CEC के खिलाफ मेगा रैली: रामलीला मैदान से सहयोगियों को क्या संदेश देना चाहती है कांग्रेस?  

CEC के खिलाफ मेगा रैली: रामलीला मैदान से सहयोगियों को क्या संदेश देना चाहती है कांग्रेस?  

1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की बड़ी रैली होने जा रही है. आधिकारिक तौर पर यह रैली मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और लोकतांत्रिक मुद्दों को उठाने के लिए आयोजित की जा रही है. लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे विपक्ष के भीतर शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देखा जा रहा है. सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व इस रैली को सफल बनाने के लिए लगातार बैठकें कर रहा है.

राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और पार्टी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल समेत वरिष्ठ नेताओं ने इसकी रणनीति पर कई दौर की चर्चा की है. राज्य इकाइयों को अधिक से अधिक लोगों को दिल्ली लाने के निर्देश दिए गए हैं. बताया जा रहा है कि विभिन्न राज्यों और लोकसभा क्षेत्रों में पर्यवेक्षक भी नियुक्त किए गए हैं ताकि भीड़ जुटाने की तैयारी की निगरानी की जा सके.

सहयोगियों को संदेश देने की कोशिश

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस इस रैली के जरिए सिर्फ बीजेपी को ही नहीं बल्कि अपने सहयोगी दलों को भी संदेश देना चाहती है. पार्टी यह दिखाने की कोशिश में है कि विपक्षी गठबंधन में उसकी संगठनात्मक पकड़ और जनाधार लगातार मजबूत हो रहा है.

कांग्रेस के भीतर भी यह धारणा मजबूत होती दिखाई दे रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति का नेतृत्व करने की क्षमता राहुल गांधी और कांग्रेस के पास है. ऐसे में यह रैली उस दावे को मजबूती देने का मंच बन सकती है.

यूपी, पंजाब और उत्तराखंड पर खास फोकस

रैली की तैयारियों में उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इन राज्यों में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं. सूत्रों के मुताबिक प्रियंका गांधी ने हाल की बैठकों में उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को रैली में लाने पर जोर दिया है.

यूपी कांग्रेस के नेताओं को बड़ी भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. पार्टी मानती है कि इससे न केवल रैली सफल होगी बल्कि आगामी चुनावों से पहले संगठन की ताकत का भी प्रदर्शन होगा.

सपा को भी राजनीतिक संदेश?

रैली के राजनीतिक मायनों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश में है. माना जा रहा है कि कांग्रेस इस मंच के जरिए समाजवादी पार्टी को भी अपना जनाधार और कार्यकर्ता शक्ति दिखाना चाहती है. दोनों दलों के बीच भविष्य में सीट साझेदारी को लेकर बातचीत होनी है और ऐसे में शक्ति प्रदर्शन का महत्व बढ़ जाता है. राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि सीट बंटवारे पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. ऐसे माहौल में कांग्रेस अपने बढ़ते प्रभाव का संकेत देना चाहती है.

21 दलों के शामिल होने की संभावना

रैली में इंडिया गठबंधन के लगभग 21 दलों के शामिल होने की उम्मीद है. राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, डी. राजा, दीपांकर भट्टाचार्य और उद्धव ठाकरे समेत कई बड़े नेताओं की मौजूदगी संभावित मानी जा रही है.

भीड़ से तय होगी राजनीतिक चर्चा

दिल्ली की इस रैली में मुद्दों के साथ-साथ भीड़ भी चर्चा का बड़ा विषय होगी. विपक्षी दलों के बीच यह देखने की उत्सुकता रहेगी कि कौन सी पार्टी सबसे ज्यादा समर्थकों को मैदान में उतारती है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि रैली के बाद सिर्फ भाषण नहीं बल्कि भीड़ का आकार भी विपक्ष की अंदरूनी राजनीति में संदेश देने का काम करेगा.



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