हाथ में चमचमाता स्मार्टफोन, सोलर लाइट से जगमगाते शहर और सड़कों पर फर्राटा भरती इलेक्ट्रिक कारें… इस मॉडर्न दुनिया की चाबी सिर्फ बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों के पास नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा देशों की तिजोरियों में बंद है. हम गूगल, एप्पल या टेस्ला जैसी दिग्गज कंपनियों के चर्चे तो रोज सुनते हैं लेकिन पर्दे के पीछे असली खेल उन मुल्कों का चल रहा है जो इस पूरी टेक्नोलॉजी के लिए कच्चा माल यानी नेचुरल रिसोर्सेज सप्लाई करते हैं. अगर ये 5 देश आज सप्लाई रोक दें तो दुनिया भर की फैक्ट्रियां रातों-रात ठप पड़ जाएंगी. अस्पतालों की मेडिकल मशीनों से लेकर सरहद पर तैनात मिसाइलों तक, सब कुछ वहीं का वहीं थम जाएगा.
दुनिया की अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन का कंट्रोल किन देशों के पास है?
दुनिया की अर्थव्यवस्था और ग्लोबल सप्लाई चेन का पूरा रिमोट कंट्रोल चीन, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, चिली, सऊदी अरब और ऑस्ट्रेलिया जैसे 5 प्रमुख मुल्कों के पास है.
इन 5 देशों के फैसलों का पूरी दुनिया पर क्या असर पड़ता है?
जब ये देश अपने प्राकृतिक संसाधनों के एक्सपोर्ट पर रोक लगाते हैं या इनके यहाx कोई राजनीतिक हलचल होती है, तो पूरी दुनिया में हाहाकार मच जाता है. इसकी वजह से चीज़ों के दाम आसमान छूने लगते हैं और जरूरी सामान की भारी किल्लत पैदा हो जाती है.
1- चीन: रेयर अर्थ एलिमेंट्स का बादशाह
तकनीक की जान हैं ये 17 खनिज: ‘रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ वे 17 दुर्लभ खनिज हैं, जिनके बिना स्मार्टफोन, लैपटॉप, विंड टरबाइन और इलेक्ट्रिक गाड़ियों का निर्माण नामुमकिन है.
- ग्लोबल सप्लाई पर चीन का कब्जा: दुनिया भर में सप्लाई होने वाले कुल रेयर अर्थ का लगभग 70% हिस्सा अकेले चीन से आता है.
- प्रोसेसिंग में 90% दबदबा: माइनिंग ही नहीं, बल्कि इन खनिजों को रिफाइन और प्रोसेस करने का करीब 90% काम भी चीन में ही होता है.
- माइनिंग और रिफाइनिंग में शुरुआती निवेश: नाम में ‘रेयर’ होने के बावजूद ये खनिज धरती में मौजूद हैं, लेकिन चीन ने सालों पहले ही इनकी माइनिंग और रिफाइनिंग टेक्नोलॉजी में भारी निवेश करके ये बढ़त हासिल की है.
- दूसरों के पास महारत की कमी: अन्य देशों के पास भी इनके भंडार हैं लेकिन चीन जैसी उन्नत प्रोसेसिंग यूनिट्स और महारत फिलहाल किसी के पास नहीं है.
- मार्केट और कीमतों पर सीधा कंट्रोल: इसी दबदबे के कारण चीन जब चाहे इलेक्ट्रॉनिक्स और ग्रीन एनर्जी के सामानों की कीमतें और सप्लाई नियंत्रित कर लेता है.
- 2010 का ऐतिहासिक वाकया: जब 2010 में चीन ने जापान को इनका एक्सपोर्ट रोका था, तब पूरी दुनिया को अहसास हो गया था कि टेक इंडस्ट्री की असली कमान चीन के हाथों में है.
2- डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो: कोबाल्ट का सबसे बड़ा गढ़
- तकनीक और EVs की जान: स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EVs) में इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरी के लिए कोबाल्ट सबसे जरूरी चीज है.
- कांगो का एकछत्र राज: दुनिया के कुल कोबाल्ट भंडार का लगभग 50% से 70% हिस्सा अफ्रीका के देश ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो’ (DRC) के पास है.
- कोई दूसरा विकल्प नहीं: आज के समय में कोबाल्ट का कोई भी ऐसा सस्ता और टिकाऊ विकल्प मौजूद नहीं है, जो इसकी जगह ले सके.
- दुनिया की नज़र कांगो पर: कोबाल्ट की भारी मांग के कारण दुनिया के तमाम बड़े देशों की नज़रें कांगो के दक्षिणी कटंगा इलाके की खदानों पर टिकी हुई हैं.
- खदानों के भयानक हालात: अपार खनिज संपत्ति होने के बावजूद यहां काम करने के हालात बेहद असुरक्षित हैं, बच्चों से बाल मज़दूरी कराई जाती है और खदानों पर कब्जे के लिए हिंसक संघर्ष होते हैं.
- आम जनता को फायदा नहीं: दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों में कोबाल्ट हासिल करने की होड़ मची है, लेकिन इसका आर्थिक लाभ कांगो के आम नागरिकों तक नहीं पहुँच पा रहा है.
- ग्लोबल सप्लाई चेन पर खतरा: देश में जारी राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार की वजह से पूरी दुनिया के लिए कोबाल्ट की सप्लाई चेन हमेशा खतरे में बनी रहती है.
3- चिली: तांबे और लिथियम की दोहरी ताकत
- तांबे का सबसे बड़ा स्रोत: दक्षिण अमरीकी देश चिली पूरी दुनिया के कुल तांबा उत्पादन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले सप्लाई करता है.
- ग्लोबल डिमांड और सबसे बड़ी खदान: बिजली के तारों, प्लंबिंग और रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स में तांबे की सबसे ज्यादा मांग है. चिली के अटाकामा रेगिस्तान में स्थित ‘एस्कोन्डिडा’ दुनिया की सबसे बड़ी कॉपर माइन है.
- लिथियम का विशाल खजाना: चिली के पास दुनिया के ज्ञात लिथियम भंडार का लगभग आधा हिस्सा मौजूद है, जिसे अटाकामा के नमक के मैदानों से निकाला जाता है.
- EV और बैटरी इंडस्ट्री का पावरहाउस: लिथियम के विशाल भंडार की वजह से चिली इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और बैटरी इंडस्ट्री के लिए बेहद अहम बन चुका है.
- सरकारी नियंत्रण और राष्ट्रीयकरण: चिली सरकार ने इस रणनीतिक खजाने पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लिथियम का राष्ट्रीयकरण करना शुरू कर दिया है.
- ग्लोबल इकोनॉमी पर मजबूत पकड़: तांबे और लिथियम दोनों पर ही बड़ा दबदबा होने के कारण चिली के पास आधुनिक विश्व अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी की दो सबसे अहम कड़ियों की कमान है.
4- सऊदी अरब: कच्चे तेल की ताकत
- ग्रीन एनर्जी के दौर में भी कच्चे तेल की मांग: भले ही दुनिया इलेक्ट्रिक गाड़ियों और ग्रीन एनर्जी की बातें कर रही हो, लेकिन आज भी कच्चे तेल के बिना हमारी जरूरतें पूरी होना नामुमकिन है.
- दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल भंडार: सऊदी अरब के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल भंडार मौजूद है.
- सबसे कम लागत में तेल का उत्पादन: सऊदी अरब की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह देश बाकी दुनिया के मुकाबले सबसे कम लागत में कच्चा तेल निकाल लेता है.
- मार्केट और कीमतों पर सीधा नियंत्रण: सऊदी अरब जब चाहे तेल का उत्पादन बढ़ा या घटा सकता है, और उसके सिर्फ एक फैसले से दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतें ऊपर-नीचे होने लगती हैं.
- OPEC का सबसे ताकतवर खिलाड़ी: ओपेक (OPEC) ग्रुप का सबसे बड़ा और प्रभावी सदस्य होने के नाते सऊदी अरब अन्य तेल उत्पादक देशों के साथ मिलकर पूरे ग्लोबल मार्केट पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखता है.
- ईंधन के अलावा अन्य इस्तेमाल: पेट्रोलियम का इस्तेमाल सिर्फ गाड़ियों के ईंधन के लिए ही नहीं, बल्कि प्लास्टिक, दवाएं और तरह-तरह के केमिकल्स बनाने में भी होता है.
- सऊदी अरामको का दबदबा: सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी ‘सऊदी अरामको’ दुनिया की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों की सूची में शामिल है.
- भविष्य में भी कायम रहेगा दबदबा: भले ही दुनिया धीरे-धीरे फॉसिल फ्यूल का इस्तेमाल कम कर रही है, लेकिन अगले कई दशकों तक वैश्विक बाजार में सऊदी तेल का दबदबा ऐसे ही कायम रहने वाला है.
5- ऑस्ट्रेलिया: लोहा और यूरेनियम की ताकत
ऑस्ट्रेलिया के पास दो ऐसी चीजें हैं जो दुनिया के ढांचे और ऊर्जा को संभालती हैं- लोहा और यूरेनियम. इमारतों, पुलों और गाड़ियों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले स्टील का असली आधार लौह अयस्क (Iron Ore) ही है, और दुनिया का लगभग 55% कच्चा लोहा अकेले ऑस्ट्रेलिया सप्लाई करता है. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पिलबारा रीजन की विशाल खदानों से हर साल करोड़ों टन लोहा चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को भेजा जाता है. अगर ऑस्ट्रेलिया से यह सप्लाई रुक जाए, तो दुनिया भर में कंस्ट्रक्शन का काम ठप पड़ जाएगा.
इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार है. यही यूरेनियम दुनिया भर के न्यूक्लियर पावर प्लांट्स को बिजली बनाने के लिए ईंधन देता है. ऑस्ट्रेलिया में स्थिर सरकार और सख्त माइनिंग नियम हैं, जिसकी वजह से दुनिया इसे एक बहुत ही भरोसेमंद सप्लायर मानती है. जैसे-जैसे दुनिया कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए परमाणु ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ा रही है, ऑस्ट्रेलिया के यूरेनियम की कीमत और मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है.