7 जून 1893… वो तारीख जब पोरबंदर के मोहनदास 'गांधीगिरी' की राह पर चल पड़े

नई दिल्ली:

वकालत की पढ़ाई पूरी करने और बैरिस्टर बनने के बाद मोहनदास करमचंद गांधी जब किसी अच्छे मुकदमे की तलाश कर रहे थे, तभी उनके बड़े भाई के पास मेमन फर्म का संदेश आया. ये फर्म पोरबंदर के ही एक कारोबारी अब्दुल्ला सेठ की थी, जिनका दक्षिण अफ्रीका में एक मुकदमा चल रहा था. इस मुकदमे को लड़ने के लिए उन्होंने मोहनदास करमचंद गांधी को एक साल के दक्षिण अफ्रीका बुलाया. महात्मा गांधी अपनी आत्मकथा में बताते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में मुकदमा लड़ने जाने के लिए उन्हें आने-जाने, रहने-खाने के खर्च के अलावा 105 पाउंड की तनख्वाह का वादा किया.

इसमें आगे वह लिखते हैं, ‘इसे वकालत नहीं कह सकते. यह नौकरी थी. पर मुझे तो जैसे भी बने हिंदुस्तान छोड़ना था. नया देश देखने को मिलेगा और अनुभव मिलेगा सो अलग. भाई को 105 पाउंड भेजूंगा तो घर का खर्च चलाने में कुछ मदद होगी. यह सोचकर मैंने वेतन के बारे में बिना कुछ झिक-झिक किए सेठ अब्दुल करीम का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और दक्षिण अफ्रीका जाने के लिए तैयार हो गया.’

फिर आई 1893 की 7 जून

मोहनदास करमचंद गांधी 24 मई 1893 को दक्षिण अफ्रीका पहुंचे. यहां पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद मुकदमे के सिलसिले में उन्हें प्रिटोरिया जाना था. 7 जून 1893 को प्रिटोरिया जाने वाली ट्रेन में गांधीजी के लिए अब्दुल्ला सेठ ने फर्स्ट क्लास का टिकट कटाया. 

ट्रेन के सफर के बारे में आत्मकथा में गांधीजी लिखते हैं, ‘एक यात्री आया. उसे मेरी तरफ देखा. मुझे अलग पाकर वह परेशान हुआ, बाहर निकला और एक-दो अफसरों को लेकर आया. किसी ने मुझे कुछ न कहा. आखिर एक अफसर आया. उसने कहा- ‘इधर आओ… तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना है.”

गांधीजी लिखते हैं, ‘मैंने कहा- मेरे पास पहले दर्जे का टिकट है. उसने जवाब दिया- इसकी कोई बात नहीं. मैं तुमसे कहता हूं कि तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना है. फिर मैंने कहा कि मझे इस डिब्बे में डरबन से बैठाया गया है और मैं इसी में जाने का इरादा रखता हूं. अफसर ने कहा- यह नहीं हो सकता. तुम्हें उतरना पड़ेगा और न उतरे तो सिपाही उतारेगा. मैंने कहा- तो फिर सिपाही ही उतारे, मैं खुद तो नहीं उतरूंगा.’

गांधीजी लिखते हैं कि सिपाही आया और उसने उनका हाथ पकड़ा और धक्का देकर नीचे उतार दिया. सामान भी उतार दिया. उन्हें पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर उतार दिया गया था, जहां के वेटिंग रूम में ही उन्होंने रात गुजारी थी. 

Photo Credit: mkgandhi.org

यह भी पढ़ेंः 23 जून 1757… कहानी उस दिन की, जब अपनों की गद्दारी से गुलामी की जंजीर में जकड़ गया भारत

‘लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए’

7 जून 1893 की उस सर्द रात में गांधीजी स्टेशन के वेटिंग रूम में ही बैठे रहे. उनका ओवरकोट उनके सामान में था, जिसे रेलवे वालों ने कहीं रख दिया था. वह कंपकंपाते रहे लेकिन ओवरकोट नहीं मांगा.

उस रात ट्रेन में जो हुआ था, उसने गांधीजी को काफी बदल दिया. आत्मकथा में वह लिखते हैं, ‘मैंने अपने धर्म का विचार किया- या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए, नहीं तो जो अपमान हों, उन्हें सहकर प्रिटोरिया पहुंचना चाहिए और मुकदमा खत्म करके देश लौट जाना चाहिए. मुकदमा अधूरा छोड़कर भागना तो नामर्दी होगी. मुझे जो सहना पड़ा, वह तो ऊपरी कष्ट है. यह गहराई तक पैठे हुए महारोग का लक्षण है और वह है- रंग-द्वेष. अगर मुझमें इस रोग को मिटाने की शक्ति हो तो उस शक्ति का उपयोग मुझे करना चाहिए. ऐसा करते हुए खुद को जो कष्ट सहने पड़ें, वे सहने चाहिए और उनका विरोध रंग-द्वेष को मिटाने की दृष्टि से ही करना चाहिए.’

इसके बाद गांधीजी दूसरी ट्रेन में बैठकर प्रिटोरिया पहुंचे. अगले दिन उन्होंने जनरल मैनेजर को लंबा खत लिखा. अब्दुल्ला सेठ को भी इसकी खबर दी.

इस अपमान ने उन्हें दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने जल्द ही डरबन में भारतीयों को एकजुट किया और 22 मई 1894 को भारतीयों के वोटिंग अधिकारों के मुद्दे पर काम करने के लिए ‘नेटाल इंडियन कांग्रेस’ का गठन किया. तीन साल रहने और संघर्ष करने के बाद 1896 में वह भारत लौट आए.

लेकिन उसी साल नेटाल इंडियन कांग्रेस के अनुरोध पर उन्हें डरबन आना पड़ा. इस बार वह अपने परिवार के साथ आए. जब उनका जहाज डरबन बंदरगाह पर पहुंचा तो गोरों ने उनका जबरदस्त विरोध किया और उन्हें उतरने नहीं दिया. लगभग तीन हफ्ते तक उनका जहाज वहीं रहा और जब उन्हें उतरने की इजाजत मिली तो भीड़ ने उन पर हमला कर दिया और बुरी तरह पीटा.

Photo Credit: mkgandhi.org

दक्षिण अफ्रीका ने बदल दिया

दक्षिण अफ्रीका जाने से पहले गांधीजी जैसे थे, वहां पहुंचने के बाद वैसे बिल्कुल नहीं रहे. रंग-द्वेष के खिलाफ और भारतीयों के अधिकारों की लड़ाई ने उन्हें बहुत बदल दिया था. आत्मकथा में गांधीजी लिखते हैं- ‘मैं कह सकता हूं कि मेरा यह शर्मिला स्वभाव दक्षिण अफ्रीका पहुंचने पर ही दूर हुआ.’दक्षिण अफ्रीका में ही उन्होंने सत्याग्रह जैसे सिद्धांतों के प्रयोग शुरू किए, जो उनके अहिंसा के विचार का हिस्सा थे. इसी दौरान उन्होंने ब्रह्मचर्य का प्रण भी लिया. 

एक पत्नी व्रत का तो विवाह के समय से ही मेरे हृदय में स्थान था. पत्नी के प्रति वफादारी मेरे सत्यव्रत का अंग था. पर अपनी स्त्री के साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, इसका स्पष्ट बोध मुझे दक्षिण अफ्रीका में ही हुआ.

1904 में गांधीजी ने डरबन में फीनिक्स सेटलमेंट की स्थापना की. 1910 में उन्होंने जोहान्सबर्ग के बाहरी इलाके में टॉलस्टॉय फार्म की स्थापना की. 

साल 1915 में गांधीजी भारत वापस आ गए थे. 1893 से लेकर 1915 तक उन्होंने 21 साल दक्षिण अफ्रीका में बिताए थे. हालांकि, बीच में कभी-कभी वह भारत भी लौटे. लेकिन 1915 के बाद से वह भारत में ही आकर बस गए. दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा बना दिया था. भारत आने के बाद उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी. 

यह भी पढ़ेंः नशे में कैसे बर्बाद हो गया था चीनी साम्राज्य? ‘अफीम युद्ध’ की वो कहानी जिसने चीन को बना दिया था ‘गुलाम’


Prev Post
Next Post