3 साल, 11 अनशन, 2 महामोर्चे: कैसे मनोज जरांगे ने हिलाई महाराष्ट्र की सियासत?
Raisina News Desk- सितंबर 07, 2026 10:50 PM IST

महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा आरक्षण का चेहरा बन चुके मनोज जरांगे पाटिल ने अपने आंदोलनों से राज्य सरकार की नींद उड़ा रखी है. आरक्षण के नाम पर जरांगे ने जो जोर दिखाया है, उसने राज्य की सियासत की दिशा लगभग हर बार बदली या झकझोरी है.
आज महाराष्ट्र में आरक्षण की आग फिर सुलग रही है, जिसमें सबसे मजबूत धुरी जरांगे ही बने हुए हैं. मराठा आरक्षण, कुनबी प्रमाणपत्र और जाति सत्यापन की मांग को लेकर मनोज जरांगे पाटिल का अनशन सोमवार को दसवें दिन में प्रवेश कर गया है. उन्होंने अन्न-जल और उपचार त्याग दिया है. इसके बाद सरकार भारी दबाव में है और समाधान निकालने का प्रयास कर रही है.
दूसरी ओर, इसी बीच जालना के अंतरवाली सराटी में ही अनशन पर बैठे ओबीसी नेता मंगेश ससाने को पुलिस ने बिना समय गंवाए हिरासत में ले लिया है. इस घटनाक्रम से मराठा और ओबीसी आरक्षण का मुद्दा फिर से आमने-सामने आ गया है और यह साफ हो गया है कि प्रशासन जरांगे पर हाथ डालने से कतराता है, जबकि अन्य आंदोलनों को पुलिस बल से संभाल लिया जाता है.
आंदोलन को सिर्फ जरांगे के भरोसे न छोड़कर अब पूरा मराठा समाज इसे नई दिशा देने में जुट गया है. आरक्षण के मुद्दे पर पुणे में मराठा क्रांति मोर्चा की भी महत्वपूर्ण बैठकें हुईं. इसमें समाज की प्रमुख मांगों, आरक्षण के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं और आगामी आंदोलन की रूपरेखा पर चर्चा हुई.
मनोज जरांगे पाटील ने सितंबर 2023 से लेकर अब तक कुल 11 बार अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की है. उनका 11वां आंदोलन वर्तमान में 29 अगस्त 2026 से जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव में चल रहा है.
11वां आंदोलन (29 अगस्त 2026 – जारी): जालना के अंतरवाली सराटी में मनोज जरांगे अपनी मांगों को लेकर एक बार फिर आमरण अनशन पर बैठे हैं, उन्होंने सरकार को 11 सितंबर 2026 तक 58 लाख कुणबी रिकॉर्ड्स के आधार पर औपचारिक सरकारी आदेश GR जारी करने का अल्टीमेटम दिया है.
मनोज जरांगे पाटील के इन 11 आंदोलनों में से 9 आंदोलन जालना के अंतरवाली सराटी में हुए हैं और 2 बड़े आंदोलन मुंबई/नवी मुंबई जनवरी 2024 और अगस्त 2025 में केंद्रित रहे हैं.
मांगें जो मान ली गईं:
जरांगे की जिद है कि हैदराबाद, बॉम्बे और सतारा गजट के आधार पर सभी मराठों को कुनबी मानकर OBC प्रमाणपत्र दे दिया जाए. असली पेंच सगे-सोयरे के नोटिफिकेशन को कानूनी रूप से पक्के ‘सरकारी आदेश’ जीआर में बदलने पर फंसा हुआ है, जिसे सरकार OBC समुदाय की भारी नाराजगी और कानूनी पेचीदगियों के कारण टाल रही है
इसके विपरीत, OBC और धनगर आंदोलन शुरू तो होते हैं, लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंच पाते, क्यों जातियों में बिखराव है, OBC एक समुदाय नहीं बल्कि सैकड़ों जातियों का समूह है. इसलिए वे मराठों की तरह एकमुश्त वोट बैंक की तरह दबाव नहीं बना पाते. OBC नेता मंगेश ससाने को हिरासत में लिया जाना इसी बात का प्रमाण है कि OBC नेताओं के पीछे वह जनसैलाब नहीं दिखता जो जरांगे के पीछे है.
जरांगे की देखा-देखी अब राज्यभर में धनगर समाज का आंदोलन भी शुरू हो गया है. धनगर समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण लागू करने की मांग को लेकर मनमाड, इंदापुर, सांगली और कोल्हापुर सहित कई स्थानों पर रैलियां और आंदोलन आयोजित किए गए, लेकिन जरांगे जैसी जमीनी गोलबंदी और अड़ियल रुख का अभाव इन आंदोलनों को इतना मजबूत नहीं दिखाता
अपने वर्तमान अनशन में जरांगे की मुख्य मांग है कि सरकार सभी पुरानी मांगों का अंतिम और फाइनल जीआर तुरंत जारी करे. उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो वे 12 सितंबर के बाद अपने समर्थकों के साथ पूरी मुंबई को जाम कर देंगे. महाराष्ट्र में अब आरक्षण की लड़ाई सिर्फ मांगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आरक्षण के शक्ति प्रदर्शन का बड़ा अखाड़ा बन चुकी है.