राम मंदिर चंदा चोरी से UGC नियमों तक… बीजेपी से क्यों नाराज हो रहा उसका कोर वोट बैंक?

राम मंदिर चंदा चोरी से UGC नियमों तक… बीजेपी से क्यों नाराज हो रहा उसका कोर वोट बैंक?

बीजेपी सरकार को जिन दो बातों का सबसे अधिक नुकसान हुआ है, उनमें से एक है राम मंदिर में चंदा चोरी और दूसरा कानून जो स्वयं मोदी सरकार ने बनाया, वह है UGC के नये नियम. इन दोनों घटनाओं से उसका कोर वोट बैंक खिसक गया. पीढ़ियों से बीजेपी समर्थक असंख्य लोग बीजेपी के नाम से चिढ़ने लगे जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर के लिए अपना सर्वस्व दान किया था. उनको लगा, जो सरकार भगवान के मंदिर का धन उड़ा सकती है, वह कौन-सा धतकरम नहीं कर सकती. इसी तरह यूजीसी के नए नियम आने से सामान्य बिरादरी से आने वाले सारे युवाओं/ छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो गया.

आजादी के बाद से हर जाति के पास धन का आगम हुआ है और शक्ति भी बढ़ी है. सरकार अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए दलितों और पिछड़ी जातियों को पूरी तरह अपने साथ करना चाहती है इसलिए यूजीसी में नए नियम लागू किये गये.

सामान्य वर्ग के छात्रों का संकट

ये नियम कुछ उसी तरह के हैं, जैसे कि दलित एक्ट. कोई दलित यदि आरोप लगा दे कि अगड़ी जाति के अमुक व्यक्ति ने उसको जाति सूचक शब्द बोल कर अपमानित किया है तो उसकी जमानत मुश्किल है. लेकिन यदि आरोपित व्यक्ति इच्छित धन दे कर दलित को साध ले तो वह मुक्त हो जाएगा.

अब इसी तरह का कानून पिछड़ी जातियों के लिए भी लागू होगा. भले वह पिछड़ी जाति वाला व्यक्ति भले किसी अगड़ी जाति वाले को अबे-तबे बोलता रहे. जाहिर है इस कानून से तो युवाओं का भविष्य ही ख़त्म हो जाएगा. इसे लेकर छात्रों का उबाल सड़क पर आ गया और सरकार को पीछे हटना पड़ा. पहले तो UGC नियमों को लाने वाले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ. अब सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने इन नियमों की समीक्षा के बाबत एक विशेष जांच कमेटी गठित करने की बात कही गई है.

जातिगत भेदभाव रुकेगा या बढ़ेगा

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कहा है कि कोई भी नियम सभी वर्गों के छात्रों को ध्यान में रख कर बनाये जाएं. इस बात पर फोकस हो कि किसी छात्र का उत्पीड़न न हो. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) रेगुलेशन 2026 पर रोक लगा दी थी. अभी UGC 2012 के नियमों के अनुसार ही काम हो रहा है.

वर्ष 2012 के नियमों के अनुसार जाति, धर्म, भाषा, स्थानीयता अथवा शारीरिक अक्षमता के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न करने की बात कही गई थी. यह सभी पर लागू था. लेकिन 2026 में जो नियम बनाये गये उनमें सिर्फ़ अनुसूचित जाति/ जनजाति और OBC छात्रों को अलग से धारा 3 (1) (C) के तहत परिभाषित किया गया है. और इसे ही जातिगत भेदभाव माना है. इसका दायरा बढ़ा कर इसे छात्रों के साथ शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को भी लिया गया है.

24 घंटे की निगरानी सिर्फ जाति पर

UGC के 2012 के नियम सलाह के तौर पर बनाये गये थे. इनके उल्लंघन पर किसी कड़े दंड का प्रावधान नहीं था. परंतु 2026 दंडात्मक कानून के तहत लाए जाएंगे. इस आधार पर किसी भी कॉलेज अथवा यूनिवर्सिटी का पंजीयन खत्म किया जा सकता है. जनवरी 2026 की 13 तारीख को जारी हुए इन नियमों के तहत SC, ST और ओबीसी छात्रों को काफ़ी अधिकार मिल जाते हैं लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों को लगता है, उनका भविष्य अंधकारमय किया जा रहा है. नियमों के अनुसार अब हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज को इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर बनाना होगा. यह सेंटर दलितों और पिछड़ों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं पर नजर रखेगा. इन समुदायों के छात्रों को पढ़ाई, सोशल वेलफेयर और धन की कमी आदि समस्याओं को भी देखेगा. उन्हें कानूनी सहायता भी उपलब्ध करवाएगा. एक समता हेल्प लाइन हर समय उपलब्ध रहेगी.

पहचान गुप्त रखी जाएगी

यदि किसी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी को लगे कि उसके साथ किसी तरह का भेदभाव किया जा रहा है तो वह इस हेल्प लाइन में शिकायत दर्ज करवा सकता है. यही नहीं नए नियम के अनुसार एक ऑन लाइन पोर्टल भी रहेगा, जिसमें वह बंदा अपनी शिकायत ई मेल पर भेज सकता है. उसकी पहचान गुप्त रखी जाने का भरोसा भी दिया गया है. यूजीसी ने स्पष्ट कहा है कि समता समूह (इक्विटी स्क्वॉड्स) बनाये जाएंगे. हर विभाग, हॉस्टल और लाइब्रेरी पर भी ये समता दूत निगरानी रखेंगे. किसी भी भेदभाव की शिकायत मिलते ही 24 घंटे के भीतर समता समिति की बैठक बुलाई जाएगी. 15 कार्य दिवस में निगरानी समिति अपनी रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को भेजेगा. इसके बाद सात कार्य दिवसों के भीतर कार्रवाई करनी होगी. अगर मामला दंडनीय अपराध का पाया गया तो उसे पुलिस को सौंपा जाएगा.

सामान्य वर्ग में रोष

नए नियमों के तहत बनाई जाने वाली समता समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएं और विकलांगजनों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है लेकिन जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है. साथ ही इक्विटी स्क्वॉड्स को कैंपस में संवेदनशील स्थानों की निगरानी का व्यापक अधिकार दिया गया है. एक बड़ी चिंता ये है कि समता समूह या इक्विटी स्क्वॉड्स जैसी व्यवस्थाएं कैंपस को लगातार निगरानी वाले माहौल में बदल देंगी. अंतिम ड्राफ्ट से झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान हटाए जाने के बारे में विरोध करने वालों का तर्क है कि इन नियमों का दुरुपयोग हो सकता है. यही कारण रहा कि नई नियमों की जानकारी बाहर आते ही सामान्य वर्ग के छात्रों में रोष उमड़ आया. उनको लगता है कि ये नियम सरासर जातिगत भेदभाव को बढ़ावा दे रहे हैं. इनमें सामान्य वर्ग को हर जगह से वंचित कर दिया गया है.

समर्थक और विरोधी आमने-सामने

इन नियमों की जानकारी मिलते ही छात्रों और बुद्धिजीवियों के दो गुट बन गये. एक उनका गुट जो इन नियमों के विरोध में उतर आए और दूसरे वे लोग जो इनका समर्थन कर रहे थे. हालांकि OBC वर्ग के कई छात्रों ने माना कि सामान्य वर्ग के छात्रों के विरुद्ध यदि शिकायत झूठी पाई गई तो आरोप लगाने वाले व्यक्ति को भी सजा देने का प्रावधान हो. किंतु सरकार ने एकतरफा फैसला कर लिया इसलिए छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट को गुहार लगाई. वहां से इन नियमों पर पुनर्विचार का निर्देश दिया गया और 29 जनवरी को UGC के नए नियमों के अनुपालन पर फिलहाल रोक लगा दी गई. लेकिन अब गुरुवार को केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि सरकार इन नियमों की समीक्षा के लिए एक कमेटी का गठन कर रही है.

सरकार की सांसत

सामान्य वर्ग के छात्रों को लगता है कि UGC बिल 2026 तो उनके साथ अन्याय कर रही है. क्योंकि यदि शिकायतकर्ता की शिकायत झूठी निकली तो उनका तो भविष्य चौपट हो गया. सामान्य वर्ग के छात्रों का आरोप है कि उनके साथ जो भेदभाव होगा, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा!. सामान्य वर्ग के छात्रों का मानना है कि सरकार के दिमाग़ में यह बात गहरे से पैठ गई है कि जातिगत भेदभाव सिर्फ़ सामान्य वर्ग के छात्र ही करते हैं. इसीलिए वे कड़ी निगरानी और चौबीसों घंटे पीछे लगे रहने वाले समता दूतों से परेशान हैं. जब भी सुप्रीम कोर्ट फैसला करे लेकिन सरकार सांसत में आ गई है. क्योंकि अगले वर्ष मार्च तक पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं. इनमें यूपी जैसा अहम प्रदेश भी है. सरकार के समक्ष दो संकट हैं. अपना कोर वोट बैंक बचाये या वोट बैंक का विस्तार करे!.

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