टीवी के अंत की भविष्यवाणी अभी जल्दबाजी क्यों है, भारत में क्या है टीवी देखने का पैटर्न
Raisina News Desk- सितंबर 21, 2026 11:00 PM IST
एक दशक से ज्यादा समय से टेलीविजन (टीवी) के खत्म होने की भविष्यवाणी की जा रही है. स्मार्टफोन हर जगह पहुंच चुका है, स्ट्रीमिंग आम हो गई है, दर्शक अलग-अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बंट गए हैं और विज्ञापन का पैसा भी डिजिटल मीडिया की ओर चला गया है. हाल के सालों में ‘कॉर्ड-कटिंग’ यानी लोगों का केबल या डीटीएच कनेक्शन छोड़कर इंटरनेट और स्ट्रीमिंग सेवाओं की ओर जाना, टीवी के ताबूत में आखिरी कील जैसा दिखाई देने लगा है.
लेकिन इस तर्क में एक बड़ी खामी है. हो सकता है कि हम टीवी के एक पुराने रूप के कमजोर पड़ने को पूरे टीवी के खत्म होने से जोड़ कर देख रहे हों.
भारत में तस्वीर इतनी सीधी नहीं है. पारंपरिक या लीनियर टीवी की पहुंच अभी भी बहुत बड़ी है. डिजिटल मीडिया के तेजी से बढ़ने के बावजूद टीवी के दर्शकों की संख्या काफी हद तक स्थिर बनी हुई है. इसके साथ ही टीवी का पूरा बाजार भी बढ़ रहा है. कनेक्टेड (Connected) टीवी या कहें कि स्मार्ट टीवी ने इसी बड़ी स्क्रीन पर कंटेंट देखने और उससे कमाई करने के नए रास्ते खोल दिए हैं.
इसलिए बदलाव सिर्फ टीवी में नहीं आया है, बल्कि टीवी के हम तक पहुंचने के तरीके में भी आया है.
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टेलीविजन के इतिहास के अधिकांश हिस्से में टीवी सेट, टीवी चैनल और घर तक कार्यक्रम पहुंचाने वाली व्यवस्था लगभग एक ही सिस्टम का हिस्सा थे. कार्यक्रम, उसे पहुंचाने वाला नेटवर्क और टीवी स्क्रीन, ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए थे.लेकिन अब ऐसा नहीं है.
आज एक ही टीवी पर न्यूज चैनल, यूट्यूब, वेब सीरीज, लाइव क्रिकेट मैच, ओटीटी फिल्म या किसी ब्रॉडकास्टर की डिजिटल सेवा देखी जा सकती है. टीवी स्क्रीन पर अब सर्च, सुझाव, व्यक्तिगत पसंद के हिसाब से कंटेंट और अपनी सुविधा के अनुसार कार्यक्रम देखने जैसी डिजिटल सुविधाएं भी मौजूद हैं.
इसके बावजूद टीवी देखने की कई पुरानी आदतें आज भी बनी हुई हैं.
कनेक्टेड टीवी पर होने वाली 80 फीसद से ज्यादा विविंग, लोग परिवार या दोस्तों के साथ मिलकर देखते हैं. वहीं, एक कनेक्टेड टीवी वाले घर में औसतन 3.3 लोग रहते हैं. (WPP Media & The Trade Desk, 2026)
टीवी पर तय समय के कार्यक्रम देखने की पुरानी आदत भले कमजोर हुई हो, लेकिन परिवार के साथ बैठकर टीवी देखने की परंपरा अभी भी कायम है.
स्मार्टफोन मूल रूप से व्यक्तिगत स्क्रीन है. टीवी आज भी लोगों को एक साथ बैठकर देखने का मौका देता है. मोबाइल और व्यक्तिगत स्क्रीन दर्शकों को अलग-अलग लोगों में बांट देती है, जबकि बड़ी टीवी स्क्रीन आज भी पूरे परिवार को एक साथ जोड़ सकती है. टीवी के खिलाफ दिए जा रहे तर्क में शायद गलत चीज को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.
लीनियर टीवी पर दबाव जरूर है. पिच मेडिसन एडवरटाइजिंग रिपोर्ट 2026 के मुताबिक लीनियर टीवी का विज्ञापन बाजार 2024 में 34,453 करोड़ रुपये से घटकर 2025 में 32,855 करोड़ रुपये रह गया यानी इसमें 4.6 फीसद की गिरावट आई है. लेकिन विज्ञापन में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि टीवी के दर्शक भी खत्म हो गए हैं.
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EY के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में हर हफ्ते करीब 74.5 करोड़ लोग लीनियर टीवी देखते थे, जबकि 2024 में यह संख्या करीब 75.1 करोड़ थी. Weekly GRPs भी करीब स्थिर रहे—2024 में 3,246 और 2025 में 3,215.
महीने भर की पहुंच के मामले में भी टीवी बहुत आगे है. EY, 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक टीवी की मासिक पहुंच करीब 83.1 करोड़ लोगों तक है, जबकि यूट्यूब की पहुंच करीब 49.1 करोड़ लोगों तक है.
ओटीटी और डिजिटल मीडिया तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन इन आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि टीवी की पहुंच अभी भी काफी स्थिर और बहुत बड़ी है.
भारत जैसे देश में यह बहुत मायने रखता है. टीवी अलग-अलग भाषाओं, आय वर्गों, बड़े शहरों, छोटे शहरों और कम कीमत वाले दर्शकों तक पहुंचता है. बहुत कम डिजिटल प्लेटफॉर्म अकेले इतनी बड़ी और विविध आबादी तक पहुंच बना पाते हैं.
राष्ट्रीय स्तर के विज्ञापन अभियान, बड़ी खबर, चुनाव, फिल्म रिलीज या लाइव खेल जैसे मौकों पर लीनियर टीवी आज भी बहुत कम समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकता है. इसके साथ ही, यह लोगों को एक ही समय पर एक ही कार्यक्रम देखने का साझा अनुभव भी देता है, जो बंटे हुए डिजिटल दर्शकों में हासिल करना मुश्किल हो सकता है.
टीवी के खत्म होने की धारणा में एक और समस्या है. टीवी देखने वाले घरों और टीवी के पूरे बाजार का आकार अभी भी बढ़ रहा है. टीवी सब्सक्रिप्शन की संख्या 2023 में करीब 18.6 करोड़ थी, जो 2024 में 19 करोड़ और 2025 में बढ़कर करीब 19.3 करोड़ हो गई. फ्री टू एयर यानी बिना पेड सब्सक्रिप्शन के देखे जाने वाले टीवी घरों की संख्या भी करीब 4.5 करोड़ से बढ़कर 5.3 करोड़ हो गई है.
भारत में अब 956 टीवी चैनल हैं. EY, 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से करीब 65 फीसद फ्री टू एयर हैं.
ये आंकड़े यह नहीं दिखाते कि लोग टीवी को पूरी तरह छोड़ रहे हैं. बल्कि टीवी देखने वाले घरों का स्वरूप बदल रहा है. कुछ घरों में लीनियर टीवी के साथ ओटीटी, यूट्यूब और कनेक्टेड टीवी का इस्तेमाल हो रहा है. वहीं, कुछ परिवारों के लिए फ्री टू एयर टीवी आज भी समाचार और मनोरंजन पाने का सस्ता माध्यम है.
मीडिया में बदलाव आमतौर पर इस तरह नहीं होता कि पुराना माध्यम अचानक खत्म हो जाए और पूरी तरह उसकी जगह नया माध्यम ले ले. अक्सर पुराने और नए सिस्टम एक साथ चलते हैं. बड़ी टीवी स्क्रीन अब डिजिटल प्लेटफॉर्म भी बन रही है.
कनेक्टेड टीवी इस बदलाव को और स्पष्ट करता है.
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भारत में कनेक्टेड टीवी का इस्तेमाल करने वाले दर्शकों की संख्या करीब 20.7 करोड़ मानी जाती है. यह करीब 6.2 से 6.5 करोड़ घरों में मौजूद है. इन घरों में रोजाना औसतन करीब 2.9 घंटे कनेक्टेड टीवी देखा जाता है. (WPP Media & The Trade Desk, 2026)
यहां एक दिलचस्प बात है. एक समय माना जाता था कि इंटरनेट वीडियो देखने की आदत को टीवी से दूर कर देगा. लेकिन हुआ कुछ अलग. इंटरनेट खुद टीवी के अंदर पहुंच गया.
स्मार्ट टीवी में पारंपरिक टीवी की बड़ी स्क्रीन और आराम से बैठकर देखने का अनुभव तो है ही, साथ ही डिजिटल मीडिया की सुविधाएं भी हैं-जैसे सर्च, कंटेंट की सिफारिश, अलग-अलग दर्शकों तक विज्ञापन पहुंचाना और देखने के आंकड़ों की बेहतर जानकारी. और महत्वपूर्ण बात यह है कि कनेक्टेड टीवी, लीनियर टीवी को पूरी तरह खत्म नहीं कर रहा.
शोध के मुताबिक, 68 फीसद कनेक्टेड टीवी वाले घरों में अभी भी लीनियर टीवी से किसी न किसी तरह का संबंध बना हुआ है.(WPP Media & The Trade Desk, 2026)
यानी परिवार सीधे ‘टीवी से डिजिटल’ की ओर नहीं जा रहे हैं. वे एक ही बड़ी स्क्रीन पर टीवी, ओटीटी, यूट्यूब और दूसरे डिजिटल माध्यमों को अलग-अलग जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं. लीनियर टीवी बड़े पैमाने पर दर्शक पहुंचाता है. कनेक्टेड टीवी उसी बड़ी स्क्रीन पर कंटेंट देखने और उससे कमाई करने का एक और रास्ता देता है.
यहां ब्रॉडकास्टर यानी टीवी नेटवर्क की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. ब्रॉडकास्टर सिर्फ केबल या सैटेलाइट के जरिए चैनल चलाने वाली कंपनी नहीं है. उसकी असली ताकत उसके कंटेंट, ब्रांड, पत्रकारों और कलाकारों, लाइव कार्यक्रमों, खबरों, खेल, मनोरंजन और ऐसे कार्यक्रमों में है जो बड़ी संख्या में दर्शकों को एक साथ जोड़ सकते हैं.
अब यह कंटेंट अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर पहुंच सकता है. कोई चुनाव, क्रिकेट मैच, बड़ी खबर या लोकप्रिय मनोरंजन कार्यक्रम लीनियर टीवी, कनेक्टेड टीवी, ओटीटी, यूट्यूब और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक साथ मौजूद हो सकता है.
इसलिए अब सिर्फ चैनल ही ब्रॉडकास्टर की पूरी पहचान नहीं है.
रणनीतिक अवसर पुराने वितरण नेटवर्क को बचाने में नहीं, बल्कि अपने मजबूत कंटेंट को ज्यादा से ज्यादा प्लेटफॉर्म तक पहुंचाने में है. पैसा टेलीविजन छोड़ नहीं रहा, बल्कि उसका रुख बदल रहा है.
विज्ञापन के आंकड़े भी यही कहानी बयां करते हैं. लीनियर टीवी का विज्ञापन बाजार 2024 में 34,453 करोड़ रुपये से घटकर 2025 में 32,855 करोड़ रुपये रह गया. लेकिन इसी दौरान कनेक्टेड टीवी का विज्ञापन बाजार लगभग दोगुना होकर 3,000 करोड़ रुपये से 6,000 करोड़ रुपये हो गया.
जब Pitch Madison लीनियर टीवी और कनेक्टेड टीवी को एक साथ लार्ज स्क्रीन श्रेणी में रखता है, तो विज्ञापन खर्च 2024 के लगभग 37,453 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025 में 38,855 करोड़ रुपये हो जाता है यानी करीब 3.7 फीसद की वृद्धि.
शायद इस पूरी बहस में यही सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा है. पैसा एक जगह से दूसरी जगह जा रहा है, लेकिन वह पूरी तरह टेलीविजन स्क्रीन को छोड़कर नहीं जा रहा है. लीनियर टीवी अभी भी भारत में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचने वाले सबसे बड़े माध्यमों में से एक है. टीवी का पूरा बाजार बढ़ रहा है. कनेक्टेड टीवी देखने और उससे कमाई करने का एक नया रास्ता जोड़ रहा है. वहीं ब्रॉडकास्टर्स के पास अब अपने मजबूत कंटेंट को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर पहुंचाने की क्षमता है.
इसलिए टेलीविजन के खत्म होने की जल्दबाजी में की गई घोषणा शायद सही तस्वीर नहीं दिखाता. इसमें टीवी के पुराने वितरण सिस्टम के कमजोर होने को पूरे माध्यम के खत्म होने से जोड़ दिया गया है. लीनियर टीवी शायद अब स्क्रीन पर अपना पुराना एकाधिकार खो रहा है. लेकिन बड़ी स्क्रीन खुद खत्म नहीं हो रही. बल्कि डिजिटल तकनीक के साथ उसे एक नई जिंदगी मिल रही है.
(डिस्क्लेमर: राहुल कंवल एनडीटीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रधान संपादक हैं. शुभ शंकर चटर्जी एनडीटीवी में स्ट्रेटेजिक ब्रांड कोलैबोरेशंस के क्रिएटिव डायरेक्टर हैं.)