पुलिस एक ही पक्ष देखती है; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिमांड आदेश रद्द किया, कहा- गिरफ्तारी का आधार बताना जरूरी
Raisina News Desk- अगस्त 06, 2026 10:07 AM IST

प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी और रिमांड प्रक्रिया में संवैधानिक सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए एक आरोपी के खिलाफ पारित रिमांड आदेश को रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए, जो संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत अनिवार्य है. जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग करते समय मूल अधिकारों के महत्व को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. कोर्ट ने आरोपी को बॉन्ड भरने पर रिहा करने का निर्देश दिया और मजिस्ट्रेटों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता राकेश के मामले में पारित रिमांड आदेश को निरस्त कर दिया. अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी के समय उसे यह नहीं बताया गया कि किन ठोस आधारों पर उसकी गिरफ्तारी की जा रही है. पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उसके मौलिक अधिकारों से सीधे जुड़ा विषय है. इसलिए आरोपी को गिरफ्तारी के आधार बताना अनिवार्य है.
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस के लिए यह जरूरी है कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को गिरफ्तारी के आधार स्पष्ट रूप से बताए जाएं. कोर्ट ने टिप्पणी की कि पुलिस पारंपरिक रूप से इस संवैधानिक आवश्यकता को पर्याप्त महत्व नहीं देती और गिरफ्तारी की शक्ति का उपयोग करते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों को अक्सर नजरअंदाज कर देती है.
हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी कई बार किसी तथ्य या आरोप के केवल एक पक्ष को देखते हैं और निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने में विफल रहते हैं. अदालत ने यह भी कहा कि कानून की पर्याप्त समझ के बिना पुलिस प्रशिक्षण अधूरा रह जाता है. इससे पुलिसकर्मियों में कानूनी परिणामों को समझने की क्षमता कमजोर होती है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले न्यायिक आदेशों तथा पुलिस की बार-बार होने वाली चूकों के बीच लगातार टकराव की स्थिति बनती है.
अपने 27 जुलाई के फैसले में अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी के आधार नहीं, बल्कि केवल गिरफ्तारी के कारण लिखे गए हैं. पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के प्रबीर पुरकायस्थ मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि गिरफ्तारी के कारण और गिरफ्तारी के आधार अलग-अलग अवधारणाएं हैं. अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस मामले में गिरफ्तारी मेमो में कोई वास्तविक आधार दर्ज नहीं था.
हाईकोर्ट ने संभल के सेशन जज को निर्देश दिया कि उनके प्रशासनिक नियंत्रण में आने वाले मजिस्ट्रेट पुलिस या न्यायिक रिमांड को मैकेनिकली स्वीकृत न करें. कोर्ट ने कहा कि छपे हुए प्रोफॉर्मा पर रिमांड आदेश पारित करना उचित नहीं है. मजिस्ट्रेटों को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार बताए गए हैं या नहीं.