मदरसों पर अखिलेश सरकार में आया वो बिल क्या था, जिसे योगी सरकार ने कर दिया खत्म?

नई दिल्ली:

उत्तर प्रदेश में मदरसों को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है. योगी सरकार ने आधिकारिक रूप से मदरसों से जुड़े उस बिल को वापस ले लिया है, जिसे 2016 में अखिलेश यादव की सरकार में पास किया गया था. यह काफी विवादित बिल था. इस कारण यह कभी कानून बन ही नहीं सका. राज्यपाल ने इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया था. 

अखिलेश यादव के दौर में बने इस बिल को वापस लेने पर योगी कैबिनेट ने पिछले साल फैसला लिया था. अब इसे मॉनसून सत्र के दौरान विधानसभा और विधान परिषद दोनों से ही वापस ले लिया गया है.

इस बिल को वापस लिए जाने पर योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि उनके जमाने में जो चीजें थीं, जैसे- अयोग्य लोगों को पोस्टिंग देना और बिना वजह पैसे बांटना, उन्हें सरकार ने बदल दिया है. सरकार एक नई व्यवस्था ला रही है.

क्या था यह बिल?

उत्तर प्रदेश मदरसा (पेमेंट ऑफ सैलरीज टू टीचर्स एंड अदर एम्प्लॉयी) बिल को अगस्त 2016 में पास किया गया था. उस समय यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे. 

यह बिल मदरसा में पढ़ाने वाले शिक्षकों को पुलिस और प्रशासनिक कार्रवाई से बचाता था. दो चीजें थीं जो इस बिल को विवादित बनाती थीं:-

  • पहली: मदरसा में पढ़ाने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों की सैलरी समय पर नहीं आई तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान था.
  • दूसरी: मदरसे के शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ न तो पुलिस जांच हो सकती थी और न ही कोई कार्रवाई, चाहे आरोप किसी भी तरह के हों.

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10 साल में क्या कुछ हुआ?

  • अगस्त 2016: 29 अगस्त को तत्कालीन अखिलेश सरकार ने विधानसभा में इस बिल को पास किया. अगले दिन 30 अगस्त को इसे विधान परिषद में पास किया गया. 31 अगस्त को इसे तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक के पास भेजा गया.

  • सितंबर-अक्टूबर 2016: राज्यपाल राम नाईक के पास यह बिल लगभग दो महीने तक रहा, लेकिन उन्होंने इसे मंजूरी नहीं दी. वह इसलिए क्योंकि इस बिल में वही दो बातें विवादित थीं, जिससे मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों को कानूनी सुरक्षा मिल रही थी. 31 अक्टूबर को उन्होंने इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया.
  • 2016 से 2025: 9 साल तक यह बिल ठंडे बस्ते में पड़ा रहा. इस बिल में विवादित बातें होने के कारण राष्ट्रपति ने भी इसे मंजूरी नहीं दी. 
  • दिसंबर 2025: योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट ने 22 दिसंबर को इस विवादित बिल को वापस लेने को मंजूरी दी. 
  • अगस्त 2026: 5 अगस्त को 2016 के इस बिल को उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद से वापस ले लिया गया.

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पास होने के बाद भी कानून क्यों नहीं बन पाया?

अगस्त 2016 में दो दिन में इस बिल को विधानसभा और विधान परिषद में पास किया गया. तीसरे दिन राज्यपाल के पास भी भेज दिया गया. लेकिन यह बिल कभी कानून नहीं बन सका.

जब यह बिल राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा गया तो उन्होंने भी इस पर आपत्ति जताई और इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया. 

इलाहाबाद हाई कोर्ट में सीनियर एडवोकेट अमरेंद्र नाथ सिंह ने NDTV में एक ब्लॉग में लिखा कि 2016 का वह बिल असल में मदरसे का ऐसा ढांचा तैयार कर रहा था, जो संस्थान के भीतर स्वायत्तता के नाम पर जवाबदेही से मुक्ति चाहता था.

वह लिखते हैं कि ‘ऐसी व्यवस्था जो न्यायिक प्रक्रिया, आपराधिक न्यायशास्त्र और प्रशासनिक व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर दे, उसे संवैधानिक स्वीकृति मिलना मुश्किल था.’

अब योगी सरकार ने इस बिल को वापस लेकर इसका चैप्टर हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया है. 10 साल तक अटके रहने के बाद यह बिल वापस हो गया.

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