लाल टोपी को पार्टी की पहचान बनने में कुछ साल लगे. 1998 में मुलायम सिंह यादव ने युवजन सभा के कार्यकर्ताओं को लाल टोपी पहनने का सुझाव दिया था. इसके बाद यह धीरे-धीरे पूरे संगठन की पहचान बन गई. समाजवादी राजनीति में लाल रंग को मजदूर और समाजवादी विचारधारा से जोड़ा जाता है, जबकि हरा रंग किसानों का प्रतीक माना जाता है. अब उसी पहचान के साथ नीले रंग को जोड़ने की कोशिश हो रही है.
2021 विधानसभा चुनाव से पहले गोरखपुर की एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल टोपी को मुद्दा बनाया था. उन्होंने लाल टोपी को उत्तर प्रदेश के लिए “रेड अलर्ट” बताया था. PM मोदी ने इसे भ्रष्टाचार, अपराध और कथित तौर पर आतंकवाद के प्रति नरमी से जोड़ते हुए सपा पर हमला बोला था. इसके जवाब में अखिलेश यादव ने कहा था कि असली रेड अलर्ट BJP के लिए है. उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याओं को सरकार के लिए खतरा बताया था. तब सपा ने अपने चुनावी गीतों में भी लाल टोपी और साइकिल को बदलाव का प्रतीक बनाकर पेश किया था.
लंबे समय तक BSP और SP की राजनीतिक जमीन अलग-अलग रही. BSP दलित राजनीति की सबसे बड़ी ताकत थी, जबकि SP पिछड़ों, खासकर यादव राजनीति का केंद्र मानी जाती थी. लेकिन BSP के कमजोर पड़ने से यह समीकरण बदलने लगा है. हाल के दिनों में मायावती और उनके भतीजे आकाश आनंद के बीच मतभेदों की चर्चा भी BSP के लिए चुनौती बनी है.
हालांकि उनके सामने चुनौती भी कम नहीं है. वे BSP के वोटरों तक पहुंचना चाहते हैं, लेकिन BSP की राजनीति की नकल करते हुए भी नहीं दिखना चाहते.
इसी वजह से हाल के वर्षों में अखिलेश यादव लगातार अंबेडकर, संविधान, सामाजिक न्याय और कांशीराम का जिक्र बढ़ा रहे हैं. सपा ने BSP संस्थापक कांशीराम की जयंती 15 मार्च को ‘PDA दिवस’ के तौर पर मनाने का फैसला भी किया था. इस पर मायावती ने सपा पर बहुजन महापुरुषों का चुनावी इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था.
अखिलेश यादव की राह में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ BSP नहीं, BJP भी है. BJP ने 2017, 2019 और 2022 के चुनावों में बड़ी संख्या में दलित वोट हासिल किए थे. लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में तस्वीर कुछ बदली हुई नजर आई. चुनाव बाद के सर्वेक्षणों में दावा किया गया कि गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ गया. कुछ जाटव वोट भी गठबंधन को मिले. इसी वजह से अखिलेश यादव को लग रहा है कि PDA फॉर्मूला जमीन पर असर दिखा सकता है. हालांकि BJP ने भी कल्याणकारी योजनाओं और लाभार्थी राजनीति के जरिए दलित समुदाय के बीच मजबूत पकड़ बनाई है. इसलिए यह मुकाबला आने वाले दिनों में और दिलचस्प हो सकता है.
ब्लू टी-शर्ट देखने में एक छोटा बदलाव लग सकता है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने कहीं बड़े हैं. इसके जरिए सपा दलित मतदाताओं को संदेश देना चाहती है कि पार्टी उनकी राजनीति और पहचान को महत्व देती है. वहीं युवा वोटरों को भी यह संकेत दिया जा रहा है कि सपा खुद को नई पीढ़ी की भाषा में ढालने की कोशिश कर रही है. लेकिन आखिरकार राजनीति सिर्फ प्रतीकों से नहीं चलती. वोटर यह देखेगा कि नीले रंग के साथ आया यह संदेश जमीन पर कितना दिखता है. 2027 का चुनाव शायद इस सवाल का जवाब देगा कि यह सिर्फ नई यूनिफॉर्म थी, या फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी नए सामाजिक गठजोड़ की शुरुआत.
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