पढ़ाई पर करोड़ों खर्च, लेकिन नौकरी की गारंटी नहीं… क्या कहता है देश में शिक्षा का रिपोर्ट कार्ड?

नई दिल्ली:

शिक्षा में सुधार की मांग को लेकर छात्रों ने जिस तरह का प्रदर्शन किया, वह 14 साल का पहला बड़ा प्रदर्शन था. ये छात्रों की जिद ही थी, जिस कारण धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा. केंद्र सरकार को पेपर लीक से जुड़े मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाना पड़ा. और तो और, दो साल पहले ही आए एंटी-पेपर लीक कानून को फिर संशोधन कर और सख्त करना पड़ा.

भले ही छात्रों की मौजूदा मांगों को मान लिया गया हो लेकिन सवाल अब भी है कि शिक्षा व्यवस्था को किस तरह से मजबूत किया जा सकता है, जो सिर्फ डिग्री ही नहीं, बल्कि नौकरी देने वाली भी बने. क्योंकि, भारतीय युवाओं के लिए अच्छी शिक्षा सिर्फ पढ़ाई-लिखाई के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि नौकरी पाने का जरिया भी है. परिवार अपनी बरसों की बचत, कोचिंग फीस और पाई-पाई इस उम्मीद में लगाते हैं कि डिग्री हासिल करने या कोई परीक्षा पास करने से उनके बच्चों को अच्छी नौकरी मिल जाएगी.

लोकसभा में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी इस मुद्दे को उठाया. उन्होंने कहा कि बच्चे डिप्रेशन से जूझ रहे हैं. परिवारों पर बच्चों को पढ़ाने-लिखाने का दबाव है. लोन लेना पड़ता है और कोई गारंटी नहीं कि बच्चों का भविष्य मजबूत बना पाएंगे, क्योंकि बेरोजगारी चरम पर है.

शिक्षा पर कितना खर्च कर देते हैं भारतीय?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में कहा गया है कि शिक्षा पर GDP का कम से कम 6% खर्च होना चाहिए. हालांकि, सरकारें अभी इतना खर्च नहीं करती हैं. PRS की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में GDP का 4% शिक्षा पर खर्च होता है.

शिक्षा पर सरकारी खर्च इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यहां पढ़ाई भी बहुत महंगी है. वह इसलिए क्योंकि 100 में से 44 छात्र निजी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं. केंद्र सरकार के शिक्षा पर ‘Comprehensive Modular Survey’ के मुताबिक, सरकारी स्कूलों में लगभग 56% छात्र पढ़ाई कर रहे हैं तो बाकी छात्र प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं. प्राइवेट स्कूलों में पढ़ना सरकारी की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा होता है. 

सर्वे के मुताबिक, अगर कोई छात्र सरकारी स्कूल में पढ़ रहा है तो उसकी पढ़ाई पर औसतन 2,863 रुपये खर्च होते हैं. जबकि, प्राइवेट स्कूल में एक छात्र की पढ़ाई का औसत खर्च 25,002 रुपये आता है. यानी, प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले छात्र की सालाना फीस सरकारी की तुलना में लगभग 9 गुना ज्यादा होती है.

सर्वे ये भी बताता है कि देश में हर छात्र का स्कूली पढ़ाई का औसत खर्च 7,111 रुपये होता है. इसमें 2,002 रुपये किताब-स्टेशनरी पर है तो 1,842 रुपये ट्रांसपोर्टेशन पर खर्च होता है. शहरों में तो ये आंकड़ा और भी ज्यादा है. शहरी स्कूल में एक छात्र के सालभर की पढ़ाई का औसत खर्च 15,143 रुपये आता है, जबकि गांवों में 3,979 रुपये का खर्च आता है.

स्कूल के बाद हायर एजुकेशन की पढ़ाई में भी बहुत खर्चा होता है. अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ‘State of Working India 2026’ रिपोर्ट बताती है कि प्रोफेशनल डिग्री हासिल करने में हर साल लाखों रुपये खर्च होते हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, मेडिकल और इंजीनियरिंग की डिग्री में सबसे ज्यादा खर्च होता है. मेडिकल की डिग्री में हर साल औसतन 97,400 रुपये और इंजीनियरिंग की डिग्री में 1.23 लाख रुपये का खर्च आता है. ये आंकड़े भी 2017-18 के हैं. जाहिर है कि अब इसमें और बढ़ोतरी हुई होगी.

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और नौकरी की गारंटी क्या?

भारतीय माता-पिता अपने जीवन की जमा-पूंजी और कर्ज लेकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं. वर्ल्ड बैंक की ‘Education Finance Watch 2024’ रिपोर्ट बताती है कि साउथ एशिया में भारतीय अपने बच्चों की पढ़ाई पर श्रीलंका की तुलना में तीन गुना ज्यादा खर्च करते हैं. 

इतना ही नहीं, यूके में शिक्षा पर परिवारों का खर्च GDP का 1.5% है, जबकि भारत में यही खर्च 2.8% है. ऐसा इसलिए, क्योंकि यूके जैसे देशों में सरकारें शिक्षा पर ज्यादा खर्च करती हैं, जबकि भारत में लोगों को अच्छी शिक्षा के लिए अपनी जेब से पैसा लगाना पड़ता है. 

लेकिन इसके बाद भी भारत में रोजगार की कोई पक्की गारंटी नहीं है. ‘India Skills Report 2026’ के मुताबिक, भारत में रोजगार क्षमता दर 56.35% है. 2025 में यह 54.81% थी. इसका मतलब हुआ कि अगर 100 छात्र डिग्री लेकर निकल रहे हैं तो उनमें से 56 को नौकरी मिल जा रही है लेकिन बाकी 44 बेरोजगार रह जाते हैं.

भारत में रोजगार की सबसे ज्यादा गारंटी MBA करने वालों को मिलती है. MBA करने वाले 72% से ज्यादा युवाओं को नौकरी मिल जाती है. हालांकि, इसमें भी गिरावट आई है. 2025 में MBA कोर्स में रोजगार की क्षमता की दर 78% से ज्यादा थी. इसके बाद B.E. या B.Tech करने वाले 70% को नौकरी मिल जाती है. पॉलिटेक्निक या ITI करने वालों में ये दर 50% से भी कम है.

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बेरोजगार घूम रहे युवा?

भारतीय माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बहुत आशावादी होती हैं. HSBC बैंक की ‘The Value of Education: Higher and higher’ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 87% माता-पिता को लगता है कि अच्छी पढ़ाई-लिखाई से उनके बच्चों का भविष्य उज्वल होगा, जबकि 85% मानते हैं कि पढ़-लिखकर उनके बच्चों को अच्छी नौकरी मिलेगी. 

जबकि, फ्रांस जैसे देश में सिर्फ 42% माता-पिता को ही अपने बच्चों के अच्छे भविष्य और 36% को अच्छी नौकरी मिलने की उम्मीद रहती है. 

लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि पढ़ाई-लिखाई के बाद भी भारतीय युवा बेरोजगार ही घूमते हैं. अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ‘State of Working India 2026’ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 15 से 29 साल के ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा है. 15 से 25 साल के लगभग 40% और 25 से 29 साल के 20% ग्रेजुएट युवा बेरोजगार हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 तक देश में 20 से 29 साल के 6.3 करोड़ ग्रेजुएट युवा थे और इनमें से 1.1 करोड़ बेरोगगार थे. इतना ही नहीं, रिपोर्ट बताती है कि ग्रेजुएट होने वाले लगभग 49% युवाओं को एक साल के भीतर ही कोई नौकरी मिल तो जाती है लेकिन सिर्फ 6.7% को परमानेंट सैलरी और 3.7% को व्हाइट कॉलर जॉब मिलती है. 

सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा है. पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि ग्रेजुएशन या उससे ज्यादा की पढ़ाई करने वाले युवाओं में बेरोजगारी दर 20 फीसदी से ज्यादा है. 

पढ़े-लिखे और ग्रेजुएट युवाओं में सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर के दो बड़े कारण हैं. पहला- ऐसे युवा डिग्री लेने के बाद अच्छी नौकरी का इंतजार करते हैं या कंपीटेटिव एग्जाम की तैयारी में जुट जाते हैं. और दूसरा- पढ़े-लिखे युवा ही जॉब मार्केट में आते हैं और नौकरी तलाशते हैं, इसलिए उनमें बेरोजगारी दर सामने आ जाती है.

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