क्या ग्लेशियर टूटने से भारत में भी आ सकती है नेपाल जैसी तबाही? एक्सपर्ट ने बताया खतरों से कैसे निपटना होगा

नेपाल-चीन सीमा पर ग्लेशियर झील फटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को झकझोर दिया है. इस आपदा के बाद भारत में भी ग्लेशियर झीलों से पैदा हो रहे खतरे को लेकर चिंता बढ़ गई है. सिक्किम स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (SDMA) के वाइस चेयरमैन डॉ. विनोद शर्मा ने चेतावनी दी है कि सिक्किम में सात ऐसी ग्लेशियर झीलें हैं जो किसी बड़े भूकंप या क्लाउडबर्स्ट की स्थिति में टूट सकती हैं. अगर ऐसा हुआ तो ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी बड़ी आपदा आ सकती है.

एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत में डॉ. विनोद शर्मा ने कहा कि नेपाल-चीन सीमा पर ग्लेशियर टूटने से आई भयंकर आपदा जलवायु परिवर्तन के दौर में पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी है. उनके मुताबिक यह केवल नेपाल या तिब्बत तक सीमित घटना नहीं है, बल्कि हिमालयी राज्यों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए भी समय रहते चौकन्ना होने की जरूरत है.

कितने झीलों की हुई है मैपिंग?

डॉ. शर्मा ने बताया कि सिक्किम डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने राज्य में मौजूद 85 ग्लेशियर झीलों की मैपिंग की है और उनसे जुड़ा विस्तृत डेटा इकट्ठा किया है.

उन्होंने कहा, “सिक्किम डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने सिक्किम में 85 ग्लेशियल लेक को मैप किया है, उसके बारे बहुत सारी जानकारी और डेटा इकठा किया है. हमने पाया है की इन 85 झीलों में से 17 बेहद संवेदनशील हैं और उनका रिट्रीट हो रहा है, यानी वो पिघल रहे हैं. इनमें 7 ऐसे झील हैं जो किसी बड़े भूकंप या क्लाउड बर्स्ट होने से टूट सकते हैं, और इसकी वजह से राज्य में Glacier Lake Outburst Flood (GLOF) disaster का खतरा है.”

हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण ऐसी झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है. जब किसी झील को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार भूकंप, भूस्खलन या क्लाउडबर्स्ट की वजह से टूट जाती है, तो अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह निकलता है. इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है. ऐसे हालात में नदियों के किनारे बसे गांव, सड़कें, पुल और अन्य ढांचे भारी नुकसान की चपेट में आ सकते हैं.

हालांकि बढ़ते खतरे को देखते हुए सिक्किम में तैयारियां भी की गई हैं. डॉ. शर्मा के मुताबिक, सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हिमालय क्षेत्र के कई ग्लेशियरों और नदियों में सेंसर लगाए हैं. इन सेंसरों के जरिए जलस्तर और अन्य गतिविधियों पर निगरानी रखी जाती है ताकि किसी आपात स्थिति में आसपास के रिहायशी इलाकों को समय रहते अलर्ट जारी किया जा सके.

कुछ दशकों में कितना बढ़ा खतरा?

जलवायु परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिक चेतावनियां भी इस खतरे की गंभीरता को सामने रखते हैं. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) ने 2022 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हिंदू कुश क्षेत्र में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड आपदा का खतरा पिछले कुछ दशकों में पांच गुना से अधिक बढ़ गया है.

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण पूरे हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. इसके चलते कई नई हिमनदी झीलें बन रही हैं, जबकि पुरानी झीलों का आकार भी बढ़ रहा है. दूसरी ओर, हिमालय भूकंप और भूस्खलन की दृष्टि से भी संवेदनशील इलाका है. ऐसे में किसी प्राकृतिक घटना के कारण झीलों के टूटने का खतरा और बढ़ जाता है.

डॉ. विनोद शर्मा का कहना है कि चीन ने तिब्बत और हिमालय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास किया है, जिससे वहां प्रदूषण बढ़ा है. उनके अनुसार, इसका असर हिमालय के एक बड़े हिस्से में देखा जा रहा है, जहां ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ी है और सैकड़ों ग्लेशियर रिट्रीट कर रहे हैं.

नेपाल में आई हालिया आपदा ने एक बार फिर दिखा दिया है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरे अब भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई हैं. ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी राज्यों में निगरानी प्रणाली, शुरुआती चेतावनी तंत्र और आपदा तैयारी को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि किसी संभावित GLOF आपदा से जन-धन के नुकसान को कम किया जा सके.



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