युवाओं को लुभाना, जातियों को साधना… नितिन नवीन की टीम के सामने 5 चैलेंज
Raisina News Desk- अगस्त 17, 2026 06:43 PM IST

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी नई टीम का ऐलान कर दिया है. इस नई टीम में युवाओं को तवज्जो दी गई है, जातीय समीकरण साधे गए हैं और चुनावों को भी ध्यान में रखा गया है. नितिन नवीन की इस टीम में कुल 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में से 6 महिलाओं को भी जगह दी गई है. स्मृति ईरानी और राम माधव जैसे पुराने नेताओं की भी वापस एंट्री हुई है.
अब नितिन नवीन ने लंबे समय बाद, कई दौर के मंथन के बाद अपनी नई टीम का ऐलान जरूर कर दिया है. लेकिन उनके सामने अभी भी पांच ऐसी चुनौतियां हैं जिससे पार पाना जरूरी है. यहां युवा वोटरों को लुभाने से लेकर आलाकमान और संगठन स्तर पर तालमेल बैठाने तक कई पहलू शामिल हैं-
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बीजेपी को केंद्र की सत्ता में रहते हुए 12 साल हो चुके हैं. इन 12 सालों में किसान आंदोलन से लेकर सीएए कानून के विरोध प्रदर्शन के रूप में कई मौकों पर सरकार ने नाराजगी का सामना किया है. लेकिन 12 सालों में यह पहली बार है जब देश की जेन जी आबादी, जब देश के युवा भी सड़क पर उतरे हैं. इस साल हुए नीट पेपर लीक मामले ने सरकार को कई मुश्किलों में फंसाया है.
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ी भीड़ को एकजुट किया, कई युवा साथ आए और उसी वजह से धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. नेरेटिव सेट किया गया कि देश की जेन जी आबादी के आगे सरकार को झुकना पड़ा. ऐसे में अब नितिन नवीन की नई टीम को इसी जेन जी वोटर, युवा वोटर को फिर अपने पाले में लाना है.
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यहां समझने वाली बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को इंडिया गठबंधन की तुलना में 18 से 25 साल के उम्र के लोगों का ज्यादा वोट मिला था. सीडीएस लोकनीति सर्वे के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को इस एज ग्रुप का 46 फीसदी वोट हासिल हुआ था, वहीं इंडिया गठबंधन को 33 फीसदी वोट मिले थे. अब इसी आबादी को अपने पाले में रखने के लिए नितिन नवीन की नई टीम को अपनी रणनीति को धार देनी पड़ेगी.
भारतीय जनता पार्टी को एक समय अगड़ों की पार्टी माना जाता था, लेकिन समय के साथ उसने ओबीसी वोटबैंक का एक बड़ा हिस्सा भी अपने पाले में लाया है. लेकिन बिहार के बांकीपुर में हुए उपचुनाव ने उसकी इस रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं. नितिन नवीन के ही सबसे मजबूत गढ़ में प्रशांत किशोर ने बड़ी जीत दर्ज कर सभी को चौका दिया.
बिहरा में बीजेपी का सबसे मजबूत आधार ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ जैसी ऊंची जातियों का वोट रहा है. कहने को राज्य में इनकी आबादी करीब 11 फीसदी है, लेकिन बिहार चुनाव में यह हमेशा निर्णायक साबित हुए हैं. एक ट्रेंड तो यहां तक बताता है कि 2009 के बाद से बिहार की 40 में से 17 सीटे ऐसी हैं जहां हमेशा एक ही जाति का उम्मीदवार जीत दर्ज करता है, यहां भी 8 सीटों पर ऊंची जातियों का वर्चस्व रहता है. लेकिन बांकीपुर उपचुनाव ने इसी परंपरा को तोड़ा है, कहा जा रहा है कि इस चुनावी हार का एक कारण यह है कि बीजेपी के ऊंची जातियों के वोटबैंक में कुछ सेंधमारी हुई है.
इसके ऊपर ओबीसी वर्ग से आए सम्राट चौधरी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाना भी कई समीकरणों को बदल गया है. बीजेपी के ही अगड़े समाज के नेता और उनके समर्थक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ओबीसी नेतृत्व के मजबूत होने के बीच उनका राजनीतिक वजन कितना रह गया है? यही नितिन नवीन और उनकी टीम की नई चुनौती है- आखिर इन दो जातियों के बीच में सही तालमेल कैसे बैठाया जाए.
हिंदुत्व की पिच पर हमेशा मजबूत बैटिंग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए राम मंदिर चंदा चोरी का मामला गले की फांस बन गया है. उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, उससे ठीक पहले इस मुद्दे ने एक बड़ी हिंदू आबादी की आस्था को चोट पहुंचाई है. जिस तरह से समाजवादी पार्टी ने भी इस मुद्दे को उठाया है, फिर चाहे बात संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन की हो या फिर सोशल मीडिया पर नेरेटिव सेट करने की, बीजेपी की चुनौतियां बढ़ी हैं.
सपा तो चाहती है कि वो अब बीजेपी के सबसे बड़े हथियार को उसी के खिलाफ इस्तेमाल करे. बीजेपी के लिए राम मंदिर सिर्फ आस्था का विषय नहीं है बल्कि इसके जरिए उसने अपनी हिंदुत्व की राजनीति को भी काफी मजबूत किया है. इसी वजह से चंदा चोरी मामले ने एक तरफ विपक्ष को नया मौका दिया है तो वहीं बीजेपी को कुछ हद तक बैकफुट पर लाया है. अब इस नेरेटिव को कैसे बदला जाए, एक बार फिर हिंदू वोटरों को साधा जाए, नितिन नवीन और उनकी टीम के लिए यह चुनौती का सबब रहेगा.
दक्षिण भारत में बीजेपी को अभी भी अपना आधार मजबूत करना है. अगर कर्नाटक, तेलंगाना को छोड़ दिया जाए तो बीजेपी को अभी जूझना पड़ता है. तमाम प्रयासों के बाद भी केरल और तमिलनाडु में भी बीजेपी को वो सफलता नहीं मिल पाई है जिसकी उम्मीद वो लगाए बैठी है. तमिलनाडु में तो द्रविड आंदोलन, भाषा और सामाजिक न्याय की राजनीति ने बीजेपी की हिंदुत्व विचारधारा को वहां फलने-फूलने नहीं दिया है. इसके ऊपर अब विजय फैक्टर ने भी जमीन पर कई समीकरणों को बदला है. केरल में भी वामपंथ और कांग्रेस के प्रभुत्व के बीच बीजेपी कहीं फंस सी गई है, उसका वोट शेयर जरूर बढ़ा है, लेकिन वो सीटों में तब्दील नहीं हो पा रहा.
ऐसे में नितिन नवीन का फोकस दक्षिण पर भी रहने वाला है. पश्चिम बंगाल में तो जरूर पहली बार बीजेपी की सरकार बन चुकी है, लेकिन अब इस विस्तार को दक्षिण भारत लेकर जाना है. जानकार मानते हैं कि नितिन नवीन की नई टीम तत्कालिक चुनावी लाभ की बजाय दीर्घकालिक संगठन निर्माण पर ध्यान देने वाली है.
नितिन नवीन और उनकी टीम का सबसे बड़ा लक्ष्य 2029 का लोकसभा चुनाव रहने वाला है. कई राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी तो करनी ही है, लेकिन बड़ा लक्ष्य 2029 का लोकसभा चुनाव है. पिछले लोकसभा चुनाव में जिस तरह से बीजेपी अपने दम पर बहुमत से दूर रह गई थी, उसे देखते हुए नितिन नवीन को और ठोस रणनीति पर काम करना होगा. फिर चाहे बात संगठन को मजबूत करना हो, पार्टी के सामाजिक और क्षेत्रीय आधार को बढ़ाना हो.
इसके अलावा किस तरह से उनकी टीम एनडीए सहयोगियों को साथ लेकर चलेगी, उनकी प्राथमिकताओं को ध्यान में रखेगी, इस पर भी काफी कुछ निर्भर रहने वाला है.