ISRO का 'नॉटी बॉय' कैसे बना स्मार्ट? EOS-05 की सफल लॉन्चिंग से GSLV ने धोया नाकामी का दाग
Raisina News Desk- सितंबर 04, 2026 10:07 AM IST

नई दिल्ली:
तारीख 4 सितंबर 2026, सुबह के ठीक 2:55 बजे जब देश के अधिकांश लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तभी आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा द्वीप पर एक अलग ही कहानी लिखी जा रही थी. मिशन कंट्रोल रूम, लॉन्च कॉम्प्लेक्स और देशभर के ट्रैकिंग स्टेशनों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ISRO के करीब 16,500 वैज्ञानिक, इंजीनियर और सहयोगी कर्मी थकान और अपेक्षाओं से जूझ रहे थे. लेकिन मात्र 19 मिनट बाद सुबह के 3:14 बजे इन सभी के पास जश्न मनाने का एक बड़ा मौका मिला. हर चेहरे पर मुस्कान थी, वैज्ञानिक गले मिल रहे थे, हाथ मिलाकर एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे. ये कहानी है इसरो के ‘नॉटी बॉय’ के स्मार्ट लड़के बनने की. दरअसल शुक्रवार तड़के ISRO के GSLV-F17 रॉकेट ने EOS-05 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे देश के लिए गर्व का पल बताते हुए इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई दी. पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा- ISRO की एक और शानदार उपलब्धि और हमारे देश के लिए गर्व का पल. भारत के पहले इमेजिंग सैटेलाइट EOS-05 को जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में ले जाने वाले GSLV-F17 का सफल लॉन्च, भारत के स्पेस सेक्टर की उत्कृष्टता, इनोवेशन और बढ़ती क्षमताओं को दर्शाता है. ISRO और भारतीय इंडस्ट्री के बीच बढ़ती साझेदारी हमारे स्पेस प्रोग्राम को नई ताकत और विस्तार दे रही है, साथ ही पूरे स्पेस इकोसिस्टम में भारत की क्षमताओं को बढ़ा रही है.
Yet another outstanding achievement by ISRO and a proud moment for our nation.
The successful launch of GSLV-F17 carrying EOS-05, India’s first-ever imaging satellite from Geosynchronous orbit is a reflection of the excellence, innovation and growing capabilities that define… https://t.co/fXzwnSmwAF
— Narendra Modi (@narendramodi) September 4, 2026
भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसे ‘अंतरिक्ष में भारत की एक और बड़ी छलांग’ बताते हुए पूरी इसरो टीम को बधाई दी. उन्होंने कहा, EOS-05 एक अत्याधुनिक अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट है. यह देश को रीयल टाइम निगरानी और रणनीतिक डेटा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
इस सफल मिशन ने भारत की अंतरिक्ष एजेंसी को एक नई जान दे दी है. बीते कुछ समय से इसरो का भरोसेमंद रॉकेट PSLV को लगातार फेल हो रहा था. लेकिन आज PSLV ने सभी पुरानी कसर को पीछे छोड़ वैज्ञानिकों को मुस्कुराने का एक बड़ा मौका दे दिया. इस सफलता का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हाल के सालों में भारत की लॉन्चिंग कैपेसिटी को लेकर सवाल उठने लगे थे.
ISRO का ‘वर्कहॉर्स’ कहे जाने वाला PSLV साल 2025 और जनवरी 2026 में लगातार दो बार विफल रहा. इन घटनाओं के बाद ISRO को लंबी जांच और सुधार की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. PSLV बेड़ा अभी भी ग्राउंडेड है और इंजीनियर सुधारों और परीक्षणों के बाद ही उसे दोबारा उड़ान की मंजूरी देंगे. ऐसे में जिम्मेदारी GSLV Mk-II पर आई, जिसे ISRO के गलियारों में कभी प्यार तो कभी चिंता के साथ ‘नॉटी बॉय’ कहा जाता रहा है.
GSLV को नॉटी बॉय का उपनाम यूं ही नहीं मिला. 19 लॉन्चिंग में इस रॉकेट को छह बार असफलता मिली है. इसका सफर उतार-चढ़ाव और नाटकीय घटनाओं से भरा रहा है. लेकिन आज यही रॉकेट भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का बड़ा प्रतीक बन गया.
इस कहानी की शुरुआत 1990 के दशक की शुरुआत में हुई, जब भारत को भारी संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए क्रायोजेनिक इंजन तकनीक की जरूरत थी. तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन पर आधारित ये इंजन रॉकेट लॉन्चिंग की सबसे उन्नत तकनीकों में गिने जाते हैं.
भारत ने शुरुआत में रूस से तकनीकी सहयोग मांगा, लेकिन अमेरिका के नेतृत्व वाले तकनीकी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबावों के कारण तकनीक हस्तांतरण में बाधाएं खड़ी हो गईं. रूस ने सीमित संख्या में क्रायोजेनिक इंजन तो दिए, लेकिन वह संपूर्ण तकनीक नहीं मिली. संदेश साफ था- भारत रॉकेट खरीद सकता है, लेकिन उसे यह सीखने की अनुमति नहीं होगी कि उन्हें बनाया कैसे जाए.
यह झटका भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को रोक सकता था, लेकिन इसके बजाय यह भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के सबसे उल्लेखनीय स्वदेशी विकास अभियानों में से एक की शुरुआत बन गया. इसरो के वैज्ञानिकों ने लगभग 20 साल तक लगातार प्रयास कर इस जटिल तकनीक में महारत हासिल की. रास्ते में कई असफलताएं, देरी और निराशाएं आईं, लेकिन भारत पीछे नहीं हटा.
वैज्ञानिकों की इसी अटूट कोशिश ने GSLV Mk-II को ISRO के मुकुट का एक चमकदार रत्न बना दिया. आज इसकी हर सफल उड़ान इस बात की याद दिलाती है कि तकनीकी प्रतिबंध भारत की अंतरिक्ष यात्रा को रोक नहीं सके. शुक्रवार की सफलता इसलिए भावनात्मक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण थी. यह केवल एक और GSLV मिशन नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक धैर्य का उत्सव था.
अगस्त 2021 में इसरो ने GSLV-F10 के जरिए GISAT-1 उपग्रह को लॉन्च करने की कोशिश की थी. यह उपग्रह ऊंची कक्षा से लगातार निगरानी के लिए बनाया गया था, लेकिन स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज के सही ढंग से काम न करने के कारण मिशन विफल हो गया.
EOS-05 उसी अधूरे सपने को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम है. इस बार रॉकेट ने निर्धारित योजना के अनुसार प्रदर्शन किया. उपग्रह ने लगभग 36 हजार किलोमीटर ऊंची कक्षा की ओर अपनी यात्रा शुरू कर दी, जहां से वह भारत को ऐसी क्षमता देगा जिसकी लंबे समय से कमी महसूस की जा रही थी- किसी क्षेत्र पर लगातार नजर रखने की क्षमता.
सामान्य पृथ्वी अवलोकन उपग्रह पृथ्वी के अपेक्षाकृत निकट कक्षा में घूमते हैं और किसी क्षेत्र की समय-समय पर तस्वीरें लेते हैं. वे केवल ‘स्नैपशॉट’ उपलब्ध कराते हैं. इसके विपरीत EOS-05 एक निरंतर चलने वाली ‘फिल्म’ की तरह निगरानी करेगा.
पृथ्वी से हजारों किलोमीटर ऊपर अपनी स्थिति से EOS-05 भारतीय उपमहाद्वीप, आसपास के महासागरों और रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार नजर रखेगा. यह बंगाल की खाड़ी में बन रहे चक्रवातों, वास्तविक समय में आने वाली बाढ़ों, जंगल की आग, कृषि गतिविधियों, पर्यावरणीय बदलावों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की निगरानी करेगा.
यूआर राव सैटेलाइट सेंटर बेंगलुरु के निदेशक डी.के. सिंह ने इसे EOS-05 को ‘आसमान में एक और आंख’ बताते हैं. मिशन के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रक्षेपण के समय भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी श्रीहरिकोटा में मौजूद थे. उपग्रह का महत्व केवल नागरिक उपयोग तक सीमित नहीं है. निरंतर निगरानी क्षमता समुद्री सुरक्षा बढ़ाने, आपदा प्रबंधन को बेहतर बनाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में मदद करेगी.
यह प्रक्षेपण ऐसे समय हुआ है जब नई लॉन्च प्रणालियों के दौर में भी GSLV Mk-II की उपयोगिता बनी हुई है. पिछले वर्ष इसी रॉकेट परिवार ने NASA-ISRO सिंथेटिक एपर्चर रडार (NISAR) उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया था, जिसे दुनिया का सबसे महंगा नागरिक पृथ्वी-अवलोकन उपग्रह माना जाता है.
अब EOS-05 ने इस सूची में एक और उपलब्धि जोड़ दी है. 2,376 किलोग्राम वजनी यह उपग्रह आसमान में 36 हजार किमी ऊपर से हर 5 मिनट में अलर्ट देगा. इस मिशन की सफलता पर ISRO चीफ डॉ. वी. नारायणन ने कहा कि कड़ी मेहनत का पुरस्कार और अधिक काम होता है. उन्होंने इस सफलता को ‘इसरो की खुली कार्य संस्कृति की बदौलत मिली बड़ी उपलब्धि’ बताया.
हालांकि यह सफलता आत्मविश्वास लौटाती है, लेकिन जश्न मनाने का समय सीमित है. इसरो के सामने कई महत्वाकांक्षी कार्यक्रम हैं. इसी साल छह और लॉन्चिंग प्रस्तावित हैं. जिसमें सबसे अहम चुनौती गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन की है.
गगनयान का पहला मानव रहित मिशन इसी साल के अंत से पहले प्रस्तावित है. यह भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को भारतीय रॉकेट और भारतीय धरती से लॉन्च किए गए अंतरिक्ष यान के जरिए अंतरिक्ष में भेजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा.
GSLV-F17 मिशन की सफलता कई मायनों में महत्वपूर्ण है. इसने हालिया फेलियर के बाद फिर से भरोसा बहाल किया है. 2021 में फेल हुए एक सैटेलाइट मिशन को फिर जिंदा कर दिया है. कहा जा सकता है कि इसरो का नॉटी बॉय अब स्मार्ट बॉय बन चुका है.
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