भारत की खेती में आएगी नई क्रांति? दालों और तिलहनों को मिला जीन एडिटिंग का बड़ा सहारा

भारत की खाद्य सुरक्षा, जलवायु अनुकूल खेती और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है. हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) को अपनी प्रमुख फसलों में CRISPR-Cas9 जीन एडिटिंग तकनीक के इस्तेमाल का कानूनी अधिकार मिल गया है.

यह विकास भारत के लिए खास महत्व रखता है, क्योंकि देश अब भी खाद्य तेलों के बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है और समय-समय पर दालों की कमी का सामना करता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि जीन एडिटिंग तकनीक फसलों की पैदावार बढ़ाने, उन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशील बनाने और फसल नुकसान कम करने में मदद कर सकती है.

क्या है यह नया समझौता?

ICRISAT को यह अधिकार Corteva और Broad Institute के साथ हुए लाइसेंसिंग समझौते के तहत मिला है. यह समझौता सिर्फ प्रयोगशाला अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक खोज से लेकर किसानों तक नई किस्में पहुंचाने और उनके व्यावसायिक उपयोग का रास्ता भी खोलता है.

यह तकनीक ICRISAT को चना, अरहर, मूंगफली, ज्वार, बाजरा और अन्य मोटे अनाज जैसी फसलों में जीन एडिटिंग का इस्तेमाल करने की अनुमति देती है. ये सभी फसलें भारत की पोषण सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.

भारत के लिए क्यों अहम है यह कदम?

भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है. इसके बावजूद देश को कई बार दालों और खाद्य तेलों की कमी का सामना करना पड़ता है. हर साल बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करना पड़ता है.

ऐसे में यदि जीन एडिटिंग के जरिए पैदावार बढ़ती है, सूखा और गर्मी सहने वाली किस्में विकसित होती हैं, कीट और बीमारियों से बचाव बेहतर होता है और फसल नुकसान कम होता है, तो इसका सीधा फायदा किसानों, उपभोक्ताओं और देश की खाद्य सुरक्षा को मिलेगा.

क्या है जीन एडिटिंग?

जीन एडिटिंग को आम भाषा में समझें तो यह किसी दस्तावेज में टाइपिंग की गलती सुधारने जैसा है. वैज्ञानिक पौधे के अपने DNA में बहुत छोटे और खास बदलाव करते हैं, लेकिन उसमें किसी दूसरे जीव का जीन शामिल नहीं करते. इसलिए इसे पारंपरिक जेनेटिक मॉडिफिकेशन (GM) से अलग माना जाता है.

CRISPR-Cas9 तकनीक की मदद से वैज्ञानिक अवांछित गुणों को हटा सकते हैं, सूखा और गर्मी सहन करने की क्षमता बढ़ा सकते हैं, पैदावार बढ़ा सकते हैं और पौधों की गुणवत्ता सुधार सकते हैं. क्योंकि इसमें बाहरी DNA नहीं डाला जाता, इसलिए इसे पारंपरिक GM फसलों की तुलना में अधिक स्वीकार्य माना जाता है.

क्या कह रहे एक्सपर्ट्स?

ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने इस समझौते को एक बड़ा मील का पत्थर बताया. उन्होंने कहा कि ICRISAT के मजबूत ब्रीडिंग कार्यक्रम, राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थानों के साथ साझेदारी और Corteva की जीन एडिटिंग विशेषज्ञता मिलकर ऐसी फसलों के विकास को तेज करेगी जो खाद्य सुरक्षा मजबूत करेंगी, किसानों की आय बढ़ाएंगी और एशिया व अफ्रीका की कृषि को अधिक टिकाऊ बनाएंगी.

भारत की जीन एडिटिंग यात्रा

इस घोषणा का समय भी महत्वपूर्ण है. मई 2025 में भारत ने दुनिया की पहली जीनोम-एडिटेड चावल की किस्में विकसित की थीं. इनमें कमला और पूसा DST राइस-1 शामिल हैं. इन किस्मों को अधिक पैदावार, कम पानी की जरूरत और बेहतर जलवायु सहनशीलता के लिए विकसित किया गया था.

हालांकि, जीन एडिटिंग तकनीक के बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) और व्यावसायिक उपयोग से जुड़े सवाल अब भी चर्चा का विषय हैं. CRISPR-Cas9 दुनिया भर में पेटेंट और लाइसेंस व्यवस्था के तहत संचालित होती है. यही वजह है कि ICRISAT को कानूनी तौर पर यह अधिकार मिलना काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

किसानों को क्या फायदा होगा?

ICRISAT का मानना है कि नई तकनीक से ऐसी किस्में तेजी से विकसित की जा सकेंगी जो सूखे और गर्मी को बेहतर झेल सकें, कीटों और बीमारियों का मुकाबला कर सकें, अधिक उत्पादन दें,
पोषण की दृष्टि से बेहतर हों और जिनमें किसी दूसरी प्रजाति का DNA शामिल न हो.

जलवायु परिवर्तन के दौर में यह तकनीक और भी अहम हो जाती है. आज किसान अनियमित मानसून, बढ़ते तापमान, जल संकट और नए कीटों की चुनौती से जूझ रहे हैं. जहां पारंपरिक ब्रीडिंग में नई किस्म विकसित करने में कई साल लग जाते हैं, वहीं जीन एडिटिंग इस प्रक्रिया को काफी तेज कर सकती है.

क्या ICAR को भी मिलेगा ऐसा अधिकार?

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ा सवाल बना हुआ है कि क्या भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अन्य भारतीय संस्थानों को भी भविष्य में इसी तरह के अधिकार मिल पाएंगे? फिलहाल इसका जवाब स्पष्ट नहीं है. लेकिन ICRISAT की सफलता ने यह दिखा दिया है कि सही लाइसेंसिंग व्यवस्था के जरिए जीन एडिटिंग तकनीक का उपयोग फसल सुधार के लिए किया जा सकता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक सफल रहती है तो इसका लाभ केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा. इससे कई फायदे देखने को मिल सकते हैं. इसमें दालों का उत्पादन बढ़ना, खाद्य तेल आयात में कमी, कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, किसानों की आय में बढ़ोतरी और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद शामिल है. भारत की दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों के लिए यह एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है. आने वाले वर्षों में यह तकनीक देश की अगली कृषि क्रांति की नींव बन सकती है.


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