रूस का तेल या अमेरिकी बाजार? भारत के सामने खड़ा हुआ 100% टैरिफ वाला मुश्किल सवाल

रायसीना न्यूज़ का सामान्य समाचार ग्राफिक

रूस से सस्ता तेल खरीदकर अरबों डॉलर बचा रहे भारत के लिए अमेरिका का नया बिल बड़ी चिंता लेकर आया है. दरअसल, अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने एक ऐसा कानून पास किया है, जो लागू होने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठाने और रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देगा.सीधे शब्दों में कहें तो यदि भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात पर भारी टैरिफ का खतरा खड़ा हो सकता है. ऐसे समय में जब भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बातचीत अहम दौर में है, यह बिल नई मुश्किलें पैदा कर सकता है.

सबसे ज्यादा खतरे में भारत और चीन क्यों?

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के तेल निर्यात को जिंदा रखने में सबसे बड़ी भूमिका चीन और भारत ने निभाई है. CREA के आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 50% और भारत की 37% रही. यानी रूस के हर 10 में से लगभग 9 बैरल तेल चीन और भारत ने खरीदे.यही वजह है कि अमेरिकी सांसदों और नीति निर्माताओं का निशाना इन दोनों देशों पर है.

रूस पर भारत की निर्भरता कितनी बढ़ चुकी है?

आंकड़े बताते हैं कि भारत के लिए रूस अब सिर्फ एक सप्लायर नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का अहम स्तंभ बन चुका है.वित्त वर्ष 2026 में भारत ने कुल 134.7 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया. इसमें से 40.8 अरब डॉलर का तेल अकेले रूस से आया. यानी भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 30.3% रही.जुलाई 2026 में स्थिति और भी असाधारण रही. उस महीने भारत ने जितना तेल आयात किया, उसमें आधे से ज्यादा हिस्सा रूस का था. रूस की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा रही, जबकि यूएई (10.8%), सऊदी अरब (9.6%), वेनेजुएला (6.3%), ब्राजील (5.5%), ओमान (5.3%) और अमेरिका (2.9%) काफी पीछे रहे.दूसरे शब्दों में कहें तो रूस अकेले उतना तेल भारत को भेज रहा था जितना ये छह देश मिलकर भी नहीं भेज पा रहे थे.

चार साल में कैसे बदल गया पूरा समीकरण?

2022 से पहले रूस भारत के लिए बहुत बड़ा तेल सप्लायर नहीं था. भारत वहां से औसतन सिर्फ 1 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) तेल खरीदता था.लेकिन पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने भारी डिस्काउंट पर तेल बेचना शुरू किया और भारत ने इसका फायदा उठाया.

  • 2022 में आयात बढ़कर करीब 7 लाख bpd पहुंच गया.
  • 2023 में यह 18 लाख bpd के आसपास पहुंच गया.
  • 2024-25 में रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा.
  • जुलाई 2026 में आयात रिकॉर्ड 28 लाख bpd तक पहुंच गया, जो कुल आयात का लगभग 55% था.

यानी जिस रूस की भारतीय तेल बाजार में कभी हिस्सेदारी बेहद ही कम थी, वह अब भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा साझेदार बन चुका है.

भारत के लिए रूसी तेल छोड़ना इतना आसान नहीं

अमेरिका की चेतावनी के बाद सवाल उठता है कि क्या भारत आसानी से किसी और देश से तेल खरीद सकता है? एक्सपर्ट्स का विशेषज्ञों का जवाब है, नहीं. CEEW के मुताबिक भारत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल सिर्फ छह देशों से आता है. अलग-अलग क्रूड ग्रेड पर काम करने के लिए रिफाइनरियों में तकनीकी बदलाव करने पड़ते हैं. यह प्रक्रिया महंगी भी होती है और समय लेने वाली भी. यही नहीं, CEEW का अनुमान है कि 2022 के बाद रूस से सस्ता तेल खरीदकर भारत करीब 12.6 अरब डॉलर बचा चुका है. इसलिए रूस से दूरी बनाना केवल कूटनीतिक फैसला नहीं बल्कि आर्थिक चुनौती भी होगी.

अमेरिका का असली दबाव कहां पड़ेगा?

अटलांटिक काउंसिल के सीनियर एक्सपर्ट माइकल कुगेलमैन का मानना है कि अमेरिका भारत में आने वाले रूसी तेल पर सीधे टैक्स नहीं लगाएगा. उसकी ताकत भारत के अमेरिका जाने वाले निर्यात पर टैरिफ बढ़ाने में है. दूसरे शब्दों में कहें तो निशाना तेल नहीं, बल्कि भारतीय निर्यातक हो सकते हैं. अगर 100% तक टैरिफ लगाया गया तो इसका असर इंजीनियरिंग उत्पाद, टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो पार्ट्स और अन्य निर्यात क्षेत्रों पर पड़ सकता है. इससे व्यापार संतुलन, विदेशी मुद्रा आय और रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है.

भारत के सामने दोहरी चुनौती



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