मॉनसून के दस्तक देने के बाद दिल्ली-एनसीआर में लगातार बारिश हो रही है. बारिश के बाद जलभराव और ट्रैफिक जाम की खबरें भी सामने आ रही हैं. सबसे बुरा हाल गुरुग्राम शहर का है. इस सीजन की पहली ही तेज बारिश में पूरे सरकारी सिस्टम की पोल खुल गई. मंगलवार को कुछ ही घंटे की बारिश में गुरुग्राम की सड़कें तालाब बन गईं, कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया और गाड़ियां गड्ढों में फंस गईं. आज यानी बुधवार को भी यही हाल रहा. बारिश के बीच जगह-जगह जाम लग गया. गुरुग्राम पुलिस ने कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम की एडवाइजरी जारी की है. लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. हर साल बारिश के मौसम में गुरुग्राम शहर पानी-पानी हो जाता है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर 9 महीने फर्राटा भरने वाला गुरुग्राम तीन महीने तालाब की तरह क्यों ठहर जाता है? आइए समझते हैं.
गुरुग्राम में हर साल जल जमाव होने की सबसे बड़ी वजह शहर की भौगोलिक बनावट है. गुरुग्राम अरावली की पहाड़ियां के बीच में है. गुरुग्राम के पूर्व और दक्षिण में अरावली पर्वत श्रंखला है. बारिश का सारा पानी इन पहाड़ियों से तेजी से नीचे ढलान की ओर यानी शहर की तरफ आता है. यह लो-लाइंग एरिया यानी कम ऊंचाई वाला इलाका है. इसकी बनावट कटोरे जैसी है. यह पहाड़ियों के मुकाबले काफी नीचे है, जिससे पानी यहां आकर जमा हो जाता है.

गुरुग्राम में बारिश के बाद जलभराव में फंसी कार
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गुरुग्राम के पश्चिम में प्राकृतिक रूप से नजफगढ़ ड्रेन है. यह ड्रेन ही पूरे शहर का सबसे बड़ा प्राकृतिक जल निकासी पॉइंट है. वहीं बादशाहपुर ड्रेन से भी जल निकासी होती है. लेकिन बढ़ते शहरीकरण और अवैध निर्माण की वजह से इन ड्रेन पर कई तरह के निर्माण हो चुके हैं. इसकी वजह से भारी बारिश के बाद यहां से जल निकासी ठीक से नहीं हो पाती और शहर में जलभराव की समस्या हो जाती है. NGT ने कई सुनवाई में बादशाहपुर ड्रेन और अन्य प्राकृतिक नालों पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण को लेकर हरियाणा सरकार को फटकार भी लगाई है.
CSE की सैटेलाइट इमेजरी आधारित स्टडी बताती है कि पिछले तीन दशकों में गुरुग्राम ने अपने 80% से ज्यादा प्राकृतिक जल निकायों को खो दिया है, जिससे कंक्रीट का ऐसा जाल बन गया है जो पानी को जमीन के भीतर सोखने नहीं देता.

बारिश के बीच सड़क किनारे गड्ढे में फंसी स्कूल बस
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गुरुग्राम में बहुत तेजी से निर्माण कार्य और शहरीकरण हुआ. यहां तमाम कॉर्पोरेट दफ्तर, मॉल और बड़ी-बड़ी बिल्डिंग हैं. लेकिन आज की आबादी और निर्माण के हिसाब से शहर में बारिश के पानी की निकासी यानी स्टॉर्म वॉटर और सीवरेज का इंतजाम नहीं है. जब बारिश के दौरान सीवेज सिस्टम पर दबाव आता है, तो यह फेल हो जाता है और सड़कों पर जलभराव की समस्या देखने को मिलती है. हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम के ड्रेनेज सिस्टम को सुधारने के लिए IIT दिल्ली को मास्टर प्लान तैयार करने का जिम्मा सौंपा था. IIT दिल्ली की रिपोर्ट में बताया गया कि शहर का ड्रेनेज सिस्टम 20-30 साल पुराना है, जो केवल 15-20 मिमी प्रति घंटे की बारिश को झेल सकता है, जबकि मॉनसून में यहां इससे कहीं अधिक बारिश होती है.
गुरुग्राम की कई प्रमुख सड़कों और अंडरपासों का डिजाइन ऐसा है कि बारिश का पानी स्वाभाविक रूप से बहने के बजाय एक ही जगह जमा हो जाता है. इसमें इफको चौक, राजीव चौक, हीरो होंडा चौक जैसे भीड़भाड़ वाले इलाके भी शामिल हैं, जहां हर साल जलभराव की खबरें आती हैं. GMDA हर साल 30 से 40 ऐसे ‘हॉटस्पॉट्स’ की पहचान करता है.

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गुरुग्राम के जलभराव की एक बड़ी वजह अथॉरिटी के बीच तालमेल की कमी और सफाई और रखरखाव में ढिलाई भी है. CAG ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में कई बार मॉनसून से पहले नालों की सफाई के कामों में देरी को दर्ज किया है, CAG रिपोर्ट के अनुसार, कई बार नालों की गाद निकालने के ठेके मॉनसून शुरू होने के ठीक पहले या मॉनसून के दौरान दिए गए, जिससे उनका कोई फायदा नहीं हुआ.
वहीं गुरुग्राम की सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता यह है कि यहां कोई एक अथॉरिटी पूरे शहर के लिए जिम्मेदार नहीं है. GMDA, MCG, NHAI और DLF/Ansal जैसे निजी बिल्डर्स अक्सर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टालते हैं. जवाबदेही की कमी के कारण समस्या का स्थाई समाधान नहीं हो पाता.
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