साड़ी में दौड़ती कविता को तो सबने देखा, ये 5 कहानियां आप में जोश भर देंगी, इनका संघर्ष बन गया नजीर
Raisina News Desk- अक्टूबर 27, 2026 09:23 PM IST
झारखंड के रामगढ़ की होमगार्ड भर्ती प्रक्रिया में नौकरी के लिए साड़ी में दौड़ती नजर आई कविता महतो देश भर में चर्चा का विषय बनी हुई है. पति की मृत्यु के बाद दो बच्चों की जिम्मेदारी संभाल रही 27 वर्षीय कविता महतो ने बिना जूतों के सिर्फ एक साधारण साड़ी पहनकर 1600 मीटर की दौड़ में हिस्सा लिया. उन्होंने इस कठिन परीक्षा में न केवल अपना साहस दिखाया बल्कि दौड़ पूरी कर सभी को हैरान कर दिया. हालांकि, रिपोर्ट्स के मुताबिक आगे की शारीरिक बाधाओं या ऊंची कूद में सफल न होने के कारण उनका चयन नहीं हो सका, लेकिन उनका यह जज्बा और संघर्ष आज पूरे देश में लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन गया है. चलिए ऐसी ही महिलाओं की संघर्ष की कुछ कहानियों के बारे में आपको बताते हैं.
नींबू पानी बेचने से पुलिस अधिकारी बनने तक: केरल के वर्कला शहर की रहने वाली एसपी आनी ने जीवन में काफी संघर्ष किया. उन्होंने पति से अलग होने के बाद अकेले अपने बच्चे की परवरिश की. आर्थिक चुनौतियों के बीच उन्होंने वर्कला में नींबू पानी बेचकर गुजारा किया. उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और 2016 में सिविल पुलिस अधिकारी बनीं. बाद में उपनिरीक्षक की परीक्षा भी पास की.
बिहार की बबली कुमारी ने 2015 में पुलिस कांस्टेबल बनकर नौकरी हासिल की. लेकिन उनका सपना इससे भी बड़ा था. लंबी ड्यूटी और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने पढ़ाई जारी रखी. गर्भावस्था के दौरान भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी नहीं छोड़ी. मुश्किल हालात के बावजूद उनकी मेहनत जारी रही. आखिरकार उन्होंने ऊंचा मुकाम हासिल किया और पुलिस उपाधीक्षक बनीं. उनकी कहानी बताती है कि दृढ़ संकल्प से मुश्किल रास्ते भी पार किए जा सकते हैं. (X/
Pratham)
अंजू यादव ने ग्रामीण परिवेश में सामाजिक बंदिशों और निजी मुश्किलों का सामना किया. शादी के बाद उनकी जिंदगी में कई चुनौतियां आईं. उन्होंने अपनी पहचान बनाने के लिए शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का रास्ता चुना. घरेलू कामकाज तक सीमित रहने से लेकर पुलिस वर्दी पहनने तक का उनका सफर चर्चा में आया. वर्ष 2025 में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने संघर्ष की कहानी साझा की. (Instagram/anjuyadav_dsp)
महाराष्ट्र के बीड जिले की मीना घोडके ने खेती और पानी की कमी से जूझते इलाके में मुश्किल जीवन देखा. पढ़ाई के दौरान उन्हें खेतों में भी काम करना पड़ता था. वह नहीं चाहती थीं कि उनकी जिंदगी केवल मजदूरी और कम उम्र में शादी तक सीमित रह जाए. उन्होंने पुलिस में भर्ती होने का लक्ष्य बनाया और कांस्टेबल बनीं. उनके गांव में यह उपलब्धि महिलाओं के लिए नई मिसाल बनी. (File Photo)
दो रुपये किराया नहीं था, अब आईएएस अधिकारी: मध्य प्रदेश की सविता प्रधान गरीब आदिवासी परिवार में पली-बढ़ीं. बचपन में परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि बस का दो रुपये किराया जुटाना मुश्किल था. शादी के बाद उन्हें घरेलू हिंसा भी झेलनी पड़ी. वह दो बच्चों के साथ घर छोड़कर निकलीं. ब्यूटी पार्लर में काम करते हुए पढ़ाई पूरी की और प्रतियोगी परीक्षा पास करके प्रशासनिक अधिकारी बनीं. (Instagram/Savita Pradhan)