आर्म्स लाइसेंस घोटाला केस: दो IAS अधिकारियों को झटका, HC ने खारिज की याचिका
Raisina News Desk- नवंबर 06, 2026 11:06 PM IST
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने दो आईएएस अधिकारियों की एक अर्जी खारिज कर दी है. इन अधिकारियों ने लंबे समय से लंबित ‘आर्म्स लाइसेंस घोटाला’ जनहित याचिका (PIL) में हस्तक्षेप करने और केंद्र सरकार को यह निर्देश देने की मांग की थी कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने के प्रस्ताव पर फैसला लेने से पहले सरकार उनके पक्ष पर विचार करे.
मुख्य न्यायाधीश डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने कहा कि ऐसा निर्देश जारी करने का कोई औचित्य नहीं है. पीठ ने टिप्पणी की कि अधिकारियों की अर्जी से ऐसा लगता है मानो उनका मानना है कि अदालत के हस्तक्षेप के बिना संबंधित अधिकारी मामले पर ठीक से विचार नहीं करेंगे.
यह अर्जी 2004 बैच के एजीएमयूटी (AGMUT) कैडर के आईएएस अधिकारी पांडुरंग कोंडबाराओ पोल (जो वर्तमान में दिल्ली सरकार के भूमि और भवन विभाग में सचिव हैं) और 2009 बैच के एजीएमयूटी कैडर के अधिकारी शाहिद इकबाल चौधरी (जो वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश सरकार में सचिव हैं) द्वारा दायर की गई थी.
क्या मांग की?
इन अधिकारियों ने जनहित याचिका संख्या 9/2012 (‘शेख मोहम्मद शफी व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य’) में खुद को पक्षकार बनाने की मांग की थी. साथ ही, उन्होंने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को यह निर्देश देने की भी मांग की थी कि सीबीआई द्वारा उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगने वाले प्रस्ताव पर फैसला लेने से पहले, उनके पक्ष पर विचार किया जाए.
अधिकारियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सकल भूषण (जिनके साथ अधिवक्ता राहुल शर्मा भी थे) ने दलील दी कि ‘डीम्ड सैंक्शन’ (मान ली गई मंजूरी) के सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि इस मामले में सक्षम अधिकारियों और अदालत द्वारा हर पहलू को ध्यान में रखते हुए अलग से मूल्यांकन किया जाना चाहिए.
खंडपीठ का मांगी गई राहत देने से इनकार
उन्होंने कहा कि अधिकारी केवल इतना चाहते हैं कि मुकदमा चलाने की मंजूरी के प्रस्ताव पर कोई भी फैसला लेने से पहले, उनके द्वारा दिए गए तर्कों या पक्ष पर विचार किया जाए. हालांकि, खंडपीठ ने मांगी गई राहत देने से इनकार कर दिया.
पीठ ने टिप्पणी की, ‘इस अदालत ने अर्जी को इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि वरिष्ठ अधिवक्ता की दलीलों का सार यही था कि जब तक अदालत निर्देश नहीं देगी, तब तक प्रतिवादी (अधिकारी) मामले पर ठीक से विचार नहीं करेंगे. अदालत को यह बात उचित नहीं लगी.’
इसके बाद, भूषण ने अर्जी वापस लेने और DoPT के समक्ष अपने पक्ष को रखने की अनुमति मांगी. इसके बाद, अदालत ने यह कहते हुए आवेदन को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया कि अधिकारियों को कानून के तहत उपलब्ध उचित उपायों को अपनाने के लिए अदालत की अनुमति की आवश्यकता नहीं है.
सुनवाई के दौरान, जनहित याचिका (PIL) दायर करने वालों की ओर से पेश वकील एस.एस. अहमद ने अदालत को बताया कि गृह मंत्रालय (MHA) ने 6 जुलाई, 2026 के अदालत के आदेश का पालन करते हुए एक अद्यतन स्थिति रिपोर्ट (स्टेटस रिपोर्ट) जमा की है.
अहमद के अनुसार, गृह मंत्रालय ने बताया है कि जांच एजेंसी और जम्मू-कश्मीर सरकार के साथ विस्तृत जांच और विचार-विमर्श के बाद, उसने प्रस्ताव पर अपनी राय और टिप्पणियां अंतिम रूप दे दी हैं. साथ ही, निर्धारित प्रक्रिया के तहत अंतिम निर्णय लेने के लिए अपनी राय DoPT (कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग) को भेज दी है.
डिप्टी सॉलिसिटर जनरल से कोर्ट ने मांगी विस्तृत रिपोर्ट
अहमद ने अदालत से DoPT को यह निर्देश देने का आग्रह किया कि वह अपना अंतिम निर्णय अदालत के समक्ष रखे. इस दलील पर ध्यान देते हुए, डिवीजन बेंच ने केंद्र सरकार की ओर से पेश भारत के डिप्टी सॉलिसिटर जनरल विशाल शर्मा को निर्देश दिया कि वे एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करें, जिसमें समय-समय पर अदालत द्वारा दिए गए आदेशों के अनुपालन का पूरा विवरण हो. इस जनहित याचिका पर अगली सुनवाई 23 दिसंबर, 2026 को होगी.