कर्मचारी आपसे कुर्सी के लिए आपसी भीख मांगे? दिव्यांग हुए कर्मी को CRPF दे ₹1.25 करोड़ मुआवजा- SC | Supreme Court statement on CRPF what is disabled driver case
Raisina- जुलाई 14, 2026 07:35 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में कहा कि सेवा के दौरान दिव्यांग हुए कर्मचारी को नौकरी से हटाने के बजाय उसके लिए वैकल्पिक पद उपलब्ध कराना सरकार की कानूनी जिम्मेदारी है. कोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी CRPF द्वारा एक चालक को ड्राइवर को आंखों में आई दिक्कत के बाद चिकित्सकीय आधार पर सेवा से हटाने की कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए उसे 1.25 करोड़ मुआवजा देने का आदेश दिया है. जस्टिस दिपांकर दत्ता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए CRPF ने दिव्यांगजन अधिनियम (यानी समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी)1995 की धारा 47 का पालन नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को सेवा से हटाने के बजाय समान वेतन और सेवा लाभ वाले किसी अन्य पद पर भेजा जाना चाहिए था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 47 का प्रावधान अनिवार्य है यदि कोई सरकारी कर्मचारी सेवा के दौरान दिव्यांग हो जाता है तो उसे नौकरी से नहीं हटाया जा सकता. यदि वह अपने मूल पद पर काम करने में सक्षम नहीं है तो उसे समान वेतन और सुविधाओं के साथ दूसरे पद पर नियुक्त किया जाए. यदि ऐसा पद उपलब्ध न हो तो उसके लिए सुपरन्यूमेरेरी (अतिरिक्त) पद सृजित किया जाना चाहिए. अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून ने नियोक्ता पर ये जिम्मेदारी डाली थी कि वह कर्मचारी के लिए कुर्सी ढूंढ़े, न कि कर्मचारी उससे कुर्सी की भीख मांगे.
पीठ ने कहा कि CRPF ने एक आदर्श नियोक्ताके रूप में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. अदालत के अनुसार, कल्याणकारी कानूनों को लागू करना सरकारी संस्थाओं का दायित्व है और वे कर्मचारी के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकतीं. CRPF ने दलील दी थी कि वर्ष 2002 की अधिसूचना के तहत उसके लड़ाकू कर्मियों को धारा 47 से छूट मिली हुई थी. कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि संबंधित कर्मचारी को वर्ष 1998 में सेवा से हटाया गया था, जबकि अधिसूचना 2002 में जारी हुई इसलिए इसका पूर्ववर्ती प्रभाव नहीं हो सकता.
गौरतलब CRPF में साल 1985 से चालक के रूप में कार्यरत कर्मचारी को वर्ष 1996 में आंखों की गंभीर बीमारी हो गई. चिकित्सकीय जांच में उसकी एक आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई और दूसरी आंख की दृष्टि भी आंशिक रूप से प्रभावित हुई. इसके बाद CRPF मेडिकल बोर्ड ने उसे स्थायी रूप से अयोग्य घोषित कर 11 मार्च 1998 को सेवा से हटा दिया.कर्मचारी ने पहले आर्थिक लाभ की मांग की और बाद में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.हाईकोर्ट ने 2008 में उसकी बहाली का आदेश दिया, जिसे 2014 में डिवीजन बेंच ने भी बरकरार रखा. इसके खिलाफ केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची. केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि कर्मचारी ने पुनर्नियुक्ति नहीं बल्कि दिव्यांगता पेंशन मांगी थी, इसलिए उसने धारा 47 के तहत अपना अधिकार छोड़ दिया. कोर्ट ने कहा कि किसी अधिकार का परित्याग तभी माना जाएगा जब यह साबित हो कि कर्मचारी अपने अधिकार से पूरी तरह अवगत था और उसने स्वेच्छा से उसे छोड़ा. रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि CRPF ने उसे उसके कानूनी अधिकारों की जानकारी दी थी. कर्मचारी को काम नहीं मिलने की पूरी जिम्मेदारी CRPF की अवैध कार्रवाई थी इसलिए “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत इस मामले में लागू नहीं होगा. कर्मचारी पूर्ण बैक वेज, ब्याज और मुकदमे के खर्च का हकदार है. पीठ ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में किया गया वादा केवल प्रतीकात्मक नहीं रह सकता. कर्मचारी की गरिमा की बहाली और उसे पूर्ण बैक वेज, ब्याज तथा लागत देना न्यूनतम न्याय है. कर्मचारी अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुका है इसलिए अदालत ने पुनर्बहाली के बजाय उसे आठ सप्ताह के भीतर ₹1.25 करोड़ का भुगतान करने का आदेश दिया. साथ ही हिमाचल प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह दृष्टिबाधित कर्मचारी को मुआवजे की राशि सुरक्षित निवेश करने और भविष्य की चिकित्सा आवश्यकताओं के संबंध में सहायता प्रदान करें.