मजदूरों के अधिकार कमजोर…VB-G RAM G के शिकायत निवारण के नए नियमों पर कांग्रेस का हमला

मजदूरों के अधिकार कमजोर…VB-G RAM G के शिकायत निवारण के नए नियमों पर कांग्रेस का हमला

भारत की सबसे महत्वपूर्ण अधिकार-आधारित कानूनों में से एक को महज प्रशासनिक योजना में बदलने की कड़ी में, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) ने शिकायत निवारण संबंधी नए नियम अधिसूचित कर दिए हैं. इस पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि आज जब लाखों मज़दूर नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कर पा रहे, आधार आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS) की वजह से मजदूरी नहीं मिल पा रही, तो शिकायतें भी अब जवाबदेही के बिना डिजिटल दायरे में डाल दी गई हैं.

उन्होंने कहा कि ये नियम मजदूरों और आम लोगों को और अधिक शक्तिहीन बनाते हैं तथा उनके तथाकथित अधिकार को एक और जुमला बना देते हैं. जहां सरकार अधिनियम के मूल प्रावधानों के उल्लंघन का तुरंत निवारण करने का इरादा दिखा सकती थी, वहाँ उसने उन रास्तों को ही खत्म कर दिया है.

2 नवंबर 2026 को अधिसूचित अंतिम VB-G RAM G शिकायत निवारण नियम, मई 2026 में जारी मसौदा नियमों की कई महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं को काफी हद तक कमजोर कर देते हैं. मुख्य बदलाव इस प्रकार हैं:

  1. निर्धारित समय सीमा में शिकायत निस्तारण न करने पर दंड का प्रावधान हटाया गया. मसौदे में साफ कहा गया था कि सात कार्यदिवस में शिकायत निपटाने में विफलता अधिनियम का उल्लंघन मानी जाएगी और धारा 27 के तहत कार्रवाई होगी. अंतिम नियमों से यह प्रावधान हटा दिया गया है. समयसीमाएं तो हैं, लेकिन अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने का स्पष्ट प्रावधान अब नहीं है.
  2. वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की बाध्यता हटाई गई. मसौदे में जिला कार्यक्रम समन्वयक (DPC) को कानूनी सलाह लेकर FIR दर्ज कराने और आवश्यक कार्यवाही सुनिश्चित करने का निर्देश था। यह पूरा प्रावधान हटा दिया गया है.
  3. निर्वाचित पंचायती राज संस्थाओं की अनिवार्य निगरानी समाप्त. शिकायतों पर की गई कार्रवाई को मध्यवर्ती और जिला पंचायत बैठकों में समीक्षा के लिए रखने का प्रावधान मसौदे में था, जो अब नहीं है. इससे लोकतांत्रिक निगरानी कमजोर हुई है.
  4. अनिवार्य साप्ताहिक शिकायत सुनवाई दिवस हटाया गया. हर स्तर पर अधिकारियों को सप्ताह में कम-से-कम एक निर्धारित दिन शिकायतें सुनने के लिए उपलब्ध रहने का नियम अब नहीं है.
  5. समर्पित शिकायत निवारण डेस्क की व्यवस्था समाप्त. ब्लॉक और जिला स्तर पर शिकायत दर्ज कराने और जानकारी देने वाले डेस्क का प्रावधान हटा दिया गया है.
  6. शिकायतों की भौतिक जांच की अनिवार्यता कमजोर की गई. मसौदे में स्थल सत्यापन या निरीक्षण की स्पष्ट आवश्यकता थी. अंतिम नियमों में आधिकारिक रिकॉर्ड और अन्य जानकारी की जाँच की अनुमति है, लेकिन भौतिक सत्यापन की स्पष्ट बाध्यता नहीं. यह खासकर मस्टर रोल फर्जीवाड़े, धोखाधड़ी भुगतानों या रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के अंतर वाली शिकायतों के लिए समस्याजनक है.
  7. अनिवार्य त्रैमासिक रिपोर्टिंग हटाई गई. DPC द्वारा राज्य सरकार को शिकायतों की संख्या, प्रकृति, निपटान और लंबित मामलों की तिमाही रिपोर्ट देने का प्रावधान अब नहीं है.
  8. स्वचालित एस्केलेशन कमजोर किया गया. 15 दिन में अनसुलझी शिकायतों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अगले उच्च प्राधिकारी तक स्वतः भेजने का स्पष्ट प्रावधान हटा दिया गया है, हालांकि 15 दिन बाद अनिवार्य एस्केलेशन का उल्लेख है.
  9. राज्य-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र की स्पष्ट अनिवार्यता समाप्त. मसौदे में ग्राम पंचायत, ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर तंत्र बनाने का निर्देश था. अंतिम नियमों में केवल ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर का स्पष्ट उल्लेख है.
  10. अपील संबंधी विस्तृत प्रावधान नियमों से हटाए गए. मसौदे में अपील पदानुक्रम, 45 दिन में अपील दायर करने और 30 दिन में निपटान की समयसीमा थी. अब इसे अधिनियम की अनुसूची-I का हवाला देकर बदल दिया गया है.
  11. राज्य-स्तरीय डिजिटल शिकायत प्रणालियों में लचीलापन घटाया गया. अब केंद्रीय सरकार द्वारा निर्दिष्ट डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अधिक जोर है. पर्याप्त वित्तीय आवंटन के बिना गारंटियों को लागू करने का पूरा बोझ राज्यों पर डाल दिया गया है और दैनिक उल्लंघनों के लिए लोगों के पास प्रभावी निवारण का कोई रास्ता नहीं बचा है. डिजिटल शासन के मुखौटे में ये नियम साफ दिखाते हैं कि अधिकार कागजों या क्लाउड तक ही सीमित रहेंगे.
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