अमरनाथ यात्रा (Amarnath Yatra) में बर्फ का शिवलिंग इस बार कुछ ही दिनों में पिघल गया. शुरुआत में तो श्रद्धालुओं को बाबा बर्फानी ने दर्शन दे दिए, लेकिन कुछ ही दिन बाद शिवलिंग पिघल गया और श्रद्धालुओं को पहुंचने के बाद सिर्फ गुफा और उस स्थान के ही दर्शन हुए जहां बाबा बर्फानी हर साल प्रकट होते हैं. बेशक इस घटना से श्रद्धालुओं के बीच चिंता और जिज्ञासा दोनों बढ़ गई कि आखिर ये हुआ क्यों? क्या ये सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है या जलवायु परिवर्तन का संकेत? इस सवाल को समझने के लिए आपको अमरनाथ का इतिहास, गुफा का भूविज्ञान और वैज्ञानिकों की राय तीनों को समझना पड़ेगा. एम एम कौल की The Amarnath Pilgrimage: History and Facts टाइटल से एक लेख कश्मीरी पंडित नेटवर्क की वेबसाइट पर छपा हुआ है. इसमें अमरनाथ में प्राकृतिक रूप से बनने वाले बर्फ का हिमलिंग हजारों सालों से आस्था का पूजनीय स्थल रहा है. ये हिमलिंग चंद्रमा के बढ़ने और घटने के साथ आकार में बढ़ता और घटता है. श्रावण पूर्णिमा की रात को अमरनाथ का शिवलिंग पूर्ण आकार को प्राप्त करता है. बहुत से अभिलेखों में इस हिमलिंग को अमरेश, अमरेश्वर, रसलिंगम, शुद्धि लिंगम, सिद्धि लिंगम, बुद्धि लिंगम, पुरातन बुद्धि लिंगम और पंसुवन लिंगम जैसे नामों से संबोधित किया गया है, अमरनाथ नाम का प्रचलन ‘अमरनाथ महात्म्य’से माना जाता है, जो कि इस तीर्थ स्थल पर एक प्रामाणिक ग्रंथ बताया गया है.
गौरतलब है कि अमरनाथ हजारों वर्षों से आस्था का केंद्र है. शिवलिंग जल्दी पिघलने को लेकर कुछ भक्तों का सोचना है कि कहीं कलयुग में भगवान नाराज तो नहीं हो गए हैं, लेकिन ये समझना पड़ेगा कि कहीं इसके लिए हम ही तो जिम्मेदार नहीं. बता दें कि समुद्र तल से 12,729 फीट की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा ऊपरी सिंध घाटी की एक सहायक हिमानी घाटी में स्थित है. 1970 में प्रकाशित British Karst Research Expedition to the Himalaya की रिपोर्ट के मुताबिक- अमरनाथ गुफा एक मोटी और लगभग क्षैतिज चूना पत्थर (Horizontal Limestone) की परत में बनी है. रिपोर्ट बताती है कि गुफा मुख्य रूप से फ्रॉस्ट एक्शन से बनी है. गुफा का प्रवेश द्वार लगभग 100 फीट चौड़ा और 50 फीट ऊंचा है और इसकी लंबाई लगभग 50 फीट है. इस गुफा के भीतर एक छोटे कक्ष में बर्फ के दो स्टैलेग्माइट (गुफा के फर्श से ऊपर की ओर बढ़ने वाला) बने थे. सितंबर 1970 की शुरुआत में किए गए सर्वेक्षण के दौरान एक स्टैलेग्माइट लगभग पूरी तरह पिघल चुका था, जबकि दूसरा लगभग एक फुट ऊंचा और छह इंच व्यास का रह गया था. यही बर्फ का स्तंभ हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है.
Advertisement – Scroll to continue

बरेली के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. जसपाल सिंह ने बताया कि अमरनाथ गुफा में बर्फ के शिवलिंग का समय से पहले पिघलना ग्लोबल वार्मिंग और कम हिमपात स्थानीय प्रदूषण खासकर वाहनों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन और बढ़ता तापमान जैसे कई कारकों का संयुक्त प्रभाव हो सकता है. वहीं किसी एक साल की घटना के आधार पर केवल प्रदूषण को इसका कारण नहीं मान सकते. इसके लिए मौसम, हिमपात और तापमान के पिछले वैज्ञानिक आंकड़ों का विश्लेषण करना जरूरी है. डॉक्टर जसपाल सिंह ने बताया कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और सस्टेनेबल पर्यटन को बढ़ावा देना इस समय की आवश्यकता है. अमरनाथ जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि प्राकृतिक हिम संरचनाओं और वहां के पर्यावरणीय संतुलन को सुरक्षित रखा जा सके.
लगभग डेढ़ दशक पहले National Geographic में प्रकाशित Massive Hindu Pilgrimage Melting Sacred Glacier शीर्षक से छपी रिपोर्ट में अमरनाथ यात्रा के बढ़ते दबाव और उसके हिमालयी पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता व्यक्त की गई थी. इसमें यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर के वैज्ञानिक प्रो. शकील रोमशू ने कहा था कि हिमनद शून्य से नीचे के तापमान वाला क्षेत्र होता है, लेकिन हजारों लोग, चाहे वे यात्री हों या कोई और 37 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले शरीर के साथ वहां मौजूद रहते हैं. हेलीकॉप्टर उड़ते हैं तो उनसे भी ऊष्मा पैदा होती है और तापमान बढ़ने लगता है. फिर इन लोगों के लिए निर्माण और अन्य सुविधाओं का इंतजाम, इससे इलाके में बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया को तेजी मिलती है. पश्चिमी हिमालय के ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन का तेजी से प्रभाव पड़ रहा है. अमरनाथ यात्रा भी इसी का हिस्सा है. उन्होंने सरकार से यहां सूक्ष्म पर्यावरणीय तंत्र की वहन क्षमता के अनुरूप तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या सीमित करने की आवश्यकता बताई. वैसे इसी रिपोर्ट में काठमांडू इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के तत्कालीन महानिदेशक डेविड मोल्डेन ने कहा था कि सरकारों को ऐसी नीतियां और नियम बनाने चाहिए, जिनसे इन संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्रों में आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की संख्या की निगरानी हो सके तथा पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत पर्यटन को बढ़ावा मिले.

यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर के भूगोल एवं आपदा प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर और डीन रिसर्च प्रो. मोहम्मद सुल्तान भट्ट ने बताया कि बर्फ के शिवलिंग का समय से पहले पिघलना मुख्य रूप से कम हिमपात और सर्दियों के दौरान सामान्य से अधिक तापमान का संयुक्त परिणाम है. इस साल विशेष रूप से दिसंबर और जनवरी के दौरान हिमपात सामान्य से काफी कम हुआ है. प्रोफेसर ने बताया कि यही बर्फ के शिवलिंग के समय से पहले पिघलने का प्रमुख कारण है. बदलती जलवायु के चलते भविष्य में इस तरह की मौसमी घटनाएं और देखने की संभावना है. प्रोफेसर भट्ट ने ये भी कहा कि ये सब मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान का नतीजा है. इसके साथ ही अनियंत्रित पर्यटन जैसी मानवीय गतिविधियां भी क्षेत्र की सूक्ष्म जलवायु और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर बहुत गहरा प्रभाव डाल रही है. उन्होंने कारण तो बताया ही साथ ही सुझाव भी दिया कि तीर्थयात्रियों की संख्या में पर्याप्त कमी लाना जरूरी है. किसी भी स्थिति में ये संख्या उस क्षेत्र की वहन क्षमता (Carrying Capacity) से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment, EIA) और पर्यावरण प्रबंधन योजना (Environmental Management Plan, EMP) इस मुद्दे से निपटने के लिए उपयुक्त उपाय तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
मान्यता है कि भगवान शिव ने माता पार्वती को इसी गुफा में अमरकथा यानी सृष्टि के निर्माण और अमर होने का रहस्य सुनाया था. माता पार्वती ने पूछा था कि आप अमर हैं, लेकिन मुझे हर जन्म में नए शरीर के साथ कठिन तपस्या क्यों करनी पड़ रही. माता पार्वती के अनुरोध के बाद शिव जी उन्हें कथा सुनाने के लिए इस एकांत गुफा में लेकर आए थे ताकि कोई अन्य जीव इस रहस्य को न सुन सके. मान्यता ये भी है कि जब भगवान शिव माता पार्वती को ये कथा सुना रहे थे तो पार्वती जी ये कथा सुनते सुनते सो गई थीं लेकिन कबूतरों के एक जोड़े ने ये पूरी कथा सुनी थी जिसके प्रभाव से ये कबूतर अमर हो गए. आज भी अमरनाथ यात्रा के दौरान भक्तों इस बेहद ठंडी और विरान गुपा में कबूतरों का जोड़ा दिखाई देता है.
चंद्रमा बढ़ने के साथ बढ़ता है शिवलिंग का आकार : अमरनाथ शिवलिंग की सबसे अनोखी और रहस्यमयी मान्यता इसके आकार को लेकर है. माना जाता है कि ये शिवलिंग चंद्रमा की कलाओं के साथ अपना आकार बढ़ाता और घटाता है.आषाढ़ पूर्णिमा से लेकर श्रावण पूर्णिमा तक जैसे-जैसे चंद्रमा बढ़ता है तो शिवलिंग का आकार भी अपने पूर्ण रूप में आ जाता है. इसके बाद अमावस्या की ओर बढ़ते हुए कृष्ण पक्ष में इसका आकार धीरे-धीरे घटने लगता है.
पौराणिक मान्यता के मुताबिक इस अमर कथा की गोपनीयता को बनाए रखने के लिए भगवान शिव ने गुफा की ओर बढ़ते हुए अपने सभी प्रिय गणों और आभूषणों का कई जगहों पर त्याग किया था. अमरनाथ यात्रा के दौरान इन पड़ावों का भी खास महत्व है.

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक- कलयुग में इस गुफा की खोज सबसे पहले महर्षि भृगु ने की थी. वहीं एक लोकप्रिय कहानी के मुताबिक- मुस्लिम गड़रिये बूटा मलिक ने कलयुग में सबसे पहले इस पवित्र गुफा को खोजा था. पहलगाम में रहने वाले मुस्लिम चरवाहा बूटा मलिक एक दिन अपनी भेड़ बकरियों को चराने के लिए निकले था. रास्ते में उनकी मुलाकात एक साधु से हुई. साधु ने उन्हें एक कांगड़ी दी जो बाद में सोने की बन गई.अगले दिन बूटा मलिक साधु को धन्यवाद देने वहीं पहुंचे तो उन्हें बर्फ का शिवलिंग मिला. इसके बाद उन्होंने अन्य साधुओं को भी जानकारी दी. धीरे-धीरे अमरनाथ की जानकारी दूर-दूर तक फैल गई.वहीं धार्मिक मान्यता की बात करें तो जब एक समय पूरी कश्मीर घाटी पानी में डूब गई थी. तब महा ऋषि कश्यप ने नदियों के जरिए इस पानी को निकाला. जब हिमालय की घाटियों से बर्फ हटी ऋषि भृगु तपस्या के लिए स्थल खोजते हुए इस गुफा तक पहुंचे थे और उन्होंने इस पवित्र गुफा के दर्शन किए थे. इसके बाद ही ये आम लोगों का तीर्थस्थल बना.